International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Apr 26, 2014

एक मशहूर फिल्म निर्माता ने फिल्म निर्माण के दौरान बाघों के परिक्षेत्र को किया प्रभावित


दुधवा टाइगर रिजर्व क्षेत्र के किशनपुर वन्य जीव विहार में एक नामी फिल्म निर्देशक के द्वारा किसी फिल्म की सूटिंग का बंदोबस्त किया गया, तमाम धुंआ फेकती गाड़ियां, जेनरेटर, धूम्रपान के प्रदूषण के अतिरिक्त सदियों तक न ख़त्म होने वाला थर्माकोल व् प्लास्टिक की तस्तारियाँ व् बोतले फेकी गयी इस सरंक्षित क्षेत्र में, वन्य जीव अधिनियम की धज्जिया उड़ाते लोग फिर भी किंकर्तव्य विमूढ़ बने रहे वनविभाग के अफसर व् मातहत, जहां बाघों को बचाने के लिए भारत सरकार इतने प्रयास कर रही है वही बाघों के परिक्षेत्र में लोगबाग हर किस्म के प्रदूषण फैला रहे है, और प्रशासन मूक है बुर्जुआ लोगों के प्रभाव में, गौरतलब है की भारत में बाघों की घटती तादाद में वैज्ञानिकों का अध्ययन यह इशारा करता है की तराई के ये शाख़ो के वन और नदियों के मध्य के घास के मैदान ही बंगाल टाइगर की नस्ल को सुरक्षित रख सकते है, ऐसे में मानव की बेजा दखलंदाजी यकीनन हमारे भारतीय बाघ को जो हमारा राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह भी है के आवासों को प्रभावित कर रही है....बाघों के इस परिक्षेत्र में किस तरह घुसे ये व्यवसायिक लोग और किस तरह वन्य संपदा में फैलाई गन्दगी इसका पूरा तस्किरा कर रहे लखीमपुर खीरी "गुलरिया" के पत्रकार अब्दुल सलीम खान.......    

लाइव शूटिंग इन दुधवा टाइगर रिजर्व एरिया
पैसे खर्च करो, और जैसे चाहो करो इस्तेमाल 

दुधवा टाइगर रिजर्व एरिया में आपका स्वागत है। अगर आप आम पर्यटक हैं तो यहां पर आप को धूम्रपान तो छोडि़ए पानी की खाली बोतल यहां तक कि गुटखा के खाली पाउच पार्क एरिया में फेकने पर आपका गाइड आपको वाइल्डलाईफ एक्ट की गाइडलाइन बताता नजर आएगा। पर खास लोगों के लिए यहां पर सब कुछ जायज है। शुक्रवार को यूपी की शान कहे जाने वाले पार्क क्षेत्र में एक फिल्म की शूटिंग के दौरान कोई नियम-कानून के मायने नही नजर आए। किशनपुर सेंक्चुरी के झादी ताल पर फिल्म की शूटिंग के दौरान सहायक स्टाफ धड़ल्ले से धूम्रपान करता रहा, ओर प्लास्टिक की खाली बोतले और प्लेटें जंगल में इधर उधर फेंकी गईं। ये सब वन विभाग के अफसरों के सामने हुआ।



