International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Nov 24, 2013

A Gift From an Ornitholist


उरूज़ साहिद ( पक्षी वैज्ञानिक ) ने  दुधवा लाइव पत्रिका  के लिए  यह तस्वीर भेंट की है, यह उनकी स्वनिर्मित तस्वीर उरूज साहिद कम्प्युटर की भी विधाओं की आला दर्जे की मालूमात रखते हैं.

 उरूज साहिद का फेसबुक पता है- https://www.facebook.com/uruj.shahid

दुधवा लाइव डेस्क*

Nov 22, 2013

…अब महान जंगलों से गूँज रही है आवाज

लोगों के संघर्ष को आवाज देता रेडियो संघर्ष
सीजीनेट की सहायता से ग्रीनपीस ने शुरू किया सामुदायिक मोबाईल रेडियो
विधानसभा चुनावों के समय लोगों को मिली आवाज
 नई दिल्ली। मध्यप्रदेश के चुनावी मौसम में सभी राजनीतिक दलों के नेता अपनी घोषणाएँ और वादे मीडिया के सहारे लोगों तक पहुंचाने में लगे हैं। वहीं दूसरी तरफ मध्यप्रदेश के महान जंगल क्षेत्र (सिंगरौली) में लोग अपनी आवाज और सरोकार नेताओं और अफसरों तक पहुंचाने के लिए सामुदायिक रेडियो जैसे नये माध्यम का सहारा ले रहे हैं। महान जंगल क्षेत्र में सीजीनेट स्वर की सहायता से ग्रीनपीस ने रेडियो संघर्ष के नाम से एक नये सामुदायिक मोबाईल रेडियो की शुरुआत की है। सदियों से अपनी जुबान बंद रखने वाले इस क्षेत्र के लोगों को रेडियो संघर्ष ने अपनी आवाज उठाने का माध्यम दे दिया है। चार महीने के सफल परिक्षण के बाद रेडियो संघर्ष को औपचारिक रुप से शुरू कर दिया गया है।
आम लोगों की आवाज
सिंगरौली जिले में बुधेर गांव की रहने वाली अनिता कुशवाहा को अपने विभाजित जमीन की रसीद और कागजात नहीं मिले हैं। अनिता ने रेडियो संघर्ष में फोन करके शिकायत दर्ज कराया है। उसने अपने गांव के पटवारी का नाम और मोबाईल नंबर भी रिकॉर्ड कराया। साथ ही, रेडियो संघर्ष के लोगों से अपील किया है कि वे इस मामले में उसकी मदद करें।

अनिता एक उदाहरण भर है। भ्रष्टाचारपानीबिजलीबीपीएल में गड़बड़ी से लेकर जंगल पर अपने अधिकार तक गांव के लोग अपनी हर समस्या को रेडियो संघर्ष के माध्यम से दर्ज करवा रहे हैं। रेडियो संघर्ष को महान जंगल क्षेत्र के गांवों में आम आदमी की समस्याओं को उठाने वाले उपकरण के रुप में लोकप्रियता मिल रही है। इसका उद्देश्य स्थानिय प्रशासननीति-निर्धारक तथा गांव वालों के बीच एक सेतु की तरह काम करना है।

ग्रीनपीस की अभियानकर्ता प्रिया पिल्लई कहती हैं, देश के सुदूर इलाकों में रहने वाले  आदिवासियों और समाज के शोषित तबकों की आवाज कभी नीति-निर्धारकों के पास नहीं पहुंच पाती। रेडियो संघर्ष दोनों को एक संचार माध्यम मुहैया करा रहा है। रेडियो संघर्ष एक ओर जहां लोगों को जागरुक करने का काम कर रहा है वहीं दूसरी तरफ नीति-निर्धारकों को सीधे आम लोगों की आवाज में उनकी समस्याओं के बारे में जानने का मौका भी दे रहा है। महान में रेडियो संघर्ष के आरंभ होने के बाद से लोग अपने अधिकार (वनाधिकार कानूनग्रामसभा मे अधिकारको लेकर जागरुक हुए हैं। अब वे अपने क्षेत्र में निष्पक्ष और सही तरीके से कानूनों को लागू करवाने के लिए खड़े हो रहे हैं

