डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jan 6, 2014

बाघ सरंक्षण की विधा के पितामह की याद में



बात सन १९९९ की होगी जब मैं पहली बार बिली अर्जन सिंह से मिला, मुझे आज भी याद है वो मंजर टाइगर हैवन का, खीरी के जंगलों में से होकर गुजरता वह गलियारा जिसके किनारों पर तमाम वृक्ष और कहीं कहीं ऊंची ऊंची घास के मैदान, अपनी मोटर बाईक से सुहेली के किनारे स्थित टाइगर हैवन की जानिब मैं चला जा रहा था, मन बहुत रोमांचित हो रहा था उस महान व्यक्तित्व से रूबरू होने के लिए जिसे मैं अभी तक किताबों में पढता आया था, बहुत से किस्से बन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों से भी सुन रखे थे बिली के बारे में, जिनमे किसी ने कहा था मुझसे बिली जब चलते थे तो सबसे आगे उनकी हथिनी, फिर तेंदुएं उसके बाद तारा बाघिन और सबसे पीछे बिली अर्जन सिंह अपनी जीप में सवार होते थे, लोग उन्हें देखकर डर कर सड़को से भाग जाते थे! एक सज्जन ने तो बताया की बिली की बाघिन तारा जब गुस्से में होती तो वह उनके पास आती गुर्राने लगती और बिली उसके मुहं में गुड (गन्ने से बनी मिठाई) का बड़ा टुकड़ा ठूस देते...वाह बाघ गुड भी खाते होगे ये नहीं पता था मुझे !!!....एक किस्सा और लोग-बाग़ सुनाते थे की एक रोज बिली की बाघिन तारा उनका हाथ चाटने लगी और जब उनहोंने अपना हाथ हटाने की कोशिश की तो बाघिन ने गुर्राना शुरू कर दिया...बिली ने अपने नौकर को इशारा किया की अब वह इसे मार दे और इस प्रकार अपनी प्रिय बाघिन को मरवाना पडा ...!! वन विभाग के कुछ पुराने मुलाजिम जो छोटे छोटे पदों पर कार्यरत थे वे कुछ अफ़साने भी सुनाते थे बिली साहब के बारे में...वो मुझसे कहते अरे आप क्या जानते हो बिली को, मैंने देखा है बहुत सारी अंग्रेज लड़कियाँ उनकी दोस्त रही...!!!टाइगर हैवन में   अक्सर गोरी मेमे आती हैं ....वगैरह वगैरह ...!!! मुझे हंसी आ जाती!..हाँ लोग कहते वो बड़े बड़े अफसरों से नहीं मिलते है...लोगों को बिना मिले ही वापस कर देते है..आदि आदि .....रोमांच और भय दोनों का मिला जुला रसास्वादन करता हुआ मैं आगे बढ़ता जा रहा था टाइगर हैवन की तरफ....जंगली गालियारे में थोड़ी थोड़ी दूर पर रास्ता पार करते हुए चीतलों के झुण्ड, पाढे, दिखाई दे जाते है, चिड़ियों की चहकन, और दूर से आती मिली जुली आवाजे एक अजीब सा माहौल पैदा कर रही थी.....

इन तमाम किस्सों को मैं मजे लेकर सुनता बहुत सी सच्चाई पता होने पर भी कुछ न कहता, क्योंकि इन किस्सागोई में जो मजा मिलता उसका जिक्र कर पाना मुश्किल है!

दरअसल बिली से मेरा पहला परिचय जो किताबी था वह डा. रामलखन सिंह की एक किताब से हुआ था जो बिली की बाघिन तारा पर आधारित थी, बेशक डा. रामलखन सिंह के लेखन की विधा से मैं प्रभावित हुआ था, मार्मिक और विवरणात्मक शैली, डा. सिंह बिली के नजदीकी और दुधवा के पहले निदेशक पद पर कार्यरत थे उस वक्त जब बिली बाघों और तेंदुओं के साथ अपने प्रयोग कर रहे थे.