कोटवारा स्टेट के राजा व फिल्म निर्देशक मुजफ्फर अली इन दिनों अपनी एक फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में जिले में हैं। इस फिल्म की शूटिंग एक दिन के लिए दुधवा टाइगर रिजर्व एरिया के किशनपुर सेंक्चुरी क्षेत्र के झादी ताल की परमीशन ली गई थी। शुक्रवार को सुबह छह बजे फिल्म की पूरी टीम झादी ताल पहुंच गई। करीब २०-२५ गाडिय़ा, साईलेंस जनरेटर, तामझाम के साथ फिल्म की शूटिंग शुरु हुई। शूटिंग के दौरान रिजर्व क्षेत्र में फिल्म का सहायक स्टाफ जमकर धूम्रपान करता नजर आया। करीब पचास मीटर एरिया में पानी की खाली बोतलें व थर्माकोल की प्लेटें, गुटखा पाउच के रैपर सब कुछ हवा में फैलते जा रहे थे। पूरा दिन वाहनों का फर्राटे भरना लगा रहा, इसके अलावा वन महकमे की पूरी टीम खड़ी थी, लेकिन ऐसा लगता था वह सिर्फ इसलिए तैनात हैं, कि कोई शूटिंग को डिस्टर्ब न करे। देर शाम तक जंगल में टीम व उनके वाहन डटे रहे, फिल्म की शूटिंग चल रही थी। 


बाघ व बारासिंगा का बेहतरीन हैविटेट है किशनपुर वन्य जीव विहार 

जहां पर शूटिंग चल रही थी, इस स्थान को सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, अगर कभी आप झादी ताल जाएं तो आपका गाइड आपको यहां पर साइलेंस रहने के बाद बताएगा कि इस सागौन के पेंड़ पर टाइगर रोजाना अपने नाखून साफ करने आता है। आए दिन इसी स्थान पर टाइगर की लोकेशन मिलती है। 
किशनपुर सैंक्चुरी का झादी ताल बारह सिंघा के बेहतरीन हैविटेट के लिए विश्व विख्यात है, इस उथले पानी के तालाब के मध्य छोटे छोटे घास के मैदान भी मौजूद है जहां बाघों को विचरण करते हुए कभी भी देखा जा सकता है, इस उथले पानी के घास के मैदान में नाव डालकर फिल्म की सूटिंग की गयी, जो की बारह सिंघा के इस समुदाय के लिए अनुचित गतिविधि है. वन्य जीवन के मध्य इंसानी फ्दखाल न बढे इसलिए राष्ट्रीय उद्यानों व् वन्य जीव विहारों की स्थापना की गयी, और इन सरंक्षित क्षेत्रों की सुरक्षा वन्य जीव अधिनियम १९७२ के तहत सुनाश्चित कराई गयी, किन्तु यहाँ  नियमों का खुलेआम उलघंन किया गया फिल्म निर्माण के दौरान ..... 


वाकई बाक्सर तो कमाल के होते हैं। फिल्म शूटिंग के दौरान लोगों को दूर रखने के लिए बाक्सर (सुरक्षाकर्मी) पत्रकारों को धमकाते रहे कि फोटो लोगे तेा कैमरे जब्त कर लेंगे। 


अब्दुल सलीम खान 
salimreporter.lmp@gmail.com

Apr 23, 2014

गंगा

Photo Courtesy: The UnReal Times



गंगा तुम क्या हो?

मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी

कैसी कथा हो...

जो चिरकाल से

हमें पाल रही हो?


माई, तुम्हें नहीं पता

कौन आर्य है, कौन द्रविड़,

कौन बौद्ध है, कौन मुसलमाँ,

कौन सिक्ख है, कौन जैन,

पारसी या ईसाई भी तुम्हें नहीं पता............


शांत, अविचल, धवल,

श्वेत चन्द्र रेखा सी...

अनवरत सभ्यताओं को जन्म देती

माई तुम कौन हो?

कितने इतिहास समेटे हो?


सुना है,,,

यहाँ के जंगली, धर्महीन साधु

तुम्हें माँ कहते थे........

तुम्हारे पानी को अमृत समझते थे.........

कहते थे तुममें सारे पाप धुल जाते हैं......

संसार की सबसे विस्तृत जैव श्रंखला

की तुम पोषक थीं......

योगी शिव ने तो तुम्हें सर्वोच्च शिखर

पर माना था


पर,

गंगा,

हम नवीन, वैज्ञानिक व धार्मिक मानव

भला इन गाथाओं को सच क्यों माने?


आखिर तुम एक नदी ही तो हो......

