International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Dec 27, 2014

जानवरों के नर्क यानी चिड़ियाघर


चिड़ियाघरों की त्रासदी और व्यथा को अपने शब्दों में परिभाषित करते अरुणेश तिवारी जो मूलत: ब्रिटिश भारत के अवध प्रांत के संडीला क्षेत्र के निवासी है, आप को बताता चलूँ ये जगह कभी कार्य क्षेत्र रही कांग्रेस के संस्थापक व् महान पक्षी विज्ञानी ड्रॉ ह्यूम की, बॉम्बे नेचरल हिस्ट्री सोसाइटी के संस्थापकों में से वह एक थे। ।कभी उन्होंने ने ही लिखा था की (Siberian Crane) साइबेरियन क्रेन  जो भारत में राजस्थान के केवला देव नेशनलपार्क में आने के लिए मशहूर थी वह कभी इटावा के वेटलैंड्स में भी आया करती थी.… पढ़िए अरुणेश तिवारी की यह मार्मिक रिपोर्ट जो चिड़ियाघरों की अमानवीयता को दर्शाती है। …संपादक दुधवालाइव 

हुक्कू की हूक :

गाँव के स्कूल की बस शैक्षिक भ्रमण के लिये लखनऊ जाने वाली थी. किसी कारण बस मैं उस टुअर में शामिल न हो पाया, उस भ्रमण में लखनऊ की भूल भुलैया, इमामबाड़ा व चिड़ियाघर (हम बच्चे zoo या प्राणी उद्यान को इसी नाम से जानते थे) विशेष आकर्षण थे. लेकिन उस सबमे सबसे ज्यादा अगर किसी के किस्से थे तो वो थे "हुक्कू बन्दर" के. उस भ्रमण दल का शायद ही कोई सदस्य हो जिसने उसकी चर्चा ना की हो. कई सालों बाद मुझे भी लखनऊ प्राणी उद्यान घूमने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. सो उसका जिक्र यहां कर रहा हूँ। …


प्रिंस ऑफ़ वेल्स जूलॉजिकल गार्डन जिसका नामकरण 2001 में लखनऊ प्राणी उद्यान कर दिया गया का निर्माण प्रिंस ऑफ़ वेल्स के लखनऊ आगमन पर प्रान्त के तत्कालीन गवर्नर सर हरकोर्ट बटलर द्वारा सन 1921 में कराया गया. अगर भारतीय प्राणी उद्यानों के इतिहास की बात करें तो भारत में पहला जू बनाने का श्रेय राजा राजेन्द्र मलिक को दिया जाता है जिन्होंने सन 1954 में कलकत्ता स्थित मार्बल पैलेस के भीतर अपनी निजी हवेली में वन्य जीवों का संग्रह किया था जो वर्तमान में भी मार्बल पैलेस जू के नाम से कलकत्ता में स्थित है. लेकिन जहाँ तक दर्शकों के लिये खोले जाने के आधार पर देखा जाये तो 1855 में स्थापित मद्रास जू को भारत को पहला जू कहा जा सकता है हालांकि सन 1880 में इसे बंद कर स्थानांतरित कर दिया गया था जो वर्तमान में Arignar Anna Zoological Park के नाम से जाना जाता है. 


भारत में सन 1800 के बाद से अब तक तकरीबन 355 बड़े छोटे जू स्थापित किये जा चुके हैं जिनमे 64 बड़े व 190 मध्यम आकार के जू हैं. सेंट्रल जू अथॉरिटी के अनुसार जू स्थापना का मुख्य उद्देश्य जानवरों की कैद में रक्षा करना व लोगों को उनके प्रति जागरूक करना है. जानवरों को जू के भीतर कृत्रिम रूप से बनाये गये वास में रखा जाता है. लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां करती है. और इसका अहसास मुझे प्राणी उद्यान जाने के बाद हुआ. जू में घुसने पर ऐसा लगता है कि आप किसी प्राणी उद्यान में नहीं बल्कि कैद घर में आ गये हैं. 

तमाम प्रवासी व् अप्रवासी पक्षी जो हर वर्ष हजारों मील का सफ़र अपने पंखों से तय करते हैं, जंगलों में खेत खलिहानों में स्वछंद विचरण करते है, एक छोटे से तालाब में कैद हैं.  बाघ जिसे जंगल का राजा की ख्याति हासिल है बमुश्किल पांच सौ वर्ग मीटर के जेलनुमा बाड़े में बंद है. तमाम छोटे बड़े जानवर, पक्षी व अन्य जीव तथाकथित कृत्रिम वास में कैद हैं. जिन हिरणों की चौकड़ी से पूरा जंगल छोटा पड़ जाये वो सशंकित चौकन्नी आँखों से दर्शकों को देख कर सहम जाते हैं. तमाशबीनों का पूरा  हुजूम उमड़ पड़ता है इन बाड़ों के आस पास. केजिंग (caging) के खिलाफ राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर तमाम अभियान समय समय पर चलते रहे जिनमें पेटा (PETA) का "say no to ZOO" भी शामिल है. मुझे आश्चर्य होता है कि इन अभियानों के बावजूद भारत में वर्ष दर वर्ष जू की संख्या में बढ़ोत्तरी होती रही. 

