International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Save Tiger

DON'T LET WILD TIGERS DISAPPEAR

Lady Rosetta

Potatoes with low sugar content and longer shelf life.

अबूझमाड़ के जंगल

जहां बाघ नही नक्सली राज करते हैं

खवासा का आदमखोर

जहां कांपती थी रूह उस नरभक्षी से

जानवर भी करते हैं योग

योगाचार्य धीरज वशिष्ठ का विशेष लेख

Mar 29, 2013

रंग-रंगीली होली



Mar 26, 2013

......तो इसीलिए मां ने बेल काटने से किया था मना

घर के आंगन मे लगी बेल के नीचे खड़ी मां


यादों मे बची थी चिरैय्या,.... अब फिर घर आई गौरैया,

इस आंगन के अंगूर की बेल बनी चिडिय़ों का बसेरा

गौरेया का बसेरा
अब्दुल सलीम खान
बिजुआ (लखीमपुर खीरी)। आठ साल पहले की बात होगी। मां ने घर के बगीचे मे एक अंगूर का पेंड़ (बेल) लगाया था। एक छोटी सी अंगूर की बेल कुछ ही दिनों मे आंगन मे छाने लगी। एक- दो साल मे अंगूर के  गुच्छे आ गए। लेकिन उनमे मिठास नही थी साथ ही अंगूर में बीज भी थे। घर मे कुछ लोग नाराज हो गए, बोले ऐसे पेंड़ से क्या फायदा, न फल मिलेंगे और न ही काम की लकड़ी। कुछ ने तो तर्क दिया अंागन छोटा पड़ जाएगा इस बेल से कीड़े-मकौड़े आंगन तक आ जांएगे। तभी छोटा भाई खुद ही कुल्हाड़ी लेकर बेल को काटने  दौड़ पड़ा। मां बोली कि पेंड़ नही कटेगा, सब कुछ फल व लकड़ी नही होती, कहा देखना एक दिन ये पेंड़ किसी का बसेरा भी बनेगा। आज सोंचता हूं कि मां की बात कितनी सही थी, आज आठ सालों के लंबे समय में ये पेंड़ हमें भले मीठे फल न दे रहा हो लेकिन न जाने कितने परिंदों का बसेरा बना है।

मैं इधर हूं या उधर : शीशे मे खुद को देखकर जैसे पूछती हो गौरेया

आज भी ये बातें मुझे अच्छी तरह याद हैं। आज वही आंगन है और वही अंगूर की बेल। तेजी से गायब हुई आंगन की चिरैय्या- गौरैय्या अब इसी बेल पर बसेरा किए है। इस चिडिय़ा के एक जोड़े ने यहां घोसला बनाकर अपने अंडों को रखे हुए है। वहीं इस बेल पर फ़ाख्ता चिडिय़ा का बसेरा भी बना है। कई साल से यहां रह रहे फाख्ता ने अपने घोसले मे अंडे रखे हैं, कुछ दिन मे इन अंडों से बच्चे निकलने वाले हैं। और शायद गौरैय्या के अंडों से भी बच्चे निकलने वाले होंगे। गौरैय्या बचाने की मुहिम के  बाद नजर आ रही कुछ ऐसी तस्वीरे हमे ठंडे हवा के झोंके सा अहसास कराती हैं।
-बेटी और गौरैय्या.....जैसे एक दूसरे से हो रहे मुखातिब

आंगन मे लगे वॉश बेसिन और उसके शीसे के सामने रोज आकर बैठने वाली ये गौरैय्या अब घर वालों से इतना घुल मिल गई है कि किसी की आहट से भी भागती तक नही। कुछ तस्वीरों हमने खींची हैं, और उन्हें साझा कर रहा हूं।

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 अब्दुल सलीम खान,  लेखक प्रतिष्ठित दैनिक अखबार  अमरउजाला के युवा पत्रकार हैं, जंगल एवं वन्यजीवों समेत जमीनी मसलों पर तीक्ष्ण लेखन, और खीरी जनपद के गुलरिया (खीरी) में निवास करते हैं, इनसे salimreporter.lmp@gmail.com व मो.९८३८६४३७१६ पर सम्पर्क कर सकते हैं।








Mar 21, 2013

गौरैया...तुमने घोसला क्यों बदल लिया!