निर्जीव, हाइड्रोजन व आक्सीजन का संयोग

जो पहाड़ से निकलता है और सागर में समाता है....


हाँ

और नहीं तो क्या,,,

सर्वविलयक, घुलनशील,

शरीर के सत्तर फीसदी हिस्से की तरह बहने वाली..

तुम भी संसार चक्र की एक इकाई ही तो हो।


लेकिन माँ.....

तुम्हारे अंदर अद्भुत बैक्टरियोफैज कहाँ से आए?

जो विषाणुओं और किटाणुओं को देखते ही

आश्चर्यजनक गुणन करके उन्हे खत्म कर देते हैं....

सम्पूर्ण विश्व में सिर्फ तुम ही ऐसी नदी क्यों हो?

कैसे इतना कचरा ढोते हुए भी

तुम कुछ किलोमीटर के प्रवाह से ही

सर्वाधिक आक्सीजन पा लेती हो?


माँ,

सारे संसार की सबसे उपजाऊ जमीन

तुमने कैसे तैयार की?

तेरी जमीन पर पहुँच कर

सर्वभक्षी मानव अहिंसक क्यों हो जाता है?

माँ तुम्हारा कौन सा गुण था

जिसने अब तक तुम्हारी पोषक धरा को महामारियों से बचाया?


विश्व का सबसे बड़ा डेल्टा बनाने वाली

तुम तो शुरू से अंत तक

साथ कुछ भी नहीं ले जाती....


पर्वतों का अपरदन करके लायी मिट्टी भी

सुंदरवन में छोड़ जाती हो....

जहां हर कण मे एक नया जीवन

जम्हाई लेता है..............


धन्य हो माँ॥


माँ,,,

तुम्हारे पानी में ऐसा क्या था

जो अकबर का उद्दीग्न मन शांत करता था???

उसे धर्मों से दूर ले जाकर आत्मखोज की प्रेरणा देता था.....

क्या था ऐसा जो कबीर और तुलसीदास को

अमर बना गया??

सूफी-साधु कैसे तुम्हारे आगोश में दुनिया से विरक्त हो जाते थे??

क्यों अंग्रेज़ तुम्हारे पानी को विलायत ले जाते थे?

तुम्हारे पानी में कुष्ठ क्यों नहीं पनपता,

क्यों कैंसर नहीं होता?

अबूझ गुण बता दो जिससे तुम्हारा पानी कभी खराब नहीं होता?


माँ

तुम अध्यात्म की देवी क्यों हो.....

जो जंगल संसार को डराते हैं,,,,

वो तुम्हारी धरा में क्यों जीव को बचाते हैं?

कैसे तुम्हारे आँचल में हिंसक जीव भी हमारे साथ खेल लेते थे?


बांधों के बनने से पहले

क्यों तुम्हारे इतिहास में भीषण बाढ़ नहीं है?

क्यों कोई अकाल नहीं है?


लेकिन माँ,,,

कौतूहलवश बाहर से आए आक्रांताओं ने,,

तुम्हारे जंगलियों को मार दिया....

जंगलों,,, और उसमें बसने वाले जीवों को निगल लिया...


मानव को जिंदा रखने वाली माँ,,,,

तुम तिल तिल कर, अब प्राण याचना कर रही हो...


टिहरी बांध से बंध कर...

नरौरा में परमाणु कचरा समेटती...

कानपुर के क्रोमियम से जूझती...

मिर्जापुर से लेकर बांग्लादेश तक

आर्सेनिक जैसे न जाने कितने खनिजों के जहर से लड़ती...

हर घाट में बने मंदिरों की गंदगी,,,

और हमारी लाशों को ढोती.....

हम मूर्ख मानवों की बनाई

रासायनिक मूर्तियों के प्रवाह से विदीर्ण होती।


घरों से निकलता जहरीला झाग और मल-मूत्र....

