डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 27, 2010

दुधवा में थारू समुदाय की रंग-बिरंगी होली

         
  देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* "बदलते परिवेश का शिकार हुई थारूओं की होली"भारत-नेपाल सीमा पर दुधवा नेशनल पार्क के सघन वनक्षेत्र में महाराणा प्रताप सिंह का वंशज बताने वाले आदिवासी जनजाति थारूओं के चार दर्जन के आस-पास छोटे-बडे़ गांव आबाद हैं।
थारूओं की होली क्षेत्र में ही नही वरन् प्रदेश भर में विख्यात है। खासकर होली पर थारू युवक-युवतियों द्वारा किये जाने वाले होली के विलक्षण नृत्य जो एक बार देख लेता है फिर उसे नही भूल पाता है।
    थारू जनजाति क्षेत्र में होलिकोत्सव का त्योहार होली से एक माह पूर्व मनाना प्रारंभ हो जाता है। जिसे ‘जिंदा होली’ कहा जाता है। इस पंरपरा में थारू गांव के बाहर होली रखना शुरू कर देते हैं। इसमें प्रत्येक रात्रि में लड़के घरों से कूड़ा, पैरा, लाही डंठल, लकड़ी आदि चुराकर होली पर रख आते हैं। गांव की लड़कियां ग्राम प्रधान तथा उप प्रधान (भलमंशा) के आंगन में प्रतिदिन होली नृत्य व गीत गाकर खुशी मनाती हैं। यह क्रम कम से कम होली के तीन दिन पहले तक चलता रहता है। होली जलने से पहले गांव के लड़के दो-तीन वलुइयों में ‘दनवा’, दनवरिया आकारथान के पैरा से बनाकर बल्लियों में बांध देते हैं। होलिका दहन रात्रि में करने के बाद सुबह रंग के स्थान पर गोबर तथा मिट्टी आदि से होली खेलते हैं। इसके बाद से आठ दिन तक ‘मुर्दा’ होली में नाचने तथा उल्लास पूर्वक मनाने की पंरपरा प्रारंभ होती है। युवक-युवतियां पंरपरागत पोशाकों में सज-धज कर प्रतिदिन दो बजे से रात्रि ग्यारह बजे तक ग्राम प्रधान एवं भलमंशा तथा गांव में आये मेहमान यानी पहुना के घर होली नृत्य, गान आदि के कार्यक्रम में होली मिलन कार्यक्रम चलता रहता है। जाड़ यानी मदिरा तथा मांस दावत परोसा जाता है इन तीन दिनों के कार्यक्रम में होली मिलन की परंपरा है। इस दौरान क्षेत्र में आने वाले अन्य लोगों से होली के रंग से सराबोर युवक-युवतियों इनसे फगुआ लेती है। 
         आठ दिन मुर्दा होली मनाने के बाद इसका विसर्जन किया जाता है इसे थारूजन ‘खकटेड़ा फोरन’ भी कहते हैं। इसमें गांव का प्रधान मिट्टी के घड़े में पानी तथा एक झाडू डालकर गांव के दक्षिण लगभग आधा किमी दूर ले जाता है। इसके साथ पूरा गांव जाता है। यहां ग्रामीणजन प्रधान व उसकी पत्नी (पधनिया) समेत सभी आपस में हंसी मजाक करते हैं। इससे गुस्सा होकर प्रधान हल से घड़े को फोड़कर सभी से भाग जाने को कहता है। इसमें पीछे मुड़कर नहीं देखने की हिदायत होती है। गांव पहुंचकर सभी लोग कीचड़ मिट्टी डालकर होली खेलते हैं। स्नान के बाद होली के त्योहार का समापन होता है। इस पावन पर्व होली के त्योहार को उल्लास से मनाने के पीछे थारूओं का विश्वास है कि इससे घर में दुःख क्लेश, कष्ट मिट जाता है और सभी में खुशियों का संचार होता है। उनका मानना है कि भगवान नरसिंह ने दानव को समाप्त करके लोगों को अत्याचार से मुक्त कराया था उसी प्रकार हम सबों के पाप का नाश हो जायेगा। थारू क्षेत्र की विख्यात होली तथा नृत्य को देखने के लिए पूर्व में कभी राजनेता, मंत्री, आलाअफसर आते रहते थे। लेकिन आधुनिकता की चली पश्चिमी बयार के कारण थारूओं की होली पंरपरा विलुप्त होने की कगार पर है। इसका भी प्रमुख कारण है मंहगाई के साथ ही भौतिकवाद की दौड़ में शामिल हो चुके आदिवासी जनजाति थारूओं में होली का स्वरूप बदल रहा है। थारूक्षेत्र के बुजुर्गजन विलुप्त हो रही होली की पंरपरा से व्यथित हैं। जबकि युवा पीढ़ी इसे परिवर्तन की लहर बता रही है। पूर्व में कभी एक माह तक चलने वाला होली का त्योेहार अब एक दिन में सिमटने लगा है घर की बनी खाद्य सामग्री का स्थान रेड़ीमेड सामान ने ले लिया है। हालांकि यह एक अच्छी बात उभर रही है कि अधिकांश थारू युवक-युवतियां मांस-मदिरा से परहेज करने लगी हैं।
      उल्लेखनीय है कि पूर्व में कभी होली का त्योहार प्रेम व भाईचारा से उल्लासपूर्वक मनाया जाता था। लेकिन बदलते परिवेश के साथ मंहगाई के बढ़ते दौर के कारण होली का क्रेज सिमटने लगा है। थारूक्षेत्र में एक माह तक नाच-गाना समेत मांस मदिरा की दावतों के साथ मनाया जाने वाला होली का त्योहार आपस में बढ़ती कटुता के कारण औपचारिक बनता जा रहा है। थारूक्षेत्र ग्राम गोलबोझी के बुर्जुग किसान बसंतलाल व तीरथराम पुरानी यादों को ताजा करते हुये कहते हैं, कि होली का महीनों पहले इंतजार किया जाता था एक महिना सबकुछ भुलाकर मौज मस्ती में होली मनाई जाती थी, अब एक ही दिन में सब कुछ हो जाता है। ग्राम बेलापरसुआ की जुगुनी एवं लीलादेवी कहती हैं कि पहले दिन-रात नाच गाना होता था जिसमंे खूब मजा आता था पापड़ चिप्स शौक से बनाये जाते थे अब तो सब कुछ बाजार में रेड़ीमेड़ मिल जाता है। छात्रा सुशीला बताती हैं होली गीत लुप्त होने लगे हैं पहले सभी भाईचारा से होली खेलते थे अब रंग डालने पर लोग बुरा मान जाते हैं। लक्ष्मण राना एवं राजेश राना कहते हैं कि पूर्व में होली पर मांस-मदिरा का भरपूर प्रयोग होता था लेकिन आज के युवा इससे परहेज करने लगे हैं। इसके अतिरिक्त युवा पीढ़ी अब श्हरों में रहने लगी है उसका यह असर हुआ कि छुट्टी पर एक-दो दिन के लिए लोग आते हैं फिर उनकी वापसी हो जाती है ऐसी व्यस्त जिंदगी ने होली के क्रेज को कम किया है।


-देवेन्द्र प्रकाश मिश्र,
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार है, वन्य-जीव मामलों के जानकार, इस समय दुधवा नेशनल पार्क के निकट पलिया में रहते हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

1 comments:

prashant 'piyuash' said...

devendra ji aapka lekh bahut hi sar garbhit tha. des ki paramparao ki jankari mili hi vahi janjatiya chetra me holi sondhi khusboo bhi mili. aapko holi ki dher saari subhkamnaye.

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