Photo Courtesy: Karen Hollingsworth (women painting women)

कही-अनकही
==मयंक वाजपेयी
=बीस मार्च...(वर्ष का जिक्र नहीं) की दोपहर बाद का समय। मितौली के धूल भरे इलाके से वापसी हुई थी गौरैया दिवस मनाकर। उस घर के दरवाजे पर दस्तक दी। दरवाजा खुला तो एकोहद परिचित चेहरा अपरिचित अंदाज में सामने आ गया, एक दबी  हुई मुस्कराहट के साथ। एक अनजान सा सवाल कि यहां कैसे...आज किस तरह...इधर कैसे! झिझकते हुए जवाब दिया कि आज गौरैया दिवस है न...। वही मनाने के लिए आए हैं। सामने वाला हैरत में कि गौरैया दिवस क्या होता है? दोपहर  तीखी धूप थी। लगा कि इस धूप में खड़े होकर कैसे बताया जाए कि गौरैया दिवस क्या होता है..। इसा बीच भीतरी दरवाजा खुल गया। इसके बाद  शुरू हो गई गौरैया दिवस को लेकर। मैं भी साथ था तो बताना शुरू किया कि गौरैया दिवस क्या है और का शुरू हुआ। गौरैया दिवस पर बात चलती रही। मैं गौरैया की कहानी सुना रहा था और वह मेरे साथ बैठा  हुआ गौरैया की ओर देख रहा था। गौरैया भी झिझकते हुए पंख फैला रही थी। वह उड़ना चाह रही थी। पर उसे लगता था कि जाल बिछा  हुआ है। वह किधर भी उड़कर जाएगी तो जाल उसको फंसा लेगा। गौरैया की आंखों में चमक  उतर आई थी। जैसे वो कहना चाह रही थी कि गौरैया दिवस केाहाने ही सही मिलने तो आए। बीस मार्च की तारीख यादगार होती जा रही थी। ...करीब बीस मिनट गुजर गए। सामने चाय के प्याले रखे थे। उसे चाय मे ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी..भाई चाय तो किसी भी गली-नुक्कड़ पर मिल जाएगी...पर खुशी ये थी कि गौरैया के घोसले में पनाह पाने का सुख मिल रहा था। वह लगातारोलता जा रहा था। छत पर बैठी चिड़ियों की बात कर रहा था। आसपास बिखरे दानों में निवाला ढूंढ रहा था और गौरैया खामोशी से सा सुनती जा रही है। गौरैया का क्या है...अभी-अभी तो वह भीड़ सेाचकर घर पहुंची थी। उसे कुछ रोज घर पर ही रहना है। इसके बाद ये वक्त उसे कहां ले जाएगा...वह तो उसे अपने घोसले में जगह देना चाहता है। उसने कई दफा गौरैया से यह कहा भी था कि तुमको मेरे घर आना है। मैं तुम्हारे लिए सपनों का आशियाना बनाउंगा। मिट्टी का घर होगा..उसमें आलेानाएंगे। छत की मुंडेर पर रोज दाने बिखराएंगे और आवाज देकर तुमको हर सुबह बुलाया  करेंगे। तुम आना और रोज यूं ही दाने चुंगते जाना।...मुझे याद है कि यह सपना देखते-देखते गौरैया की काली आंखें पनीली हो गई थीं। फिर लमा दौर गुजर गया। गौरैया उड़ चुकी है। वह किसी और पेड़ पर अपना नया घोसला बना  चुकी है। पता नहीं वहां उसके लिए रोज कोई दाने बिखेरता  होगा भी या नहीं...। पता नहीं होली में गौरैया के पंखों को कोई रंगेगा भी या नहीं...। फिर भी ये दुआ करता हूं कि जा भी गौरैया खुश हो...सामने से पंख फड़फड़ाकर उड़े जरूर...। खुशी से चहके भी।
-फिर बीस मार्च आ गया है। इस बार  गौरैया दिवस मनाएंगे, लेकिन गौरैया दिखेगी तभी तो उसकी कथा बनेगी ..तभी तो मैं उसकी कथा कहीं सुनाने फिर जाऊंगा...पता नहीं ऐसा होगा या नहीं। वरना मुनव्वर राना का यह शेर ही याद आता रहेगा-

‘ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया, उड़ गई आंगन से चिड़िया घर अकेला हो गया।’



 मयंक बाजपेयी (लेखक लखीमपुर खीरी में हिन्दुस्तान दैनिक में पत्रकार है, निवास गोला गोकर्णनाथ, इनसे mayankbajpai.reporter@gmail.com पर संपर्क कर सकते है )


Mar 18, 2013

विश्व गौरैया दिवस- 20 मार्च 2013



विश्व गौरैया दिवस २० मार्च २०१३ के उपलक्ष्य में दुधवा लाइव पत्रिका की ओर से जागरूकता अभियान के लिए पोस्टर व् कैलेण्डर प्रस्तुत किए जा रहे हैं जिन्हें डाउनलोड किया जा सकता है !