खेतों से बहकर आता डी०डी०टी० और पेस्टिसाइड.....

गाड़ियाँ धोते, तेल से भरे बदबू मारते नाले.....

फैक्ट्रियों से बहता हमारा रंगीन विकास...

मरी मछलियों से भरा उतराता रसायन.......


आह..... सब सहती हो।


अब तो तुम्हें भूमि से काटती,,,

तुम्हारे मूक जानवरों को दबाती,,,,,

हमारी लंबी और चौड़ी सड़कें भी दौड़ेंगी......


निगमानंद के प्राण लेने वाले

व्यवसायियों से....


आखिर कब तक जिंदा रह सकोगी माँ?
*******

राम सिंह यादव (लेखक पर्यावरण सरंक्षरण की मुहिम में स्वयं को समर्पित किए हुए है, इनकी कवितायें जल जंगल जमीन के प्राकृतिक स्वरूप को बनाये रखने के लिए समाज को एक सुन्दर सन्देश देती है, कानपुर में निवास, इनसे yadav.rsingh@gmail.com पर संपर्क कर सकते है. )


महान जंगल को बचाने के लिए शपथ लिया



शहरी युवा एकजुट होकर सिंगरौली के महान जंगल को बचाने के लिए समर्थन में आए

22 अप्रैल,2014नई दिल्ली। अर्थ डे के अवसर पर नई दिल्ली, मुंबई और बंगलोर के युवा स्वंयसेवक महान जंगल को बचाने के लिए एक साथ आए। ये स्वंयसेवक सिंगरौली, मध्यप्रदेश में स्थित महान जंगल को बचाने के लिए ग्रीनपीस इंडिया की तरफ से आयोजित एकजुटता कार्यक्रम का हिस्सा बने। दिल्ली में यह कार्यक्रम प्रेस इनक्लेव साकेत में आय़ोजित किया गया। अर्थडे के अवसर पर ग्रीनपीस ने बिजनेस स्टैंडर्ड अखबार में एक विज्ञापन देकर राजनीतिक दलों से नये सरकार में सत्ता में आने के बाद महान जंगल को दिए गए अंतिम चरण के पर्यावरण मंजूरी को वापस लेने की मांग की। इस कार्यक्रम में मुंबई में प्रहल्लाद कक्कर और किटु गिडवानी ने तथा बंगलोर में मनोविराज खोसला, सुरेश हेबीलकर और प्रकाश बेलवाडी जैसे सितारों ने हिस्सा लिया।

 इस साल फरवरी में पर्यावरण और वन मंत्री वीरप्पा मोईली ने 50,000 वनवासियों की आशा और आकांक्षाओं को कुचलते हुए महान को मंजूरी दिया था। सदियों से इन वनवासियों की जीविका महान जंगल पर निर्भर है, जिसे महान कोल ब्लॉक को कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। ग्रीनपीस की सीनियर कैंपेनर प्रिया पिल्लई ने कहा कि, अभी हाल ही में रत्ना फील्ड मामले में सामने आये सबूतों ने मोईली की एस्सार के साथ दोस्ती को साबित किया है। इसी क्रम में महान कोल ब्लॉक को मिले स्पीडी क्लियरेंस को भी समझा जा सकता है जबकि मोईली के पूर्ववर्ती दो मंत्रियों ने मंजूरी के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था। यह एक सरकारी कॉर्पोरेट गठजोड़ को इंगित करता है

युवाओं की आवाज
ग्रीन सिटी  के थीम पर तीन शहर के युवाओं ने मांग किया कि उन्हें वनवासियों की जीविका को नष्ट करके और जैवविविधता को खत्म करके विकास नहीं चाहिए।

