डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 25, 2010

विश्व गौरैया दिवस

गौरैया, फ़ोटो साभार वर्ल्ड हाउस स्पैरो डे डाट आर्ग
 प्रथम विश्व गौरैया दिवस, नेचर फ़ॉर एवर सोसाइटी द्वारा, एंव बाम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी, कार्नेल लैब्स ऑफ़ आर्निथोलोजी (यू०एस०ए०), इकोसिस एक्शन फ़ाउन्डेशन (फ़्रांस), तथा एवन वाइल्ड-लाइफ़  ट्रस्ट, दुधवा लाइव के सहयोग से २० मार्च सन २०१० ई० को मनाया जाना तय हुआ है। इस पहले विश्व गौरैया दिवस विषय है "Help House Sparrow"
इस रोज केवल गौरैया या उसकी सुन्दरता आदि की बात नही होगी, बल्कि मानव आबादी में रहने वाली अन्य चिड़ियों और वहाँ की जैव-विविधिता के सरंक्षण पर भी विचार-विमर्श किये जायेंगे। इस वैश्विक कार्यक्रम का प्रचार-प्रसार "वर्ल्ड हाउस स्पैरो डे डाट आर्ग"  नाम की वेबसाइट के द्वारा किया जायेगा, जोकि इस पूरे घटना क्रम की केन्द्र बिन्दु के रूप में रहेगी। सांगठिनिक व व्यक्तिगत तौर पर आप सभी अपने द्वारा किये गये प्रयासों को  इस वेबसाइट पर दर्ज करा सकते हैं।
बेवसाइट के माध्यम से विभिन्न प्रकार के पोस्टर, लोगो, और प्रेस विज्ञप्ति आदि मौजूद हैं, जिन्हे डाउनलोड कर जागरूकता अभियान में इस्तेमाल किया जा सकता है, साथ ही २० मार्च को "वर्ल्ड हाउस स्पैरो डे" पर दुनिया भर में होने वाले कार्यक्रमों को इस वेबसाइट पर संकलित किया जायेगा, ताकि मीडिया इसका उपयोग कर सके और जनमानस में पक्षी सरंक्षण के महत्व का संदेश पहुंचे।

विश्व गौरैया दिवस के आयोजन का औचित्य मात्र ये नही है, कि उस रोज हम सिर्फ़ गौरैया की बात करे बल्कि रिहाइशी इलाकों  में रहने वाली सभी सामान्य पक्षी प्रजातियों एंव वहाँ की जैव-विविधिता  के सरंक्षण पर  भी जोर दे।
Tree Sparrow, photo courtesy: natureforever.org 



२० मार्च को विश्व गौरैया दिवस मनाने के पीछे इन तमाम संगठनों की मन्शा है, वैज्ञानिकों, सरंक्षणवादियों व पर्यावरण व वन्य-जीवों के सरंक्षण में कार्य कर रहे संगठनों, जन-समूहों का एक विशाल नेटवर्क स्थापित करने की, ताकि इस गम्भीर मसले पर विचार-विमर्श कर, लुप्त हो रही प्रजातियों को बचाया जा सके।
कभी सामान्यत: दिखाई देने वाली गौरैया अब शहरों व गाँवों से नदारत हो रही, और इस प्रजाति के साथ भी कही ऐसा न हो जैसा गिद्धों के साथ हुआ, एक दशक पूर्व गिद्ध सामान्यत: दिखाई देते थे आज वह विलुप्ति के कगार पर हैं!
मनुष्य की बदलती जीवन-शैली ने गौरैया के आवास, भोजन व घोसलें, बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया, साथ ही पेस्टीसाइड के बेतहाशा इस्तेमाल से गौरैया ही नही, वरन मानव आबादी में रहने वाले सभी जीव-जन्तु बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।  बिजली के तारों का फ़ैलता जाल, घरों में माइक्रोबेव वाले उपकरण और सेलुलर फ़ोन एंव उनके टॉवर, इन नन्हे जीवों को नष्ट करने में महती भूमिका अदा कर रहें हैं। यदि जल्दी ही मानव-समाज ने अपने अनियोजित विकास को गति देना बन्द नही किया तो यह कालान्तर में एक भयानक विभीषिका होगी मानव समाज के लिये! जिसे वह स्वंम तैयार कर रहा है।

 क्या करे तो ये खूबसूरत परिन्दे आप के आस-पास रहें।

आधुनिक मकानों में कूछ खुली जगहों पर गढ़्ढे नुमा आकृतिया बनवायें, लकड़ी आदि बक्सों का इस्तेमाल भी कर सकते हैं, ताकि गौरैया उनमें अपना घोसला बना सके। बज़बज़ाती नालियों, सिंक व डस्टविन में बचे हुए अन्न को बहाने के बजाय खुली जगहों पर रखें, जिससे ये पक्षी अपनी भूख मिटा सके।
शहरीकरण में एक और भीषण बदलाव आया है, लॉन, बगीचों और गमलों से हमारी देशी प्रजातियों के पेड़-पौधे गायब हो गये और उनकी जगह ले ली, विदेशी प्रजातियों ने। नतीजा ये है, कि वे पौधे न तो ऐसे पुष्प देते है, जिनमें मीठा व रसीला मकरन्द हो, और न ही खाने योग्य फ़ल! ऐसी कटीली झाडि़यों व बिना घनी पत्तियों व डालों वाले पेड़ों से जिनमें न तो छाया है और न ही सुन्दरता, और न ही ऐसी टहनियां हैं जिन पर ये आसमान के बंजारे अपना घोसला बना सके, या यूँ कह ले कि कुछ पल ठहर कर सुस्ता सके। हाँलाकि आधुनिकता के इस बदलाव में बेचारे इन जीवों ने भी अपने आप को ढ़ालने की कोशिश तो कि जैसे हरी टहनियों के बजाय तारों पर बैठना सीख लिया, घास के छप्पर नही मिले तो छतों में टंगे पंखो के ऊपरी हिस्से में घोसला बना लिया, पर इन्हे वहाँ भी सुरक्षा नही मिली! आखिर अब ये क्या करे! ये एक सवाल है जिसका जबाव हम-आप ही दे सकते हैं और उसी जवाब में छुपा है, इन पक्षियों की बेहतरी का राज!