दुधवा लाइव डेस्क 




Mar 16, 2013

दुधवा नेशनल पार्क में एक चीतल का शिकार


 १६ मार्च (लखीमपुर-खीरी) दुधवा नेशनल पार्क की बेलाराया रेंज में कुछ  हथियार बंद शिकारी एक स्कार्पियों गाडी के साथ एक चीतल हिरन का शिकार करके भाग रहे थे, वन-विभाग की गस्त-टीम ने उनका पीछा किया मुठभेड़ के बाद एक शिकारी चीतल की लाश के साथ गिरफ्तार हुआ, सूत्रों के मुताबिक़ स्कार्पियों गाडी भी विभाग ने अपने कब्जे में ले ली है| पार्क प्रसाशन ने जल्द ही अन्य शिकारियों को गिरफ्तार कर लेने की बात कही है !

दुधवा में हिरणों की पांच प्रजातियाँ है जो की वन्य जीव अधिनियम १९७२ के अंतर्गत प्रतिबंधित सूची में है, साथ ही यह हिरन प्रजातियाँ बाघों का मुख्य आहार है| बाघों का मुख्य भोजन होने के कारण हिरणों की सुरक्षा व् उनकी सख्या में बढ़ोत्तरी हो इसके उपाय बेहद जरूरी है| ताकि तराई के इस जंगल में बाघों की मौजूदगी हमेशा बनी रह सके ! 


दुधवा लाइव डेस्क

दुधवा के एक बाघ का रहस्य !

दुआ करो सलामत हो दुधवा का बादशाह!


०तीन माह से पर्यटकों को दर्शन नहीं हुए  बादशाह के
०रेडियो कॉलर बंद  होने से बढ़ गई अधिकारियों की चिंता
०सावधान ,यूपी के किसी भी जंगल में पहुंच सकता है बाघ।
०बादशाह यूपी का पहला बाघ जिसको सेटेलाइट से जोड़ा गया

-मुलित त्यागी

धीरे-धीरे पर्यटन का समय गुजरता जा रहा है। परंतु दुधवा के जंगल में छोड़ा गया एक बाघ(बादशाह) का कोई सुराग नहीं लग पा रहा है। चिंता का विषय यह है कि बादशाह के गले में लगा हुआ रेडियो कॉलर भी बंद हो चुका है। जिसके चलते जहां देश विदेश से आने वाले पर्यटकों में बेचैनी हो रही है, वहीं वन विभाग की भी नींद उड़ी हुई है। हालांकि दुधवा नेशनल पार्क के अधिकारियों ने दावा किया है कि बादशाह जंगल में ही कही है।

दुधवा नेशनल पार्क में लखनऊ से पकड़ कर लाए गए बाघ का नाम अधिकारियों ने बादशाह रख दिया था। करीब दो माह तक लखनऊ मंडल में आतंक का पर्याय बन चुके बादशाह को देखने के लिए देश विदेश के पर्यटकों की गिनती बढ़ती चली गई। परंतु 5 अक्टूबर को बादशाह की लोकेशन मिलनी बंद हो गई। जिसको खोजने के लिए अधिकारियों ने दस कैमरे लगवा दिए। परंतु 5 अक्टूबर के बाद 20 जनवरी आ चुकी है। लेकिन बादशाह (बाघ) की कोई लोकेशन नहीं मिल पा रही है। बाघ के गले में लगाया गया रेडियो कॉलर भी बंद हो चुका है है। जिससे वन विभाग एवं अन्य अधिकारियों  के माथे पर चिंता की लकीरें दिखाई पड़ने लगी है। बाघ को गायब हुए करीब तीन माह का समय गुजर गया है जिसकी कही खोज खबर नहीं लग पा रही है। इसी के साथ दधुवा नेशनल पार्क में पर्यटन के लिए जो समयावधि नवम्बर से अप्रैल तक है, उसका समय धीरे-धीरे गुजरता जा रहा है। जिसके चलते उत्तर प्रदेश के विभिन्न महानगरों के अलावा देश-विदेश से आने वाले पर्यटक बादशाह के गायब होने से परेशान हो रहे है।  दुधवा नेशनल पार्क में आने वाले पर्यटक तथा वन विभाग के अधिकारी उसके सलामत होने की दुआ मांग रहे है। इसके अलावा अधिकारी तथा वन विभाग बाघ को खाजने में जुटा हुआ है।