चलिए अब टाइगर हैवन आने ही वाला, एक तरफ गन्ने के विशाल खेत उसके बाद गेहूं की लहराती हुई  स्वर्णिम बालियों से भरा पूरा मैदान दिखाई देने लगा था, इन फसली जमीनों के आख़िरी छोर में एक कतार में बने सफ़ेद रंग के मकान....हाँ यही तो था बिली और उनके बाघों का घर, जिसे दुनिया  "टाइगर हैवन" के नाम से जानती है,तीन तरफ से जंगलों से घिरा ये खुला क्षेत्र मुझे अद्भुत लग रहा था, तभी वे पंक्तिबद्ध घरों के नजदीक मैं पहुँच गया...वहां एक छोटे कद का गठीला व्यक्ति जो खाकी वर्दी में मिला वह श्रीराम था बिली का नौकर, श्रीराम को बिली साहब बोल्टू कहते थे, ये बात मुझे बाद में पता चली!

 बोल्टू से मैंने कहा की बिली साहब से कहो की के के मिश्रा मिलना चाहते है जो युवराज दत्त महाविद्यालय से आये है (उस वक्त में महाविद्यालय में जन्तुविज्ञान का श्रमिक! प्रवक्ता हुआ करता था), कुछ देर में बोल्टू ने आकर सूचना दी की साहब उधर बैठे है, आप जाकर मिल सकते हो, मैं उस कतार में बने उस भवन की तरफ बढ़ रहा था जहां एक उम्रदराज व्यक्ति खाकी पतलून और चार-खाने की कमीज पहने कुर्सी पर बैठा कुछ पढ़ रहा था, जी हां यही थी कुंवर बिली अर्जन सिंह, ...मैंने उनके चरण छुए, बैठने की अनुमति देते हुए वह मुखातिब हुए मेरी तरफ, उनका पहला सवाल था क्या करते हो, औपचारिक परिचय देने के बाद जब मैंने कहा की एम् एससी जन्तुविज्ञान में की है और ओपंबिल्ड स्टार्क पर रिसर्च की तैयारी में हूँ....वो उठे और डा. सालिम अली की बुक आफ इन्डियन बर्ड्स लाकर मेज पर रखते हुए बोले इसे पढ़ा है, मैंने कहा हाँ ! फिर वो चिडियों की बाते करने लगे, उनका एक किस्सा कही पढ़ा था, जब बिली नॅशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड के सदस्य बने, और तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती गांधी की अध्यक्षता में सभा हुई तो डा. सालिम अली भी मौजूद थे सदस्य के तौर पर, कहते है बिली साहब ने पतले दुबले सालिम अली साहब को किसी बात पर उनका गिरहबान पकड़ कर उठा लिया था, मैंने जब इस बात का जिक्र किया तो वह बहुत तेज हंस पड़े, बोले वह तो मजाक में किया था!

बिली साहब से चिड़ियों की बातों के दौरान मैंने तारा का जिक्र कर दिया, तारा का नाम सुनते ही उनकी आँखों में एक चमक सी आ गयी, लेकिन तुरंत मैंने डा. रामलखन सिंह की किताब का जिक्र करते हुए कहा की उन्होंने उसे मारा ऐसा लिखा है, और तारा साइबेरियन नस्ल की बाघिन थी जिसने दुधवा के बाघों में आनुवंशिक प्रदूषण फैलाया!....ये कहते वक्त मैं तनिक भी नहीं सोच पाया की मामला जज्बाती हो जाएगा....
बिली साहब बोले सब झूठ बोलते है, फिर बोले  युवराज दत्त महाविद्यालय डा. विजय प्रकाश ने भी तो कहा है की तारा ही थी जो मारे गयी,......बिली ने तमाम आनुवंशिक विज्ञान की किताबे लाकर मुझे बताने की चेष्टा की की बाघों में आपस में क्रास होने से कोइ आनुवंशिक प्रदूषण नहीं होता, फिर वह चाहे जिस भौगोलिक स्थिति से सम्बन्ध रखते हो...कुछ कुछ इंसानों की तरह ऐसा मैं सोच रहा था, की यदि अफ्रीकन अमेरिकन से शादी करता है तो क्या उसकी आने वाली नसले प्रदूषित होगी!

