डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jun 18, 2016

संकट में सुहेली जो सरयू की सहायक नदी है


दुधवा के जंगलों से गुजरती यह नदी जो अब सूख चुकी है 

इस नदी में राष्ट्रीय नदी पशु गैंगेटिक डॉल्फिन का है निवास 

पलियाकलां-दुधवा नेशनल पार्क। जिम्मेदारों के गैर जिम्मेदाराना रवैए के चलते दुधवा नेशनल पार्क की लाइफ लाइन कही जाने वाली सुहेली नदी अब अपना वजूद खो चुकी है। सिल्ट सफाई न होने से सुहेली पुल से पर्वतिया घाट तक करीब दस किलोमीटर में नदी ने रेत का टीला बना दिया है और रुख मोड़ कर नकउवा नाले को चली गई है। इससे नेशनल पार्क के जीवों को करीब 50 प्रतिशत पानी की पूर्ति नहीं हो पा रही है तो वहीं उसके नकउवा की ओर रुख कर लेने से कई गांवों के खेतीहर इलाके बंजर होने की कगार पर आ गए हैं वह यहां भयानक सिल्ट फेंक रही है।सैकड़ों सालों से बह रही सुहेली नदी को दुधवा की लाइफ लाइन कहा जाता है। बात लाजिमी भी है क्यों कि नदी पूरी तरह से इस नेशनल पार्क को छूती हुई गुजरती है और इसका पानी दुधवा जंगल के करीब 50 प्रतिशत जीव पीते थे। लेकिन अब वह हालात नहीं रहे। पलिया दुधवा मार्ग पर बने पुल से करीब पांच किलोमीटर पहले नदी ने मुख्य धारा में सिल्टिंग शुरू कर उसे पाट दिया और एक मोड़ लेकर नकउवा नाले में जा पहुंची। नाले का इतना बड़ा स्वरूप नहीं है कि वह अपने ऊपर से एक नदी को गुजार सके। आलम यह हुआ कि नदी ने अपनी जगह बनाते हुए कई गांवों के खेतीहर इलाके को अपनी बालू से पाटना शुरू कर दिया है। इससे हजारो एकड़ कृषि भूमि बंजर होने के कागार पर आ खड़ी हुई है। जहां किसान इससे भूमि हीन हो रहे हैं वहीं एक नेशनल पार्क के जीवों की प्यास पर भी ग्रहण लग गया है। सुहेली ने यह सब कुछ अचानक नहीं किया है बल्कि सालों से वह यह कर रही थी लेकिन जिम्मेदार खामोश रहे और कुछ भी नहीं किया। बताना लाजिमी होगा कि इसके लिए सालों पहले बजट भी मिला था लेकिन कागजों पर काम कर जिम्मेदारों ने राम राम कर ली। एक नेशलन पार्क जहां न जाने कितने ही दुलर्भ जीवों के संरक्षण को करोड़ो रुपया बहाया जा रहा हो वहां वह प्यास से व्याकुल हों यह देश और प्रदेश की सरकारों के लिए काबिले गौर विषय है।



नदी के समीपवर्ती पार्क के इलाकों से बाहर भाग रहे दुलर्भ जीव सकंट
नदी में जितने इलाके में पानी नहीं है वहां के समीपवर्ती जंगल में रहने वाले जीव पानी की तलाश में बाहर आते हैं और फिर बाहर ही रह जाते हैं। उनका यहां रहना वन्यजीव मानव संघर्ष को बढ़ा रहा है। बाघों के हमले भी हो चुके हैं तो उन पर भी खतरे के बादल मंडरा रहे हैं। चीतलए पाढ़े आदि तो बाहर आना आम बात हो चुकी है।



शर्मशार कर रहे शासन और प्रशासन को किसानों के हौसले
गुहार लगाते लगाते थके तो करने लगे नदी की सफाई के लिए आपस में चंदा
. सात लाख रुपए किए इक्ठठाए लेकिन इतने में तो नहीं हो पाएगा काम

पलियाकलां। सुहेली नदी को लेकर चुप्पी साधे शासन और प्रशासन को अब किसानों के हौसले शर्मशार कर रहे हैं। नदी की सफाई व उसके रुख को मोड़कर अपने खेतों और नदी को उसके स्वरूप में लाने के लिए गुहारे कर थक चुके किसान अब खुद आपस में चंदा कर रहे हैं। उन्होंने करीब सात लाख रुपए जोड़े भी हैं लेकिन इतनी सी रकम में यह काम होता नहीं दिखाई दे रहा है। फिर भी वह हिम्मत नहीं हार रहे हैं और बरसात से पहले काम शुरू करने की तैयारियों में जुटे हुए हैं। सुहेली नदी के मिटते वजूद को बचाकर उनके खेतों को भी बचाने की गुहारें किसानों ने एक बार नहीं लगाई है बल्कि दर्जनों बार वह कई सालों से यह गुहार लगा रहे हैं लेकिन न तो शासन ही सुन रहा है और न ही प्रशासन। दोनों की तंगदिली को देख अब बेचारों ने खुद ही आपस में चंदा करना शुरू कर दिया है। उन्होंने अब तक करीब सात लाख रुपए जोड़ भी लिए हैं लेकिन इतने में काम पूरा होता नहीं दिखाई दे रहा है। फिर भी वह सब हिम्मत नहीं हार रहे हैं उनकी मानें तो काम शुरू करना जरुरी है और आगे कमी को आगे देखा जाएगा। उनका कहना है कि किसी काम को हिम्मत के साथ शुरूआत दी जाए तो फिर भगवान भी उसे पूरा करा देता है। सलाम है ऐसे किसानो को जो शासन और प्रशासन के बराबार काम करने का हौसला तो कर रहे हैं। वहीं एक ओर यह हौसला शासनए प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के लिए आइना भी है जो वोट की दरकार में आते हैं और फिर नदारद हो जाते हैं।

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नदी की सिल्ट सफाई के लिए करीब चार पांच साल पहले ऐरीगेशन डिपार्टमेंट को एक प्रस्ताव भेजा गया था लेकिन किन्ही कारणों वश यह नहीं हो पाया।स्थानीय लोगों यहां खुद कार्य शुरू करना चाहते हैं तो प्रशांसनीय है और जंगल में कार्य करने की परमीशन प्रक्रिया की जा रही है। दुधवा में जीवों को पानी की कमी न होने इसके लिए बेहतर व्यवस्थाएं की गईं हैं लेकिन नदी तो नदी ही है।

               महावीर कौजलगि

डिप्टी डायरेक्टर दुधवा नेशनल पार्क
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शासन प्रशासन जब सुन ही नहीं रहा और जनप्रतिनिधि भी चुप्पी साधे बैठ गए । तब यह खुद रुपया एकत्र कर उससे कार्य कराने का सभी ने फैसला लिया और करीब सात लाख रुपए जोड़े गए हैं लेकिन यह काफी नहीं है फिर भी हिम्मत नहीं
हारेंगे। मामला किसानों के भूमिहीन होने और जंगल के जीवों की प्यास का है हर कोशिश की जाएगी की कोई किसान बर्बाद न हो और जंगल के जीव प्यासे न रहें। नहीं सरकार तो जनप्रतिनिधि अपनी निधि से यह कार्य करा सकते थे।

   विकास कपूर विक्की

चेयरमैन केन सोसाएटी पलिया





महबूब आलम (पलिया- खीरी से एक सम्मानित पत्र में पत्रकारिता, वन्य जीवन पर विशेष लेखन, इनसे m.alamreporter@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.)

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