फरवरी में भी भाग गया था बादशाह----

फरवरी 2012 में बाघ दुधवा नेशनल पार्क से भाग गया था। जिसकी लोकेशन मैलानी, मोहम्मदी, हरदोई में मिलने के बाद लखनऊ में मिली थी। इसके बाद वन विभाग के अधिकारियों ने बाघ को 25 अप्रैल को लखनऊ में पकड़ा था। जिसके बाद उसको 27 अप्रैल को फिर से दधुवा छोड़ दिया गया था।

लखनऊ में रहमान नाम रख दिया था बाघ का---
बताया गया है कि दो माह तक गायब रहने वाले बादशाह ने लखनऊ मंडल में जमकर आतंक मचाया था। जिसमें उसने भूख के चलते जानवरों पर हमला बोलकर उनको शिकार बनाया था। बताया गया है कि 25 अप्रैल को बाघ को लखनऊ के रहमान खेड़ा में पकड़ा गया था, जिसके बाद उसका नाम रहमान रख दिया गया था।
पूर्व में तीन बाघों की हो चुकी है मौत---
सात माह पूर्व दुधवा नेशनल पार्क में रहने वाले एक बाघ की मौत हो चुकी है। जबकि पीलीभीत के जंगल में भी दो बाघ मृत मिले थे। हालांकि दुधवा पार्क में वर्तमान में 110 बाघ बताए जा रहे है।

हापुड़, बुलंदशहर  तथा मेरठ में भी है जंगली जानवर का आतंक--
पिछले चार माह से यूपी के जनपद मेरठ, बुलंदशहर तथा हापुड़ के जंगल में भी जंगली जानवरों का आतंक व्याप्त है। बताया जाता है कि हस्तिनापुर सेंचुरी क्षेत्र में जंगली जानवरों ने हमले करते हुए वहां पर सैकड़ों जानवरों का खा लिया है। जाकि कई स्थानों पर इंसानों पर भी हमले हो चुके है।

छ: माह तक आते है देश विदेश के पर्यटक--
 दधुवा नेशनल पार्क में पर्यटकों के लिए नवम्बर से अप्रैल तक आने की छूट रहती है। जिसके चलते नेशनल पार्क में देश विदेश से छ: माह तक पर्यटक आकर बाघ, हाथी , तेंदुआ, हिरण, पाढ़ा, साम्भर, गैंडा आदि को देखते है।
उत्तर प्रदेश का बादशाह पहला बाघ जिसके गले में लगाया रेडियो कॉलर----
सूत्रों के मुताबिक  उत्तर प्रदेश में पहली बार किसी बाघ के गले में रेडियो कॉलर लगाकर उसको प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा गया था। बादशाह के लगाया गया रेडियो कॉलर सेटेलाइट से लिंक था। परंतु सेटेलाइट से लिंक में आने वाला खर्चा वन विभाग के लिए आ आफत बीन गया है। क्योंकि रेडियो कॉलर बंद  होने के पीछे खर्च एक बड़ी वजह हो सकती है। जिस कारण उसकी लोकेशन सेटेलाइट से नहीं ली जा रही है।

क्या कहते है अधिकारी----
दुधवा टाइगर रिजर्व के डिप्टी डायरेक्टर गणेश भट्ट का दावा है कि बाघ  जंगल में ही है। उन्होंने कहा कि कुछ पद चिंह मिले है परंतु हम पूरे सबूत मिलने के बाद  ही उसके जंगल में होने की पुष्टि करेंगे। उन्होंने कहा कि वन्य जीवन पर काम करने वाली एक संस्था ने उसके गले में रेडियो कॉलर लगाई थी जिसने काम करना बंद कर दिया है। सम्भवत: तकनीकी  खराबी  के चलते वह बंद हो चुकी है।

कैमरे लगाए जाएंगे---
डिप्टी डायरेक्टर कहते है कि रुटीन प्रक्रिया में जंगल में कैमरे लगाए जा रहे है। जिसके चलते वहा पर रहने वाले बाघ आदि की जानकारी मिलती रहेगी।
मुलित त्यागी (लेखक हिन्दुस्तान दैनिक में ब्यूरो प्रमुख के रूप में जनपद खीरी में कार्यरत है, मूलत: गढ़मुक्तेश्वर जनपद हापुड़ के निवासी है, इनसे  mt680004@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है  )

Mar 9, 2013

बुंदेलखंड की पीर बनेगा रेल नीर !