महुआ चुनना
अप्रैल के महीने में शहरी युवाओं ने महान को बचाने के लिए आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया। 11 अप्रैल को पूरे देश से 26 स्वंयसेवकों ने महान पहुंच कर 15 दिनों तक वनवासियों के साथ जंगल में महुआ चुनने में हिस्सा लिया। मार्च और अप्रैल के महीने में महुआ का फल चुना जाता है जिसका उपयोग कई तरह की दवाईयों के लिए होता है। ग्रामीणों की कमाई का बड़ा हिस्सा महुआ फल को बेचकर आता है।
महान संघर्ष समिति की कार्यकर्ता और बुधेर गांव की निवासी अनिता कुशवाहा कहती हैं, हम शहर से महुआ चुनने आए इन स्वंयसेवकों का आभारी हैं। जो हर रोज सुबह उठकर हमारे साथ महुआ चुनने जंगल जाते हैं। यह एक आसान काम नहीं है लेकिन स्वयंसेवकों का समर्पण बहुत उत्साहजनक है। यह हमें हम महन को बचाने के लिए लड़ाई में अकेले नहीं हैं कि उम्मीद और आश्वासनदेता है

ग्रीनपीस का अखबार में विज्ञापन

अर्थडे के दिन लोगों के चंदे से जमा किए गए पैसे से बिजनेस स्टैंडर्ड में विज्ञापन दिया गया लेकिन पिछले सप्ताह एस्सार ने ग्रीनपीस इंडिया को कानूनी नोटिस भेजकर इसे रोकने का प्रयास किया था। प्रिया पिल्लई ने कहा कि, निषेधाज्ञा के बावजूद, ग्रीनपीस इंडिया विज्ञापन के साथ आगे जा रहा है और महान संघर्ष समिति का समर्थन करने के लिए शहरों में और महान जंगल मेंएकजुटता का प्रदर्शन करके साहसिक कदम उठाया है

ग्रीनपीस इंडिया पर एस्सार लगातार गलत आरोप लगा रहा है। एस्सार के मुंबई स्थित मुख्यालय पर प्रस्तावित कोयला खदान के विरोध में प्रदर्शन करने पर कंपनी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में ग्रीनपीस इंडिया और गांव के लोगों पर 500 करोड़ की मानहानि और चुप रहने का मुकदमा किया है।

ग्रीनपीस इंडिया मांग करती है कि पर्यावरण मंजूरी पर फिर से विचार करके एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्णय आना चाहिए और तबतक के लिए मंजूरी को अमान्य माना चाहिए।

साभार: अविनाश कुमार
ग्रीनपीस इण्डिया 
avinash.kumar@greanpeace.org

एस्सार का फ्लाई एश डैम टूटने से पानी खेतों और घरों तक पहुंचा, स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा



15 अप्रैल, 2014। सिंगरौली। एस्सार द्वारा बड़े पैमाने पर लापरवाही का एक और उदाहरण सामने आया है। खैराही स्थित एस्सार पावर प्लांट के फ्लाई एश डेम के मिट्टी की दीवार टूटने से राखयुक्त पानी गांव में फैल गया है। ग्रीनपीस ने मांग किया है कि एस्सार को तुंरत इसकी जिम्मेवारी लेकर अपने प्लांट को बंद करना चाहिए।
कुछ ही महीनों में यह दूसरा उदाहरण है। पिछले साल सिंतम्बर में, मध्यप्रेदश प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड के क्षेत्रिय कार्यालय (सिंगरौली) ने फ्लाई एश की एक बड़ी मात्रा पास के नदी और आसपास के क्षेत्र में फैलने की सूचना दी थी। इस साल जनवरी में प्रदुषण बोर्ड ने इस ओवरफ्लो की वजह से प्लांट को बंद करने का आदेश दिया था लेकिन कंपनी किसी सुरक्षा उपायों को पूरा किए बिना प्लांट को चालू करने में कामयाब रही थी।