जबकि हकीकत यह है कि वन्यजीवों के प्रति अत्याचार का इससे बड़ा मामला बन ही नहीं सकता. शायद ही कोई संगठन ऐसा हो जिसने जानवरों के प्रति निर्दयता को लेकर गरीब सर्कस वालों को कठघरे में ना खड़ा किया हो. बन्दर बंदरिया का खेल दिखाने वाले ना जाने कितने मदारियों की दो जून की रोटी छीन गयी लेकिन सरकार के संरक्षण में हो वन्य जीवों पर हो रही निर्दयता पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. सेंट्रल जू अथॉरिटी के एक अनुमान के मुताबिक विश्व आबादी का दसवां हिस्सा प्रति वर्ष जू की सैर करता है. भारत में हर साल करीब 5 करोड़ से अधिक लोग जू देखने आते हैं. यह तथ्य यह बताने के लिये पर्याप्त है कि जू भी किसी सर्कस से कम नहीं हैं.

साथ ही जू जाने वाले दर्शकों में अधिकांश का रवैया वन्य जीवों के प्रति किस कदर गैर जिम्मेदाराना होता है उसका एक उदाहरण मै आपको बताता हूँ. लखनऊ प्राणी उद्यान के गेट से प्रवेश करने के बाद ज्यों ही आप बायीं ओर चलेंगे तो कोई दस बाड़े छोड़कर आपको एक बाड़ा मिलेगा. आप पूछ सकते हैं यह बाड़ा ही क्यों ? क्योंकि लखनऊ प्राणी उद्यान का यह एक ऐसा बाड़ा है जिसके आस पास सबसे ज्यादा भीड़ मिलेगी. यह बाड़ा है "हुक्कू बन्दर" का (जिसेअंग्रेजी में Hoolock gibbon कहते हैं और इसका वैज्ञानिक नाम Hoolock hoolock है). यह वन मानुष प्रजाति का बन्दर है जिसकी पूँछ नहीं होती और यह मनुष्य की तरह दो पैरों पर शरीर को साध कर चल सकता है. इसीलिये इसे वनमानुष कहा जाता है. 

यह भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों के अलावा बांग्लादेश के पूर्वी हिस्से तथा दक्षिण - पश्चिम चीन के सदा हरित वनों में पाया जाता है. इनका रंग काला होता है लेकिन वयस्क होने पर मादा हुक्कू के शरीर के बालों का रंग भूरा हो जाता है. यह "हुक्कू - हुक्कू" की  बहुत तेज आवाज निकालते हैं. इसीलिये इन्हें हुक्कू बन्दर कहा जाता है. लेकिन जब आप प्राणी उद्यान में इनके बाड़े के पास जायेंगे तो बाड़े के भीतर का द्रश्य देखकर दंग रह जायेंगे. 

सदा हरित वनों में स्वच्छंद विचरण करने वाले प्राणी के बाड़े को चारो तरफ से छत समेत जाली से बंद कर दिया गया है. छोटे से बाड़े के बाहर लगने वाला हुजूम हुक्कू बन्दर से ज्यादा "हुक्कू - हुक्कू" की आवाजें निकालता है. प्रत्युत्तर में बन्दर भी आवाजे निकालता है तालियाँ बजती हैं सीटी बजती है और यह सिलसिला जब तक शाम में जू बंद नहीं हो जाता तब तक अनवरत चलता रहता है. उस बाड़े के बाहर इकट्ठे  हुजूम को हुक्कू बन्दर की मनोरंजक "हुक्कू - हुक्कू" सुनाई देती है लेकिन मुझे उस "हुक्कू - हुक्कू" में उसकी "मौन हूक". मुझे ऐसा लगता है जैसे वो चीख चीख कर कह रहा हो कि "अब तो बख्श दो". काश मनुष्यों की तरह चल सकने की क्षमता रखने वाले को मनुष्य की तरह बोल पाने का वरदान भी होता जिससे वह अपना दर्द बयां कर सकता.


अरुणेश तिवारी (लेखक इंजीनयरिंग की शिक्षा लेने के बाद, देश व् राजनीतिक मसलों से जुड़े मुद्दों को अपने फेसबुक पेज "राष्ट्र सर्वोपरि" के माध्यम से उजागर करते है, विशेषता: दक्षिणपंथी विचारधारा से ताल्लुक, लखनऊ में निवास इनसे aruneshtiwari30@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं )


2 comments:

  1. कमाल है कि मैं अपने बचपन में इस चिडियाघर को देख चुका हूं हालांकि ऐसा ही कुछ अनुभव मुझे कोलकाता की अलीपुर चिडियाघर हो या मुंबई रानी गार्डन या फ़िर दिल्ली की पुराने किले के पास स्थित चिडिया घर , विशेषकर सृपगृहों का औचित्य और उपयोग आज तक बेहद निराशापूर्ण देखा , कहीं कुछ सीखने समझने वाली बात नहीं है निरीह पशु पक्षियों की आज़ादी का हनन और हश्र दोनों ही दुखदायी हैं , क्या मैं अपने अनुभव चित्रों सहित , कम से कम दिल्ली के चिडियाघर का लिख भेजूं .....

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  2. Ajay Kumar Jha ji you may send us article and images on editor.dudhwalive@gmail.com

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