चलिए इसी बहाने कोई बेहतर कार्य किया जाय, क्योंकि जो जीवों से प्रेम करते हैं, ईश्वर उन्हे पसन्द करता है।
 इन लिंक पर जाकर आप विश्व गौरया दिवस के संदर्भ में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

कृष्ण कुमार मिश्र*

7 comments:

Udan Tashtari said...

बहुत अच्छी जानकारी दी विश्व गौरैया दिवस के बारे में.

kaviraj said...

SACHME ME AIK PAKSHI PREMI HU APNE
APNE JO VISHVA GORAYA DIVAS KE BARE ME JANKARI DI USAKE BADAL APK DHANYAVAD

Rakesh Ujjainwal said...

Bahut bhadhiya jankari hai Goraiya ke baare main. Is sunder pakshi ko internet per dekh kar apne bachpan ki yaad aa gai jab hamare yehan guller ka ek vriksh hota tha to us per aakar yeh pakshi shor machate the kitna achcha lagta tha! abhi main 7 saal se videsh mein hoon aur ab India jane wala hoon. ab dekhta hoon ki yeh pakshi mujhe phir dikhai dete hain ya nahin.

e-mail: rakeshujjainwal21@yahoo.com

Er. Ravi Maurya said...

fist of all i am highly thank full to that organization who make it true. Now i am very happy because the step which is taken by the organization not only saving the life of sparrow but all other endangered classes of bird and animal also, should be saved.
Thanks to the...
Nature for ever society.
Bombay natural history society.
Ecosis action foundation (France)
Avon wild life trust.

आशीष सागर said...

Aaj Hamne Banda me Gaoraiya divas maya aur apne Aas pas logo ko ye Batane ka prayas kiya ki Gaoraiya ko ham nahi save kar apne gahr ki Mustakbil Pahchan ko mita rahe hai aur ye man lena chahiye ki Aadmi ab mature se nahi Khud se hi dur ho raha hai ......safe Gaoraiya for Jal- Zamin - Jangal

Anonymous said...

पिछले दिनों रोहिणी दिल्ली के डी माल में पल रही हजारों गौरैयो को देख मन प्रफुल्लित हो उठा और मैं पुरानी यादों में खो गया.कभी सामान्यत: दिखाई देने वाली गौरैया की चहचहाहट मेरे घर के बड़े से आँगन में गूंजा करती थी .घर के बाहर बगंविलिया के पेढ़ पर हजारो की संख्या में गौरैया रहती थी .रोज शाम को एक बाज वहां आता था गौरया का शिकार करने . हजारो गौरया एकसाथ चिल्लाकर एकदूसरे को साबधान करती ,हमभी शोर सुनकर खाना या पढ़ाई छोढ़कर हाथमें गुलेल लेकर बाज़ को भगाने पहुच जाते . वक्त के साथ आँगन तो ख़त्म हुआ ही .पेढ़ भी गायब हो गए .गौरैया अब शहरों व गाँवों से नदारत हो रही हे , मनुष्य की बदलती जीवन-शैली ने गौरैया के आवास, भोजन व घोसलें, बनाने वाले स्थानों को नष्ट कर दिया, साथ ही पेस्टीसाइड के बेतहाशा इस्तेमाल से गौरैया ही नही, वरन मानव आबादी में रहने वाले सभी जीव-जन्तु बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं।

Anonymous said...

पिछले दिनों दैनिक जागरण में समाचार छपा कि कुछ पक्षी विज्ञानी जंगल में घूम रहे थे उन्हें कुछ रंगीन पक्षी दिखाई दिए वे उन्हें नई प्रजाति समझ पकढ़ कर ले गए नाम रख दिया जौर्नाल्स में लेख छप गए .कुछ दिन बाद पक्षिओ के रंग उतर गए .पता चला कि किसी ने गौरैया को रंग कर छोड़ दिया था . झल्लाए पक्षीविज्ञानियो ने रंगने वाले के खिलाफ जंतु क्रूरता अधिनियम में रिपोर्ट लिखवा कर उसे बंद करबा दिया . रंगने वाला पक्छीप्रेमी था वह उन्हें रंगकर इसलिए छोड़ता था कि बाज़ आदि डरकर उसका शिकार न करे .मुझे पढ़कर हंसी आयी कि पता नहीं दोनों में कौन क्रूर था .Manoj Kumar Singhal,Chandausi

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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
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तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

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देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

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