 ग्रीनपीस की अभियानकर्ता ऐश्वर्या मदिनेनी ने बताया कि, कोयला विद्युत संयंत्रों से फ्लाई ऐश सिंगरौली के निवासियों के लिए एक बारहमासी समस्या हो गई है और हाल ही में एस्सार पावर प्लांट से विषाक्त फ्लाई एश का रिसाव स्वीकार नहीं किया जा सकता है। फ्लाई एश में भारी धातु जैसे आर्सेनिक, पारा होते हैं जिससे लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को सीधा नुकसान पहुंच सकता है

वह आगे कहती हैं कि, सिंगरौली के निवासी अस्थमा, तपेदिक, क्रोनिक ब्रोंकाइटिस जैसी बिमारियों से नियमित रुप से पीड़ित हैं। स्थानीय डाक्टर इसकी वजह सीधे तौर पर औद्योगिक प्रदुषण को मानते हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इस क्षेत्र में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा के लिए कदम उठाये
कोयले के जलने से फ्लाई एश उत्पादित होता है और इसके वातावरण में जाने से यह पानी और वायु दोनों को दूषित करता है। बीच गांव में फ्लाई एश के लिए तालाब होने से वहां के लोगों पर बिमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
मंथन अध्य्यन केन्द्र के संस्थापक श्रीपद धर्माधिकारी के अनुसार, फ्लाई एश का पानी के साथ मिलना जल प्रदुषण का सबसे बुरा रुप है। फ्लाई एश डैम के टूटने से वहां के भूमिगत जल स्रोत भी प्रभावित हो सकते हैं। यह प्रदुषित पानी कुएँ और दूसरे जल स्रोतों में मिलकर खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर सकता है

हाल ही में आयी रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में जहरीले पारा के बढ़ने के संकेत मिल चुके हैं। आदमी और मछली दोनों के खून जांच में उच्च स्तर का पारा पाया गया था। पारा नियुरोओक्सिसिटी के साथ जुड़ा एक भारी धातु है और यह फ्लाई ऐश के गठन की प्रमुख घटकों में से एक है।

 जहां एस्सार का नया एश पॉण्ड अभी निर्माणाधीन है। धर्माधिकारी बताते हैं कि, इस तरह की घटना से बचने के लिए फ्लाई एश पॉण्ड को लेकर दिशा-निर्देश बनाये गए हैं लेकिन दुर्भाग्य से शायद ही, पावर प्लांट्स इस नियम का पालन करते हैं

भारी धातु के अलावा फ्लाई एश में रेडियोएक्टिव गुणों के होने का भी संदेह होता है जो आनुवांशिक परिवर्तन पैदा कर सकता है। फ्लाई एश के इस अनिश्चित निपटान से आसपास के लोगों की जिन्दगी और जीविका खतरे में है। धर्माधिकारी के अनुसार पर्यावरण एवं वन मंत्रालय (एमओईएफ) के विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी) ने भारी धातुओं और रेडियोधर्मी तत्वों की वजह से फ्लाई ऐश के उपयोग के खिलाफ मजबूत तर्क  व्यक्त किया है
सिंगरौली में, स्थानीय लोगों और स्वास्थ्य अधिकारियों द्वारा फ्लाई एश प्रदुषण के खिलाफ शिकायत के बावजूद  सरकार और कंपनी इस मुद्दे को हल करने में कोई रुचि नहीं दिखाती। ग्रीनपीस की मांग है कि एस्सार इस पूरे घटना की जिम्मेवारी लेते हुए अपने सभी कार्यों को बंद करे जबतक कि प्रदुषण नियंत्रण संबंधी सभी नियमों को पूरा नहीं कर लिया जाता।

साभार: अविनाश कुमार ग्रीनपीस इंडिया 
avinash.kumar@greenpeace.org

Notes to the Editor:
A Case study on Mercury Poisoning in Singrauli:
Contact:
Aiswarya Madineni: Campaigner, Greenpeace India; +91 8884875744; aishwarya.madineni@greenpeace.org
Avinash Chanchal: +91 8359826363; avkumar@greenpeace.org

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था