डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Apr 22, 2016

तुमुल कोलाहल कलह में, मैं हृदय की बात रे मन...

अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस 2016 के सम्बन्ध में एक विमर्श-
प्रकृति..................सृष्टि का मनोरम रहस्य, पर्यावरण..................प्रकृति का अनुपम वरदान, मानव.................सृष्टि की सर्वोत्तम कृति फिर भी विश्व व्यथित संकट ग्रस्त ? आत्मा को कुरेदता बस एक प्रश्न-वुद्धि, विवेक और ज्ञान से परिपूर्ण जड़ प्रकृति के चेतन रहस्य का अन्वेषक, विराट का साधक जिज्ञासु तत्वान्वेशी, विनम्र भोक्ता से उपभोक्ता भर कैसे रह गया ? जिस प्रकृति की सुरम्य गोद में पला बढ़ा उसी की शक्तियों को वशीभूत करने के लिए व्यग्र लाभ के लोभवश भोगवादी तमीचर बन गया। शक्ति के दुरूपयोग का विनाशकारी स्वरूप इसे ज्ञान नहीं है क्या ?

मानव सभ्यता के विकास का इतिहास साक्षी है कि मानव ने अपनी रक्षा करने तथा अपने अस्तित्व को स्थापित करने के क्रम में अनेकानेक विषम, भयावह परिस्थितियों से घोर संघर्ष करते हुए अपनी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जो कुछ साधनों की वृद्धि हेतु प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध विद्रोहन कर रहा है-यह ठीक नहीं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी का आश्रय लेकर उसने जिस सामाजिक आर्थिक संरचना को जन्म दिया है विकास की दृष्टि से भले ही उसे उपलिब्ध कहकर संतोष कर लिया जाय पर मानव अनन्त क्षमताओं के बीच भी पंगु बना हुआ है। इस विकास का प्राथमिक और अंतिम उद्देश्य भौतिक भोगवादी होने के कारण दुनिया........सोने की लंका सी समृद्ध चकाचैंध भरी तो दिखाई देती है किन्तु तेजी से पिघलते ग्लेशियारों, उफनते सागरों, भयंकर तूफानी हवाओं, तड़पते-गरजते बादलों, सूर्य की तप्त किरणों और बदलते मौसम चक्र के साथ प्रलय के मुहाने पर खड़ी है। भोर में ही सांझ-लंबी छायाओं में फैलती जा रही जिन्दगी-सिमट कर ठहरी-ठहरी से वृक्षों की फुगनी पर टुकड़े भर धूप सी, विकास के उत्सव में महानाश की प्रस्तुति-भैरव संगीत से गुंजायमान दिग दिगन्त, प्रकृति नदी के रूद्र नृत्य की मूच्र्छना से प्रकंपित धरा, आस्थाएँ-जल में थरथराते प्रतिबिम्ब सी, कामनाएँ-उलझी-उलझी बिखरी- कटीली झाडि़यों सी, विश्वास-छिन्न-भिन्न-उजड़ा, रूखे ठूँठ-सा, आशाएँ निरीह- मुरझाई, सूखी लताओं सी, आशाएँ-निरीह सूखी लताओं सी, कल्पनाएँ-वटवृक्ष की जटाओं-सी-आत्मा आहत क्षत-विक्षत। चारों ओर समस्याओं की बाढ़, प्रगति सुनामी- मुँह फाड़े उमड़ता आता प्रदूषण का सैलाब, तिनकों से उड़ते बहते साधन, परकटे पक्षी-सी गिरते वृक्ष-सभ्यता के आधुनिक विस्तार में ..... जैसे श्मशान में लरजती- छोटी सी जिन्दगी।