जल-जीवन को परिभाषित करता ये चित्र 
 नीर का नीड़ उजाड़ने की तैयारी--------
आशीष सागर    
पानी के संकट के चलते कई जिलों के किसान साल में बमुश्किल एक ही फसल की उपज ले पाते हैं। ठंड में ही तमाम नहरें सूख गई हैं, नदियों का पानी भी तलहटी में पहुंच गया है। आने वाली गर्मी की दस्तक बुंदेलखंड के लिए यकीनन खुशी की बयार तो नहीं ही लाने वाली है किसान खून के आंसू रोने को मजबूर होगा, कहीं नलकूप जबाब देंगे तो कहीं पानी लूटने की वारदात खूनी जंग को अमलीजामा पहनाएगी। हाल ही में 2013 के रेल बजट में बुंदेलखंड के साथ सौतेला व्यवहार करने से रूबरू कराती रिपोर्ट़़.......



 ललितपुर। झांसी, ललितपुर, महोबा, जालौन, चित्रकूट, और बांदा में पहले से ही पानी का संकट है। ऐसे में नहरें, तालाब व नदी किसान का साथ छोड़ दे तो अचरज की बात नहीं है। पूरे बुंदेलखंड में 480 किमी नहरों का अस्तित्व संघर्ष की स्थिति में है। अकेले चित्रकूट और बांदा के हालात ही इतने खराब हैं कि यहां 202 किमी नहर का बजूद खत्म होकर कच्ची सड़क की पगडंडी में तब्दील होता जा रहा है। झांसी, बांदा, हमीरपुर व जालौन में सबसे अधिक नहरों का संजाल है। लेकिन कोई भी नहर ऐसी नहीं है जहां टेल तक पानी पहुंच पाता हो। रबी की बुआई हो या फिर खरीफ की फसलें बुंदेलखंड में रामराज्य की कल्पना पानी की इबारत पर लिखना टेढ़ी खीर है। जिन नदियों से नहरें निकली हैं उनमें केन, उर्मिल, धसान, बेतवा, यमुना, पहुज आदि हैं। झांसी के भसनेह माइनर में तो सालों से पानी ही नहीं आया है जबकि यह पूरी तरह सीमेंट से बनाया गया है। तमाम नदियां छोटी-बड़ी नहरों को आपस में जोड़ती हैं। बुंदेलखंड के 7 जिलों में 1752 नलकूप 22 दिसंबर 2012 तक लगाए गए हैं। इसमें से 152 खराब हो चुके हैं। सबसे अधिक 73 नलकूप बांदा तथा 63 नलकूल जालौन में खराब पड़े हैं। 


    केंद्रीय जल आयोग के अनुसार पिछले वर्ष की तुलना में इस वर्ष केन का जल स्तर 10 सेमी घटा है। मानिकपुर में रेलवे को प्रतिदिन 25 हजार लीटर पानी की जरूरत होती है। कम पड़ने पर इस पानी की पूर्ति रेलवे झांसी से रेल द्वारा पूरा करता है। जल स्तर गिरने से केन और यमुना नदी में लगा इनटैक वॉल में पानी सप्लाई करना बंद कर देता है, ऐसे में टैंकर से पानी पहुंचता है। हमीरपुर में 26.44 एमएलडी पानी की मांग है। अभी तक शहरी इलाके में पानी की अपूर्ति ठीक है और ग्रामीण इलाकों में 76 पेयजल योजनाएं संचालित हैं। 17 हजार 172 हैंडपंप से जलापूर्ति की जाती है। कुल 1252 तालाब हैं जिनमें 705 तालाबों को प्रशासन भरने का दावा करता है, जबकि 547 अभी भी सूखे ही पड़े हैं। इस जिले के मौदहा व सरीला क्षेत्र के करीब एक दर्जन गांव जल संकट से ग्रसित हैं। खेती को अब पानी की जरूरत पड़ी तो 4 मार्च 2013 की जानकारी के मुताबिक किसानों को नहर विभाग से कोई मदद नहीं मिलेगी। रबी की फसल के लिए बांधों में पानी खत्म हो चुका है। गर्मी में अन्ना पशुओं की प्यास और आम आदमी के हलक को तर करने की कवायद में सिंचाई विभाग पसोपेश में है। बांदा जिले के अधिशासी अभियंता दीपक कुमार झा बताते हैं कि रनगवां बांध में उपलब्ध 779 मिलियन घन फीट मिलेगा शेष पानी मध्य प्रदेश के हिस्से में जाएगा। बांदा में कुल भूमि 4 लाख 38 हजार 500 हेक्टेयर है जिसमें कि 1 लाख हेक्टेयर भूमि ऐसी है जो सिंचाई के अभाव में परती है। नहरों की कुल लंबाई 1193 किमी है मगर फिर भी 132 नहरों में आज तक टेल में पानी नहीं पहुंच पाया है। जिले में राजकीय नलकूपों की संख्या 513 है। किसानों के निजी नलकूल 415 हैं, राजकीय नलकूप 73 खराब पड़े हैं। 