तारा के ज़िंदा होने वाली बात पर सब मैंने सवाल किया की अब वह कहाँ होगी तो बोले दुधवा के जंगलो में मर खप गयी होगी अब तो काफी अरसा हो गया...यह कहते वक्त उनकी आवाज में भावुकता थी जिसे वो तेज आवाज के पीछे छिपाने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे.

वार्तालाप के बाद बिली ने अपने एक नौकर जिसका नाम हप्लू था से कहा की इन्हें टाइगर हैवन दिखा लाओ, और दक्षिण की तरफ इशारा करते हुए बोले की वहा ओपंबिल्ड स्टार्क आती है, उस जगह ले जाना....इतनी देर बाद भी वो मेरे रिसर्च का टापिक नहीं भूले थे यह जानकार मुझे अच्छा लगा.


अर्जन सिंह ने मुझे ताकीद किया की मैं उन की किताबे पढूं, बाघिन तारा के प्रति उनका स्नेह एक पिता  की तरह था, और टाइगर हैवन में एक वक्त ऐसा भी था जब तेंदुए, बाघ और बिली की कुतिया एली सब साथ साथ खेलते थे. 

कपूरथला रियासत के राजकुमार बिली अर्जन सिंह जिन्हें पद्म श्री व् पद्मभूषण पुरुस्कारों से नवाजा गया उनके वन्य जीवन के सराहनीय कार्यों के लिए, अब हमारे बीच नहीं है, किन्तु उनके अनुभव और कार्य हमारे बीच किताबों और दुधवा राष्ट्रीय उद्यान के रूप में मौजूद है,.

यहाँ एक तस्वीर में बिली साहब अपने मित्र ज्ञान चन्द्र मिश्र के साथ है, जो दुधवा के तत्कालीन निदेशक थे, श्री मिश्रा बिली के जीवनकाल में उनकी टाइगर हैवन सोसाइटी के निदेशक रहे, ज्ञान चन्द्र मिश्रा का खीरी जनपद या यूं कहे की तराई के जंगलों से बहुत पुराना नाता रहा, जब दुधवा, नेशनल पार्क नहीं था, तब श्री मिश्रा तराई के तमाम जनपदों के वाइल्ड लाइफ वार्डन हुआ करते थे, दुधवा नेशंला पार्क से दुधवा टाइगर रिजर्व बनने तक ज्ञान चन्द्र मिश्रा दो बार दुधवा के निदेशक (फील्ड डाइरेक्टर) रहे, उत्तर प्रदेश वन विभाग के कई उच्च पदों पर कार्य करने के बाद सेवानिवृत्त होकर आजकल लखनऊ में रह रहे है, उनके अनुभवों से मैंने दुधवा और बिली दोनों के बारे में बहुत कुछ सीखा और यह सीखने की प्रक्रिया अनवरत जारी है. बिली अर्जन सिंह की यह तस्वीर लखीमपुर के वन्य जीव फोटोग्राफर अजीत कुमार शाह ने सन १९८६ में खींची थी, आज यह तस्वीर और प्रासंगिक हो जाती है, क्योंकि बिली अर्जन सिंह की उन विगत स्मृतियों को ज़िंदा करती है यह तस्वीर  हमारे बीच.

टाइगर हैवन और बिली से यह मेरी पहली पहचान थी, और यह सिलसिला उनके जीवनकाल भर मुसलसल चलता रहा बिना रुके...जब तक...!!

क्रमश: ..........................

  
कृष्ण कुमार मिश्र 
krishna.manhan@gmail.com












1 comments:

Anonymous said...

True tale of the tiger man of India (Uruj Shahid)

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