नगरीकरण, औद्योगीकरण, कृषि एवं आर्थिक विकास, वातानुकूलित स्वर्गिक सुखसाधन, यातायात के सुगम साधन सबका भरपूर लाभ लेते हुए इसकी उत्तरकथा के रूप में बढ़ती जनसंख्या-घटते प्राकृतिक संसाधन-अस्तित्व के संकट से चिन्तित, क्षुब्ध धरती पर प्रौद्योगिकी मानव अपनी प्रगति आख्या लिए खड़ा है-समय के चैराहे पर। अस्तिव को स्थापित करने की चुनौती को लेकर बढ़ने वाला अस्तित्व के ही संकट से घिरा फिर खड़ा है। जहाँ का तहाँ। विकास के जुनून में ऊर्जा से भरे हम और उसके परिणामों से संकट ग्रस्त होता हमारा जीवन-अनादि काल से चल रहा है-साथ-साथ, समानान्तर-रेल की पटरियों सा जीवन से हम-और-हमसे जीवन-जब कभी मिलना चाहता है-दौड़कर-........पटरियाँ बदल जाती है। न लक्ष्य सधा, न यात्रा थमी, देखा-तो-हम हिले तक नहीं और हमारे ऊपर से गुजरकर निकल गयी सदियाँ-हम वहीं, खड़े के खड़े-पड़े रहे-बस, पटरी बने।

प्राकृतिक चरम घटनाओ-भूकम्प, बाढ़, सुनामी, बादल फटना, भूमण्डलीय तापन तथा श्वास, स्नायुतंत्र, उदर, त्वचा आदि से संबद्ध परेशानियों हृदय व पाचन तंत्र के तरह-तरह के रोगो में अकस्मात-अप्रत्याशित वृद्धि हमारे क्रिया कलापों के परिणाम स्वरूप आज ‘संत्रास युग’ में जी रहे हम-रह गये अकेले-चिमनियों के धुएँ के बादलों, लाउडस्पीकरों, मशीनो और वाहनों के कर्ण भेदी शोर के बीच ऊँची-ऊँची इमारतों, बड़े-बड़े भवनों के बीच, पर्यावरण का संवेदी सूचकांक पार कर चाह रहे हैं। सुरक्षा और समाधान-सभाओं में, सम्मेलनों में, भाषणो में, कागजी योजनाओं में, प्रचारों, कानूनों और रैलियों में गुहार है-मानव बचाओ। संयुक्त राष्ट्र संघ तक द्वारा मानवाधिकारों की कोटि में अलग से स्वच्छ पर्यावरण के सार्वभौम अधिकार की घोषणा करते हुए ‘मानव पर्यावरण सम्मेलन (1972, स्टाकहोम) के प्रथम सिद्धान्त में ही कहा गया-मनुष्य का मूल अधिकार एक ऐसे गुणात्मक पर्यावरण का है, जिसमें गरिमा युक्त एवं सुखी जीवन की अनुभूति के साथ स्वतंत्रता, समानता और रहन-सहन की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हों।-किस-किस लोक में टाँग दूँ यह तख्ती ? कहाँ दे आऊँ दौड़कर यह ज्ञापन ? 1972 से लेकर आज 2012 तक संयुक्त राष्ट्र संघ के कितने ही सम्मेलन पर्यावरणीय चिन्ता व्यक्त कर चुके है पर ‘स्वयं कहा, स्वयं सुना, समाधान को लिया भुना’ की प्रवृत्ति के साथ होने वाले कार्य, योजनाएँ और घोषणाएँ उस समय विवादास्पद हो जाती है जब प्रत्येक सम्मेलन में पूरा विश्व विकासशील और विकसित-दो खेमों में बँटकर ‘कहाँ चरन कहाँ माथा का भेद लेकर महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार करता है तो उन्हें याद नहीं रहता चरन और माथा एक विचार करता है तो उन्हें याद नहीं रहता चरन और माथा एक ही मानव समाज के हैं-सार्वभौम मानव के हैं। परस्पर एक दूसरे पर घात-प्रतिघात करते हुए अधिकारों को समेटते और कर्तव्यों को दूसरों की झोली में डालते हुए नहीं जानते है कि इस रस्साकशी में अपने को ही खत्म कर रहे है-योजनाबद्ध ढंग से ? 

