डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 23, 2010

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा..........!


जीनेश जैन* जल के लिए जंग, विश्व युद्ध के दौरान ईरान, इराक और इटली में सैनिक सेवाएं दे चुके नाथू बा उर्फ त्यागीजी मारवाड़ की धोरां धरती मे जल के लिए जंग लड़ रहे हैं। जोधपुर जिले की भोपालगढ़ तहसील के रतकुडिय़ा गांव के इस शख्स ने जल संरक्षण के लिए ऐसी अनूठी मिसाल पेश की है कि इनके प्रयासों के आगे सरकारी योजनाएं भी बौनी पड़ जाती हैं। नौकरी से रिटायर होने के बाद करीब ४५ वर्षों से इनके जीवन का एक ही लक्ष्य है-जल संरक्षण। इसके लिए इन्होंने अपना घर-बार तक छोड़ दिया और तालाब के किनारे ही बना ली कुटिया। यह कुटिया ही आज उनका सब कुछ है। इसलिए ही लोग उन्हें त्यागीजी के नाम से पहचानते हैं। किसी के भी शादी हो या कोई और सामाजिक समारोह अथवा गांव का मेला। हाथ में एक डायरी लिए कसाय सी काया वाला, हल्की सफेद दाढ़ी बढ़ाए कंधे पर गमछा डाले जल संरक्षण के लिए ग्रामीणों से सहयोग मांगते दिखाई देते हैं।
तीन तालाब और दर्जनों टांके
नाथू बा जब फौज की नौकरी छोड़कर आए तो रतकुडिया गांव भीषण पेयजल संकट का सामना कर रहा था। सरकारी पाइप लाइन थी नहींं। बारिश का पानी ज्यादा नही टिकता। इस पर उन्होंने गांव वालों से मिलकर कुछ करने को कहा। कुछ ने साथ दिया, कुछ ने अनसुना कर दिया। नाथू बा ने हार नहीं मानी। पहले एक टांका खुदवाया और फिर तालाब। उन्होंने रतकुडिय़ा के रेतीले धोरों के बीच तीन पक्के तालाबों और करीब दो दर्जन से अधिक टांकों का निर्माण करवाया है। यही नहीं उन्होंने इन तालाबों के तलों में सीमेंट की फर्श और चारों ओर पक्की दीवारें बनवा दी, ताकि पानी लम्बे समय तक रह सके। बरसात का पानी संग्रहीत करने के लिए उन्होंने आसपास की पहाडिय़ों से बहकर आने वाले नालों को नहरों का रूप भी दे दिया।
अकाल में भी भरपूर पानी
नाथू बाबा की मेहनत अकाल में भी रंग ला रही है। रतकूडिय़ां से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित नाथूसागर पर आस पास की ढाणियां ही नहीं क्षेत्र के कई परिवार निर्भर है। मवेशियों के लिए भी इसमें साल भर पानी रहता है। इसके लिए तालाब के पास ही अलग हौद बना हुआ है। अकाल के वक्त आसपास के खेतों की फसलें भी नाथूसागर व अन्य तालाबों से सींच ली जाती है।
पक्षी सेवा भी
नाथू बाबा तालाब के लिए सहयोग राशि लेने पहुंचते है, लेकिन कई लोग नगदी की बजाय धान उनकी झोली में डाल देते हैं। इस धान का भण्डार पक्षी सेवा में काम आ रहा है। त्यागी बताते हैं कि रोजाना करीब एक बोरी अनाज कबूतरों व पक्षियों के लिए वे घर के पास ही बने चबूतरे पर डालते हैं। इन पर पूरे दिन लगा रहता है पक्षियों का जमघट।
गांव वालों ने किया काम का मान
नाथू बा को न तो आज तक सरकार और प्रशासन ने कोई सम्मान दिया और न ही कभी बाबा ने सम्मान की आशा की। लेकिन ग्रामीणों ने उनके प्रयासों का सम्मान करते हुए उनके द्वारा बनाए गए सबसे बड़े तालाब का नामकरण उनके नाम पर नाथूसागर कर जरूर उनके काम का मान किया।
इंजीनियर पोता-बहू अमरीका में
नाथू बा त्यागी दिखने में तो बहुत ही साधारण से नजर आते हैं, लेकिन उनके ज्येष्ठ पुत्र कंवराराम नौसेना से सेवानिवृत्त होने के बाद मुम्बई में रह रहे हैं। त्यागीजी का पोता रामकिशोर और उसकी पत्नी दोनों ही पेशे से इंजीनियर है और अभी अमेरिका में सेवारत हैं। हालांकि नाबू बा अब बीमार रहने लगे हैं और उनका मिशन भी धीमे पडऩे लगा है, लेकिन उनके होंसलों में आज भी पहले जितने ही बुलंद हैं। वे कहते हैं कि टांके और तालाब ही उनके परिवार हैं। अंतिम सांस तक वे इनकी रक्षा करते रहेंगे।
जीनेश जैन (लेखक राजस्थान पत्रिका में मुख्य उप-संपादक हैं, इससे पूर्व यू०एन०आई० में जर्नलिस्ट के तौर पर वर्षों का कार्यानुभव, पर्यावरण व जमीनी मसायल पर बेहतरीन लेखन, इनसे jinesh.jain@epatrika.com पर संपर्क कर सकते हैं।)  

1 comments:

रूप्पन बाबू said...

इन शख्सियतों से कोई सबक तो ले!

Post a Comment

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Featured Post

क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!