मिस कॉल करें और आवाज रिकॉर्ड कराएं, सुनें
रेडियो संघर्ष नागरिक पत्रकारिता को नये आयाम दे रहा है। इसके माध्यम से गांव वाले अपनी समस्याओं को लोगों तक पहुंचा रहे हैं। गांव वालों को एक नंबर दिया गया है जिसपर उन्हें मिसकॉल देकर अपनी आवाज रिकॉर्ड करानी होती है। यह एक बहुत ही आसान उपकरण है। 09902915604 पर फोन कर मिस कॉल देना होता है। कुछ सेकेंड में उसी नंबर से फोनकरने वाले को फोन आता है। फोन उठाने पर दूसरी तरफ से आवाज सुनायी देती है- अपना संदेश रिकॉर्ड करने के लिए दबाएंदूसरे का संदेश सुनने के लिए दबाएं। रिकॉर्ड किए गए संदेश को मॉडरेटर द्वारा चुना जाता है जिसे उसी नंबर पर कॉल करके सुना जा सकता है। साथ हीचुने हुए संदेशों कोपर भी अपलोड किया जाता है।

जूलाई से अब तक रेडियो संघर्ष के पास रोजाना छह से सात कॉल एक दिन में आते हैं। अभी तक 572 कॉल्स आ चुके हैं जिनमें कुछ खाली मैसेज वाले भी शामिल हैं। इनमें 49.5% कॉल्स वनाधिकार कानून के उल्लंघन, 32.8% कॉल्स घूस मांगे जाने की शिकायत को लेकर है। 10.3% कॉल्स गांव वालों की मूलभूत समस्याओं मसलनसड़कराशन कार्डबीपीएल कार्डअस्पतालस्कूलपानीबिजली आदि की समस्याओं को लेकर है। 7.6% कॉल्स विस्थापन पर भी है। सबसे ज्यादा फोन कॉल्स मैसेज को सुनने के लिए आ रहे हैं। अभी तक 3545 लोगों ने संदेश सुनने के लिए कॉल किया है। रोजाना औसतन 34 कॉल्स मैसेज सुनने वालों के आते हैं।

      इसके लिए 25 लोगों को बतौर नागरिक पत्रकार प्रशिक्षण भी दिया गया है। ये नागरिक पत्रकार लोगों को कॉल करने तथा अपनी शिकायत दर्ज कराने में मदद करते हैं। अमिलिया गांव के विरेन्द्ग सिंह भी उन 25 लोगों में से एक हैं। वे कहते हैं कि मैं लोगों को अपनी बात रिकॉर्ड करने के साथ-साथ दूसरों की समस्याओं को सुनने में भी मदद करता हूं। जंगल के महुआ पेड़ों की अवैद्य मार्किंग हो या फिर ग्राम सभा में पारित फर्जी प्रस्ताव हर मामले में विरेन्द्र गांव वालों को रेडियो संघर्ष में अपनी आवाज रिकॉर्ड कराने में मदद करते हैं

पृष्ठभूमि
विरेन्द्र महान संघर्ष समिति के भी सदस्य हैं। 11 गांव के लोगों द्वारा बनी यह समिति महान जंगल पर  अपने वनाधिकार लेने के लिए आंदोलनरत हैँ। महान जंगल को महान कोल लिमिटेड (एस्सार व हिंडाल्को का सुंयक्त उपक्रम) को कोयला खदान के लिए आवंटित करना प्रस्तावित है। रेडियो संघर्ष की टीम महान संघर्ष समिति के साथ काम कर लोगों को वनाधिकार कानून के बारे में जागरुक कर रही है। रेडियो संघर्ष की टीम ने महान संघर्ष समिति के साथ मिलकर 11 गांवों में यात्रा का आयोजन किया था। इस दौरान लोगों को सामुदायिक रेडियो के बारे में प्रशिक्षित भी किया गया।

महान जंगल
प्राचीन साल जंगल वाला महान के क्षेत्र को कोयला खदान के लिए देना प्रस्तावित है। इस कोयला खदान को पहले चरण का निकास मिल चुका है लेकिन दूसरे चरण के निकास के लिए पर्यावरण व वन मंत्रालय ने 36 शर्तों को भी जोड़ा है। इन शर्तों में वनाधिकार कानून 2006 को लागू करवाना भी है। महान जंगल पर 14 गांव प्रत्यक्ष तथा करीब 62 गांव अप्रत्यक्ष रुप से जीविका के लिए निर्भर हैं। 2001 की जनगणना के अनुसार इन गांवों में 14,190 लोग जिनमें 5,650 आदिवासी समुदाय के लोग हैं प्रभावित होंगे। महान में कोयला खदान के आवंटन का मतलब होगा इस क्षेत्र में प्रस्तावित छत्रसाल, अमिलिया नोर्थ आदि कोल ब्लॉक के लिए दरवाजा खोलना, जिससे क्षेत्र के लगभग सभी जंगल तहस-नहस हो जायेंगे।

सौजन्य से-
अविनाश कुमार, ग्रीनपीस 
avinash.kumar@greenpeace.org

Nov 21, 2013

रसिन बाँध पर मछलियों के सौदागरों का कब्ज़ा


रसिन बांध से किसानों को पानी नहीं, होता है मछली पालन !