...कुछ भी हो-सच यह है कि अब सब डरे हुए हैं और चाह रहे है कोई समाधान-जादुई चमत्कार सा। पर यह अभी तो संभव नही। प्रतियोगिता और प्रतिस्पर्धा के इस ‘गत्वर युग’ में आज फिर छिड़ी है एक बहस-हवा और सूरज में पर इस बार सूरज नहीं, हवा जीत जायेगी। विषैली गैसों से भरे वायुमण्डल में शोर और धुएँ से घुटता हुआ मनुष्य जब ठंढी-ठंढी हवा की चाह लिए नहीं पा सकेगा एक सांस भर भी शुद्ध प्राण वायु तो वह कपड़े तो कपड़े अपने सिर के बाल भी नोचकर फेंक देना चाहेगा, सूर्य तो जल उठेगा और भी। हवा की इस विषैली जीत का सेहरा-है मानव ! तुम्हारे ही शीश पर होगा। क्योंकि विज्ञान के पथ के पथिक होकर भी तुम भूल गए-वायु का वास्तविक घनत्व तापक्रम और जलवाष्प की मात्रा और पृथ्वी के गुरूत्वाकर्षण बल से प्रभावित होता है। तुमने ‘मेघ बीजन’ (ब्सवनक ैममकपदह) द्वारा वर्षा कराने, बादलों को रोकने तूफानों और चक्रवातों की दिशायें और मार्ग बदलने, उपलवृष्टि रोकने आदि की तकनीक प्राप्त कर ली फि भूकम्प, सुनामी, सूखा, बाढ़ की यह त्रासदी अब क्यों ? एक ही कारण-कृत्रिम परिवर्तन होता है पूरा जैवमण्डल प्रभावित होता है, प्रकृति का सुरक्षा चक्र टूटता है, आहार श्रृंखला भंग होती है, जैव विविधता में कमी आती है। आज मनुष्य द्वारा किए गए पूरे विकास का सारांश अन्न, जल और प्राण वायु के साथ मनुष्य के ही शरीर में प्रवेश कर उस अन्तर्गुहावासी के ‘सकल व्याधिन कर मूल’ रूप में लिख चुका है। क्या अब भी नही समझ में आया-‘अंजन कहा आँखि जेहि फूटै, बहुतक कहाँ कहाँ लौ ?’’

हे मानव सभ्यता के पुरोधा ! बारूद के ढेरों पर, शीतल ज्वालामुखी के संदिग्ध शिलातल पर-हिमजडि़त चेतना के उत्तुंग शिखर पर किंकत्र्तव्यविमूढ़ पर- हिमजडि़त चेतना के उत्तुंग शिखर पर किंकत्र्तव्यविमूढ़ से बैठे, हे अभिव मनु! सभ्यता के विकास का नवद्वार तुम्हीं से खुलेगा। इसलिए टूटी हुई आस्था, भग्न विश्वास और डिगे हुए आत्मविश्वास की पूंजी समेटकर पूरी स्फूर्ति से शीघ्र सोचों कुछ करो..........प्रलय आने के पूर्व करो, क्योंकि याद रखो-प्रलय के बीच और प्रलय के बाद भी बचोगे तुम्ही हमेशा की तरह, इसलिए अकेलेपन से न डरो, अकेलापन तुम्हारा चिर सहचर है, खत्म होनेे से पहले रच लो-बीज रूप सृष्टि। देखो.....देखो सुबह की पलको पर ठहरे हुए ओस के आँसू कितनी चतुराई से पोंछ गयी पवन ! सुनहरी किरणें लिए ऊषा आई-धूल-धुंध-धुएँ में भूल-भटककर उदास चली गयी वापस, उठो ! उठो ! मना लो उषा के पास है मंद-मंद पवन कलियों की मृदु मुस्कान लिए गुनगुना रही है-चिडि़यों का मधुर गीत सुनो, उठो ! आस का अहसास छू लो ओस की बूँदो में-धरती के नवगीत बनो ! भागते-भागते कितना तो थक चुके हो ! ठहरो ! अपने रागी मन की बात सुनो-वरदान चेतना का, साधना आनन्द की-बढ़ो प्रकृति की ओर-चलो प्रकृति की ओर।

डा0 शशि प्रभा बाजपेयी
एस0प्रो0-हिन्दी विभाग
भगवानदीन आर्य कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय
लखीमपुर-खीरी।
मो0नं0-9454237080

1 comments:

Ravi shankar mishra said...

अद्भुत ! प्रकृति के संदर्भ में मानविय प्रकृति का सम्यक विवेचन | मनुपुत्रों ने आज ऋषियों द्वारा स्थापित सृष्टि-समन्वय के पथ की अवहेलना से प्रतिफलित विक्षोभ ने प्रकृति की मातृत्वता को विचलित कर दिया है |

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