केन नदी पर निर्मित पुल 
    हमीरपुर जिले में 101 कुल नहरें हैं, 521 सरकारी नलकूपों की संख्या है और 11 खराब नलकूप हैं। यहां 314470 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है। चित्रकूट जिले में 611 किमी नहरों का जाल है। कुल 127 नहरें हैं इनमें से 8 मुख्य नहरें हैं और 99 छोटी व 20 माइनर हैं। चित्रकूट में 6 राजकीय नलकूप हैं इनका संचालन भी किसानों की जरूरत के हिसाब से होता है। जिले में 170228 हेक्टेयर कृषि क्षेत्रफल हैं जिसमंे कि 8168 हेक्टेयर क्षेत्रफल में 2 फसलें हो पाती हैं। महोबा जिले में 103 नहरों की संख्या है, 40 नहरों में पानी आता है। 2 सरकारी ट्यूबवेल हैं। जिले का कुल कृषि क्षेत्रफल 2 लाख 9 हजार 9 हेक्टेयर है, वहीं झांसी जिले में कृषि योग्य बोया गया कुल क्षेत्रफल 305.573 हेक्टेयर है। जिले में नहरों की कुल लंबाई 3671.60 किमी है। कुल 104 नलकूल चालू हालत में है। 6 बड़ी मुख्य नहरें बेतवा, बड़गांव पंपनहर, गुरसरांय नहर, पहुंज नहर, गढ़मउ नहर, बडवार नहर हैं।
    जालौन में 3,48,000 हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि है व 2100 किमी लंबी नहरें हैं। 605 सरकारी नलकूप हैं जिसमें 65 खराब हैं। ललितपुर जिले में 4 लाख 98 हजार हेक्टेयर कृषि क्षेत्र है। ललितपुर में नहरों की संख्या 11 व सरकारी नलकूप मात्र 1 है यह विकासखंड महरौनी के ग्राम भडौला में स्थित है, जो 2 साल से खराब पड़ा है। वर्ष 2011-12 में बुंदेलखंड की 7 नदियां सूख गईं थीं। यह आने वाली गर्मी इस सूखी पट्टी के उपर भारी पड़ेगी। इसमें संदेह नहीं है।

वर्ष 2010 की स्थिति -
पाठा में 76 मीटर तक नीचे गया भूगर्भ जलस्तर 
चित्रकूट में बरगढ़ से लेकर मारकुंडी तक फैले पाठा क्षेत्र में भूजल स्तर 76.2 मीटर नीचे जा चुका था। करौहा ग्राम पंचायत के गोपीपुर, छेरिहा खुर्द ग्राम पंचायत, बरहामाफी, इटवा डुडैला, छोटी और बड़ी पाटिन जैसे गांवों में ग्रामीण बैलगाड़ी पर टंकी बांधकर डेढ़ से दो किमी दूर से पानी लाते हैं।
महोबा में 100 से ज्यादा तालाब सूखे
महोबा जिले में कुल 137 तालाब हैं जिनमें से 100 से ज्यादा तालाब अतिक्रमण, सिल्ट के चलते सूख चुकें हैं। कीरत सागर, मदन सागर, बीजानगर जलाशय, दशरापुर जलाशय, कल्याण सागर, बेलाताल, कुल पहाड़, कमालपुरा जलाशय, रहिल्य सागर, रैपुरा जलाशय से महोबा की नहरें निकलती थीं जो तालाबों में जलाभाव के चलते दम तोड़ चुकी हैं। तीन बांध और 18 बड़ी बंधियां पूरी तरह सूख गईं हैं। नलकूप अंतिम यात्रा पर निकल रहे हैं।