बुंदेलखंड से आशीष सागर दीक्षित  रिपोर्ट- 


चित्रकूट। बुंदेलखंड पैकेज के 7266 करोड़ रुपए के बंदरबांट की पोल यूं तो यहां बने चेकडेम और कुंए ही उजागर कर देते हैं, लेकिन पैकेज के इन रुपयों से किसानों की जमीन अधिग्रहण कर बनाए गए बांध से किसानों को सिंचाई के लिए पानी देने का दावा तक साकार नहीं हो सका। चित्रकूट जनपद के रसिन ग्राम पंचायत से लगे हुए करीब एक दर्जन मजरों के हजारों किसानों की कृषि जमीन औने-पौने दामों में सरकारी दम से छीनकर उनको सिंचाई के लिए पानी देने के सब्जबाग दिखाकर पैकेज के रुपयों से खेल किया गया। 


उत्तर प्रदेश सिंचाई विभाग के मातहत बने चैधरी चरण सिंह रसिन बांध परियोजना की कुल लागत 7635.80 लाख रुपए है, जिसमें बंदेलखंड पैकेज के अंतर्गत 2280 लाख रुपए पैकेज का हिस्सा है, शेष अन्य धनराशि अन्य बांध परियोजनाओं के मद से खर्च की गई है। बांध की कुल लंबाई 260 किमी है और बांध की जलधारण क्षमता 16.23 मि. घनमीटर है। वहीं बांध की ऊंचाई 16.335 मीटर और अधिकतम जलस्तर आरएल 142.5 मीटर, अधिकतम टापस्तर आरएल 144 मीटर बनाई गई है। इस बांध से जुड़े नहरों की कुल लंबाई 22.80 किमी आंकी गई है। 


किसानों के लिए प्रस्तावित बुंदेलखंड की 2 फसलों रवी और खरीफ के लिए क्रमशः 5690 एकड़, 1966 एकड़ जमीन सिंचित किए जाने का दावा किया गया है, लेकिन एक किसान नेता के नाम पर बने इस रसिन बांध की दूसरी तस्वीर कुछ और ही है। जो कैमरे की नजर से बच नहीं सकी। जब इस बांध की बुनियाद रखी जा रही थी तब से लेकर आज तक रह-रहकर किसानों की आवाजें मुआवजे और पानी के विरोध स्वरों में चित्रकूट मंडल के जनपद में गूंजती रहती है। अभी भी कुछ किसान इस बांध के विरोध में जनपद चित्रकूट में आमरण अनशन पर बैठे हैं। उनकी कहना हैं कि न तो हमें मुआवजा दिया गया और ना ही खेत को पानी। उल्लेखनीय है कि बुंदेलखंड पैकेज से बने रसिन बांध मे किसानों की जमीन लेकर मुआवजा नहीं मिलने के चलते वर्ष 2012 को रसिन के ही बृजमोहन यादव ने अपनी बहन के ब्याह की चिंता में आत्महत्या कर ली थी। उसकी जमीन अन्य किसानों की तरह डूब क्षेत्र में थी। किसान आत्महत्या होने के एक माह पूर्व योजना आयोग उपाध्यक्ष मोटेक सिंह आहलूवालिया बुंदेलखंड दौरे पर रसिन बांध को देखने आए थे। गर्मी के दिनों में इस बांध को भरने के लिए सिंचाई विभाग के आला-अधिकारियों ने बांध को भरा दिखाने के चक्कर में जनरेटर लगाकर टैकरों के माध्यम से पानी भरा था और आहलूवालिया जी को भरा हुआ बांध दिखाकर चलता कर दिया। जबकि इलाहाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग एनएच 76 पर 8 सैकड़ा किसान उनसे मिलने की कवायद में अपनी गुहार के साथ सड़क जाम किए थे, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी। ठीक एक महीने बाद बृजमोहन यादव की खुदकुशी और रसिन नहर के पहली ही बरसात में बह जाने से इस बांध की बुनियाद पर ही सवाल खड़े हो चुके हैं। 



