डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jan 1, 2012

गन्ने के खेत में बाघिन की मौजूदगी


दुधवा की बाघिन मितौली तक आ पहुंची अपने बच्चे के साथ-
केन टाइगर.....
मितौली-खीरी: लखीमपुर खीरी जनपद के मितौली विकास क्षेत्र में स्थित ग्राम पंचायत दानपुर में 29 दिसम्बर कों एक बाघिन ने अपनी उपस्थिति दर्ज की, गन्नें के खेतों में काम करने वाले ग्रामीणों के मुताबिक ये बाघिन अपने बच्चे के साथ है, जब अल-सुबह वह खेतों में काम करने पहुंचे तो इस धारीदार खूबसूरत जानवर से इनका सामना हुआ, नतीजतन लोगों नें खेतों में काम करना बन्द कर रखा है।


गन्ने की फ़सल वाले इस विशाल भू-भाग में जहां तहां गेहूं के खेत मौजूद है, जिनमें हालिया सिंचाई की जा चुकी है, और यही वजह रही कि इस बाघिन के पगमार्क यानि पन्जों के निशान गीली मिट्टी में हुबहू छपे हुए है।


 कस्ता सहकारी समिति के अध्यक्ष विवेक सिंह जो ग्राम-सभा दानपुर के निवासी है, ने मुझे यह सूचना दी, कि बाघ की आमद मितौली क्षेत्र में है, और उन्होंने इसके पद-चिन्हों की छाप देखी है। इनकी सूचना पर मैं 31 दिसम्बर की शाम उस खेत में पहुंचा जहां बाघ के चिन्ह मौजूद है, प्रथम दृष्टया यह पगमार्क बाघिन के है, ऐसा स्पष्ट हो रहा है, कुछ दूर चलने पर कुछ अस्पष्ट छोटे पगमार्क मिले जिन्हे बाघिन के शावक के बताये जा रहे है। इन पद-चिन्हों की तस्वीरे उतार ली, और साउथ खीरी वन प्रभाग के डी०एफ़०ओ० से सम्पर्क करने की कोशिश की किन्तु सम्पर्क न हो सका। 



लखीमपुर खीरी में स्थित दुधवा टाइगर रिजर्व से बाघों की आमद-रफ़्त इन गन्नों के खेतों में हमेशा से होती रही है, तराई जनपद खीरी शुगर मिल्स व गन्ने की पैदावार के लिए विश्व-पटल पर एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, गन्नें की फ़सल जो कैश-क्राप के अन्तर्गत है, इसलिए किसान अपनी जमीनों पर अधिक से अधिक क्षेत्रफ़ल में गन्ने की फ़सल उगाते है, जो दुधवा के जंगलों से सटकर पूरे जनपद तक एक {मानव-जनित} घास के मैदान का आभास कराता है।

बाघों के मध्य इलाकों को लेकर संघर्ष, भोजन यानि शिकार की अनुपलब्धता, बाघिन द्वारा अपने शावकों की नर बाघों से सुरक्षा आदि कारणों से ये जानवर मानव द्वारा तैयार गन्ने की फ़सल में आते रहे है, जो इन्हें प्राकृतिक ग्रास-लैण्ड का आभास कराते है, साथ ही इन कृषि क्षेत्रों में इन्हे नील-गाय, सुअर, खरगोश जैसे शिकार भी मिल जाते है, या फ़िर ग्रामीणों के मवेशियों को भी ये अपना शिकार बना लेते है। अपने वजूद को बचाये रखने के लिए स्थान से विस्थापन इनकी ही नही पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक जीव की वृत्ति में मौजूद है।

इस बाघिन व इसके शावक की मौजूदगी का एक और प्रमाण कस्ता  ग्राम सभा के पूर्व प्रधान द्वारा बताया गया कि कस्ता गांव के समीप स्थित गन्ने के खेत में एक नील-गाय का खाये जा चुके शव के हिस्से प्राप्त हुए है। नील-गाय का शिकार इन इलाकों में बाघ के सिवा अन्य कोई नही कर सकता है, क्योकि मानव आबादी के मध्य अब सिर्फ़ दोयम दर्जे के शिकारी जीव बचे हुए है, जैसे सियार, कुत्ते इत्यादि।


बाघ की जंगल से इतनी दूर इस मौजूदगी को गम्भीरता से लिया जाए,  और इसकी मानीटरिंग की जाए, ताकि मानव-शिकारियों से इसकी सुरक्षा की जा सके, साथ ही यह बाघिन अपने व अपने बच्चे के जीवन को बचाने में यदि कोई मानव को शिकार बनाती है, तो इसे मानव-भक्षी का तमगा पहनाकर या तो कैद कर दिया जायेगा किसी चिड़ियाघर में या फ़िर इसे मौत दे दी जायेगी जैसा कि वन विभाग हमेशा से करता है।

 कृष्ण कुमार मिश्र
 editor.dudhwalive@gmail.com

2 comments:

Aflatoon said...

बारहसिंगे के परिवार के करीब होने के बावजूद नाम से 'गाय' जुडा होने के कारण इसे बाघिन ही अपना भोजन बना सकती है।यह संतुलनकारी हुआ।

कृष्ण said...

जी बिल्कुल सही, एक बात और कभी ये इलाके बाघों के प्राकृतिक वास हुआ करते थे, आज जहां गन्ने के खेत है, वहां कभी शाखू और महुआ आदि के जंगल व घास के मैदान थे, कई नदियों की जलधारायें भी...अब जंगल तो नही बचे हां नदियां जरूर पगडण्डियों की तरह चमकती हुई दिखाई देती है...अपने अस्तित्व के जद्दोजहद में..बारिश उनके वजूद को थोड़े दिनों के लिए मजबूती जरूर दे देती है और फ़िर...

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