बांदा जिले के 4540 तालाब बदहाली की कगार पर
बांदा में 4540 तालाब के 1537.122 हेक्टेयर क्षेत्रफल में दंबग और दादुओं का कब्जा है। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट के आदेश तालाबों के अतिक्रमण हटवाने में कूड़ेदान के रद्दी कागज से अधिक हैसियत नहीं रखते हैं। हद तो तब हो जाती है जब आती-जाती सरकारों के मंत्री और उनके सगे संबंधी भी ऐतिहासिक तालाबों पर कब्जा जमाए बैठे हों। अकेले जनपद बांदा सदर के लाल डिग्गी, परशुराम, हरदौल तलैया, बाबूराव गोरे, कंधरदास, छाबी तालाब, साहब तालाब, प्रागी तालाब की जमीनों पर दबंगई से प्रशासन की नाक तले कब्जा है। यह वे ही तालाब हैं जो कभी नबाब टैंक की तरह बांदा की शान हुआ करते थे। यही हाल झांसी शहर के लक्ष्मी तालाब, मउरानीपुर में सुखनई नदी और बाजपेयी तालाब, ललितपुर में सुमेरा तालाब, तालबेहट का भी हाल हैं।
बावजूद इसके केंद्रीय रेलमंत्री पवन कुमार बंसल ने संसद की बंद दीवारों के बीच बुंदेलखंड को पानी के व्यापार की मंडी बनाने का खाका रेल बजट 2013 में प्रस्तुत किया है। बुंदेलखंडवासियों ने ढेरों उम्मीदें रेल बजट से लगा रखीं थी, लेकिन बजट की एक अंगडाई ने उनकी उम्मीदों को लाल झंडी दिखा दी। ललितपुर जिले में केंद्रीय रेल मंत्री ने रेल नीर बॉटलिंग प्लांट लगाने की घोषणा की है। उनका दावा है कि इस प्लांट के जरिए सैकड़ों लोगों को प्रत्यक्ष रूप से रोजगार के अवसर मिलेंगे और बूदेलखंड में पलायन पर अंकुश लगेगा। लेकिन हालात इस रेल नीर से इतर उस सच को भी बयान करते हैं जिसे हमारे केंद्रीय रेल मंत्री ने दिल्ली की संसद के अंदर बैठकर महसूस करने की कोशिश नहीं की।

    गौरतलब है कि ललितपुर जिले में रेल बजट के अंतर्गत लगाए जाने वाले रेल नीर प्लांट से प्रतिदिन 3.80 लाख लीटर बोतल पानी की जरूरत होगी। एक बोतल का मूल्य 15 रुपए लगभग होगा। इससे रेलवे को प्रतिदिन करीब 60 लाख रुपए का लाभ होगा। पानी के इस व्यापार के ऐसी क्या जरूरत बंुदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाके में केंद्रीय रेल मंत्री पवन कुमार बंसल को समझ में आई यह समझ से परे है। कहीं न कहीं बंुदेलखंड के केंद्रीय ग्रामीण राज्य विकास मंत्री और झांसी से ताल्लुकात रखने वाले प्रदीप जैन आदित्य के लिए आने वाले लोकसभा चुनाव 2014 में यह ललितपुर का रेल नीर प्लांट सीधे तौर पर जनता को महज रेल बजट का अबूझ झुनझुना ही लगता है। आखिर प्रतिदिन 4 लाख लीटर पेयजल प्लांट के लिए कहां से सुलभ होगा यह भी रेल मंत्री को बजट के दौरान बताना चाहिए था। क्या यह जमीन का सीना चीरकर निकाला जाएगा या फिर ओरक्षा के रास्ते पाइप लाइन के जरिए सुलभ होगा अथवा बेतवा की तलहटी में उछल-कंूद कर रही आंशिक लहरों से यह पानी बंद बोतलों में बेचा जाएगा। 

केन नदी 


    बुंदेलखंड में पहले से ही केंद्र सरकार की बड़ी पेयजल योजनाएं पर्यावरण प्रहरी, समाजिक कार्यकर्ताओं, किसानों के सवालों के कटघरे में खड़ी हैं, मसलन केन-बेतवा लिंक परियोजना, अर्जुन सहायक बांध परियोजना और बरियारपुर बांध को दुरूस्त किए जाने की योजना। बुंदेलखंड पैकेज से 7266 करोड़ रुपए खपाने के बाद एक बार फिर 590 करोड़ रुपए सियासत के रंगमंच में झूठे वादों के साथ वोटों की खातिर जनता को रामलीला करते नजर आएंगे। ललितपुर से लेकर जालौन, टीकमगढ़, मउरानीपुर, चित्रकूट आदि क्षेत्रों में बनाए गए सैकड़ों कूपों, नलकूपों की हकीकत खुद प्रदीप जैन आदित्य, योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोटेक सिंह आहलुवालिया परख चुके हैं। कागजों में बनाए गए 2 फीट गहरे कुएं और आधे-अधूरे चेकडेम तो बुंदेलखंड की बदहाल बारिश का पहला कहर भी नहीं झेल पाए और बहती हुई पानी की धारा के साथ कागज की कश्ती की तरह बह गए। केंद्र सरकार की चाहे जो भी मंशा रेल बजट 2013 में बुंदेलखंड को छले जाने की रही हो मगर पानी के व्यापार का बाजार बुंदेलखंड जैसे इलाकों को तो हरगिज ही नहीं बनाया जाना चाहिए था। क्या नई रेल देने, झांसी से वाया बांदा-मानिकपुर तक सिंगल लाइन पटरी के दोहरीकरण करने, दिल्ली से वाया झांसी-इलाहाबाद नई रेल चलाने से यहां के लोगों को रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं होते ? और क्या पर्यटन की दृष्टि से झांसी, ओरक्षा, महोबा की चरखारी तहसील, बांदा जिले के कालिंजर, चित्रकूट जैसे अति महत्वपूर्ण पर्यटक स्थलों तक नए रेल यातायात सुलभ कराने से रेलवे को आर्थिक लाभ नहीं होता ? ऐसा क्यों और किन हालातों में नहीं किया गया इसका माकूल जवाब जनपथ में बैठे हुए सियासी हुकमरान ही दे सकते हैं।