संवाददाता द्वारा 28 अक्टूबर 2013 को बांध को देखा गया तो रसिन बांध के मेन फाटक के उत्तर दिशा में बनी नहर के टेल तक पानी नहीं था। इस डैम में कुल 5 फाटक हैं जो इसी नहर की तरफ खुलते हैं। किसानों को इस बांध में जमीन जाने के बाद सिंचाई के लिए पानी भले ही न मिला हो, लेकिन सरकार को इससे मछली पालन का पट्टा उठाने के नाम पर राजस्व जरूर मिलने लगा है। बुंदेलखंड पैकेज के 7266 करोड़ रुपए इसी तरह ललितपुर और चित्रकूट में चेकडैम और कुएं बनाकर उड़ा दिए गए तो वहीं वन विभाग भी इससे पीछे नहीं रहा। इस विभाग में भी फतेहगंज थाना क्षेत्र की ग्राम पंचायत डढ़वामानपुर में पैकेज की धनराशि से किसानों की जमीन की सिंचाई के लिए 15 ड्राई चेकडैम का निर्माण कार्य 2471.18 हैक्टेयर व 39 हैक्टेयर जमीन पर 468200 रुपए की लागत से कराया गया है। कोल्हुआ के जंगल में बने इन 15 चेकडैमों की हालत बदसूरत ही नहीं बल्कि बेरंग भी है जो किसानों के लिए सींच का साधन नहीं भ्रष्टाचार की बानगी बनकर रह गई है। बुंदेलखंड पैकेज के रसिन बांध का माडल भी कुछ इसी तर्ज पर है।  



आशीष दीक्षित सागर 
ashishdixit01@gmail.com


Nov 17, 2013

खतरे में है भारतीय राष्ट्रीय पक्षी


उपेक्षा के कारण देश में सिमट रही है मोरों की दुनिया

-देवेंद्र प्रकाश मिश्र

वन्यजीव-जंतुओं की जब कोई प्रजाति विलुप्त होने की कगार पर खड़ी हो जाती है तब भारत में उसके संरक्षण के प्रयास एवं उपाय शुरू किए जाते हैं। राजा-महाराजाओं के शिकार के शौक से जब बाघों की दुनिया सिमट गई तब उसके संरक्षण के कार्य शुरू किए गए। एक सदी पूर्व चीता भारत की धरती से गायब हो चुका है। अब बाघ, शेर, तेंदुआ, हाथी, गैंडा तथा गिद्धों को बचाने के साथ ही जब राजकीय पक्षी सारस के अस्तित्व पर संकट गहराया तब उसको संरक्षण देने के उद्देश्य से गणना कराई है। लेकिन भारत का राष्ट्रीय पक्षी ‘मोर‘ अभी भी सरकारी उपेक्षा का शिकार है जिससे मोरों की संख्या में भी गिरावट आने लगी है। इसके बाद भी मोरों को संरक्षण देने के लिए भारत सरकार द्वारा अभी तक कोई रणनीति तैयार नहीं की गई है। निकट भविष्य में मोरों की भी दुनिया सिमट सकती है, इस संभावना से कतई इंकार नहीं किया जा सकता है। 


भारत का राष्ट्रीय पक्षी बने हुए मोर को 50 साल पूरे हो रहे हैं। सन् 1963 में राष्ट्रीय पक्षी का गौरव हासिल करने वाले मोर की घटती संख्या आजादी के पहले से भी आधी रह गई है। सालों से वयंजीवों से प्रेम करने वाले अथवा वयंजीवों के लिए कार्य करने वाले लोग मोर की घटती संख्या पर शोर मचाते रहे हैं, लेकिन आज तक उनकी आवाज ‘नक्कार खाने में तूती की आवाज‘ बनकर रह गई हैं। हालांकि मोरों की सिमट रही दुनिया को संज्ञान में लेकर वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के सेक्शन 43 (3) (अ) और सेक्शन 44 में बदलाव की बात शुरू कर दी है। लेकिन यह भी सोचनीय हैं कि राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा हासिल होने के बाद भी अब तक देश में कभी मोरों की गिनती के कोई प्रयास नहीं किए गए हैं। साल 2008 में भारतीय वयंजीव संस्थान देहरादून (डब्ल्यूआईआई) ने मोर के महत्व को देखते हुए इनकी गणना की योजना बनाकर केन्द्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को भेजी थी, परन्तु धन को लेकर हुई आनाकानी से गणना का प्रस्ताव फाइलों में कैद होकर गायब हो गया। 


सृष्टि कंजरवेशन एंड वेलफेयर सोसाइटी उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष अनूप गुप्त, उपाध्यक्ष ज्ञानी हरदीप सिंह कहते हैं कि मोर  प्रत्येक भारतीय की भावना से जुड़ा है, भगवान श्रीकृष्ण से भी मोर पंख जुड़ा हुआ है और राष्ट्रीय पक्षी होने का तात्पर्य है कि राष्ट्रीय धरोहर और यह बात सभी को समझानी होगी। सरकार को सख्ती से मोर संरक्षण के लिए कार्य करने चाहिए और ‘सेव टाइगर‘ की तरह ‘सेव पीकाक‘ अभियान भी सरकार को छेड़ना चाहिए। लेकिन जब मोरों की गिनती ही नहीं हुई है तो हम कैसे उनके संबंध में बात कर रहे हैं। सोसाइटी के ही डायरेक्टर डा0 वीके अग्रवाल (रिटायर डिप्टी सीएमओ) एवं डा0 नवीन सिंह का मानना है कि लोगों में भ्रम है कि मोर के खून से घुटनों की मालिश की जाए तो गठिया ठीक हो सकता है उससे आर्थराइटिस ठीक हो सकती है लेकिन ऐसा है नहीं, यह केवल अंधविश्वास है ज्यादातर लोग इसका मांस खाने के लिए शिकार करते हैं।


  पीपुल फार एनीमल्स के खीरी प्रतिनिधि केके मिश्र बताते हैं कि मोर अपनी खूबसूरती के कारण मारा ही जाता है साथ ही इसके पंखों का व्यवसायिक प्रयोग अवैध शिकार को बढ़ावा दे रहा है। संस्था द्वारा कराए गए सर्वे में खीरी जिले में सर्वाधिक मोर मितौली के पास करनपुर ग्राम एवं मुरईताजपुर के पास पाए गए। अन्य तमाम जगहों पर मोरों की संख्या में गिरावट पाई गई है। श्री मिश्र ने बताया कि भारतीय संस्कृति और धर्म के प्रति आस्था रखने वाले लोग इनका संरक्षण करते हैं। लेकिन निज स्वार्थ में लोग इनका शिकार करने से परहेज नहीं करते हैं।


भारत की मानव जाति की आस्था और धार्मिक रूप से जुड़े मोर कभी गावों के किनारे खेत, खलिहान और बागों में रहते थे, और यह जंगलों मे भी बहुतायत में पाए जाते थे। गावों के बढ़ते विकास, बदलते परिवेश और आधुनिकीकरण के चलते ग्रामीण क्षे़त्रों से बागों का सफाया हो गया, जंगलों का विनाश अंधाधुंध किया गया, जंगलों को काटकर खेती की जाने लगी है। इसका दुष्परिणाम यह निकला कि मोरों की दुनिया भी सिमटने लगी है। गांव के किनारे के बाग और विशालकाय पेड़ मोरों के रैन बसेरा हुआ करते थे। पेड़ों के कट जाने और बागों का सफाया होने के कारण घोषला बनाना और अंडा देना उनके लिए मुश्किल भरा काम हो गया है। इसका सीधा असर यह हुआ कि उनकी वंशबृद्धि की रफ्तार में खासी कमी आयी है। इसके अतिरिक्त फसलों में कीटनाशक दवाओं के प्रयोग का अधिक बढ़ गया है जिसका बिपरीत असर खेत, खलिहानों में दाना चुगने वाले मोरों पर भी पड़ा है। उत्तर प्रदेश के एकमात्र दुधवा नेशनल पार्क के जंगलों में कभी भारी संख्यां में मोर दिखायी देते थे जो देशी-विदेश्ी पर्यटकों के लिए आकर्षण के केंद्रविन्दु हुआ करते थे। लेकिन अब प्राकृतिक आपदा बाढ़ आदि के साथ मानवजनित कारणों के चलते जंगलों के वातावरण में परिवर्तन हुआ तो धीरे-धीरे मोरों की संख्या में गिरावट आने लगी है। स्थिति यहां तक पहुंच गयी है कि जंगल के जिन क्षेत्रों में जहां कभी मोर झुंड में दिखायी देते थे, अब इक्का-दुक्का ही मोर दिखायी देते हैं, और गावों के किनारे शाम को गूंजने वाली मोरों की मधुर आवाज गायब हो गयी है। अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष कर रहे खूबसूरत पक्षी मोर के संरक्षण के लिए समय रहते प्रयास नहीं किए गए तो भारत के राष्ट्रीय पक्षी मोरों की दुनिया भी किताबों के पन्नों में सिमट जाएगी। 






-देवेंद्र प्रकाश मिश्र
dpmishra7@gmail.com
(लेखक वाइल्डलाइफर और स्वतंत्र पत्रकार है)

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था