    बुंदेलखंड में सबसे ज्यादा प्रभावित इलाके

क्षेत्र                अगस्त 2009        वर्तमान     गिरावट ;आंकडे मीटर मेंद्ध
हमीरपुर ;मौदहाद्ध        7.60             11.45         3.85
ललितपुर ;मंडवाराद्ध         3.30            7.10        3.80
चित्रकूट ;हरीसनपुराद्ध     14.10            17.13        3.3
बांदा ;चिल्लाद्ध         14.60             17.16        2.56
जालौन ;बांगरद्ध         2.65        4.95        2.30
महोबा                10.82        12.02        1.22  स्रोत- केंद्रीय भूमिजल बोर्ड


आशीष सागर (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

Mar 4, 2013

Nature Walks with Adams

 Nature walks with Adams Educational Tours

Company Profile

ADAMS EDUCATIONAL TOUR is a formed and framed group by the people affiliated to traveling and creative arts program since 1998. Ours is a professionally managed concern by people who have dedicated themselves to serve as guides, travel planners and creative designers in different regions of India and overseas from last fifteen years.

The wide ways of traveling and discovering new places of our beautiful land and making an excursion with  value added educational trip or a personal package a success, needs a very wide concept of knowledge. Satisfying the customer requires a lot of skill and to make their trip an unforgettable one, Adams Educational Tour has the quality to make things interesting and easy at all levels, for its esteemed patrons.

We, the people at ADAMS have started with a motive to provide the varied historical and geographical information about the place of visit to all our students, professionals and tourists for making it an enjoyable and memorable. Adams, possesses great experience in the field of arranging such excursion tours. 

The company philosophy of “Serving the students, tourist for quality traveling at affordable prices” has spurred our dedicated team of research and planners to evolve a dynamic, interactive and economical package.

Hoping for along term association with your esteemed institution.

From the desk of the Director

Contact Person
Destination Manager
Cellular: +91-9928415073
emails: deep.adamsjaipur@gmail.com
deep.roversgroup@gmail.com
              
           
List of Schools and Colleges – Our major clients.

    University of Maharani College, Jaipur
    ICG Girls College, Jaipur
    Mayo Girls, Ajmer
    All Saints School, Ajmer
    Kanoria PG Girls College, Jaipur
    Delhi Public School, Jaipur
    Sanskar School, Jaipur
    Tagore Public School, ( All 09 Branches),  Jaipur
    Tagore NRI School, Jaipur
    SRN International School, Jaipur
    Commerce College, Jaipur
    Sanjay Public School, Jaipur
    BanasthaliVidyapeeth, Banasthali
    Department of Biochemistry, Maharani College, Jaipur
    Department of Zoology, Rajasthan University, Jaipur
    Col. Brown Cambridge School, Dehradoon
    LalBahadurShastri Institute of Management, Lucknow
    Oak Wood, Shimla
    Raffles International School, Behror
    St. Amtuls School, Nainital
    Mahatma JyotiRaoPhoole College, Jaipur
    St. Francis College, Lucknow
    Carmel Girls Inter College, Lucknow
    Mahanagar Boys College, Lucknow
    Loreto Convent Girls College, Lucknow
    Avadh Girls Degree College, Lucknow
    Sankrirti School, Ajmer
    R.I.E.T Jaipur
    Poornima College , Jaipur
    SKIT AND VIT College, Jaipur

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था