डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Mar 1, 2011

मरती नदियां मरते लोग..


नदी बांध परियोजनायें है पानी व किसान की मौत !


मर रही नदियों का जिम्मेदार कौन?
प्रवास संस्था ने नदियों को बचाने का लिया संकल्प...

तो फिर होगे 6700 किसान विस्थापित, कुछ कर रहे है आत्मदाह तो बाकी है तैयारी में, मुवावजे और पुर्नवास की जद्दोजहद में आंदोलन शुरू, कैसे बनेगा संभावित बिन पानी बुंदेलखंड राज्य आत्मनिर्भर, विदेशी कंपनी - सरकारे तय करेगी पानी का मोल, अनसुलझे तथ्यों को ढोती ये करोडो की परियोजनायें, बांध परियोजना में प्रस्तावित है 806.50 करोड रू0 जिसमें की परियोजना विस्तार में 2009-10 की समयावधि तक 24.30 करोड रू0 केन्द्रीय अंशदान में जारी किये जा चुके है तथा 160.315 करोड रू0 2010-11 के लिये अनुदानित राशि रिलीज की जा चुकी है इस परियोजना के प्रभाव क्षेत्र मे शामिल है 59 बडे व अन्य छोटे मजरे मिलाकर कुल 112 गांव जिनमें कि बांदा के 9 , हमीरपुर 29, महोबा 21 और डूब क्षेत्र में आते है महोबा जनपद के कबरई इलाके में बसने वाले 4 गावों के बासिंदे जिनमें कि झिरसहेबा, गंज , अलीपुरा, गुगौरा इस लिंक बांध की कुल लम्बाई है 165.40 कि0मी0 लेकिन उचित मुवावजे को नजरअंदाज करने वाली शासन सरकारो के विरोध मे लामबंद हुये किसान मांग रहे है बतौर विस्थापन , पुर्नवास की कीमत सात लाख रू0 प्रति हेक्टेअर भूमि मगर सरकार ने दी सरकुलर रेट के मुताबिक कहीं पर 2.20 लाख तो कहीं पर 4.5 लाख प्रति हेक्टेअर ।

पलायन और तबाही का मंजर
तो फिर गुजरे 17 सूखे झेल चुके बुंदेलखंड के किसान एक मर्तबा फिर केन्द्र सरकार व राज्य सरकार द्वारा बुदेलखंड क्षेत्र विशेष के लिये सिंचाई के माकूल संसाधन उपलब्ध कराने के लिये बनायी जा रही अर्जुन सहायक बांध परियोजना के चलते विस्थापित होगे, पुर्नवास के लियेजद्दोजहद करेगें फिर चाहे भले ही इसकी कीमत उन्हे आत्मदाह, आंदोलन और जनआक्रोश के द्वारा सडको , खेतो, प्रशासनिक अमलो के सामने विरोध के रूप में प्रस्तुत करनी पडे। बताते चले कि बिन पानी बुदेलखंड में अब तक वर्ष 1887 से लेकर 2009 तक कुल 17 सूखे जिनमें की 2005-06 का भयावह अकाल भी शामिल है के बावजूद यहां के किसानो के लिये सरकार ने न तो उनकी आत्महत्या की पूरी कीमत चुकायी और न ही भूमि अधिग्रहण किये जाने के बाद उन बदहाल किसानो को पूरा मुवावजा दिये जाने का कदम उठाया है। आखिर क्या करें बुंदेलखंड का गरीब किसान जिसके पास न तो वर्ष का बीज उपलब्ध होता है और न ही घरो में भूख से टूटते परिवारो को बचाने के लिये दो जून की रोटी ये बात अलग है कि कहीं पर इस अकाल से उबरने के लिये बुंदेलखंड की वीर महिलाये मुफलिसी और अकाल से निजात पाने के लिये अपने ही गांव में पिता को कर्ज से दबा देखकर आत्महत्या करने की तरफ बढते हुये कदमो को रोकने के लिये दादरे की आखत जैसे तत्कालीन लेकिन वैकल्पिक उपायों का सहारा लेती है।

    गौरतलब है कि सूचनाधिकार अधिनियम 2005 के तहत केन्द्रीय जलायोग के निदेशक श्री जोगेन्दर सिंह ने दी गयी सूचनाओं के अनुसार बताया है कि अर्जुन सहायक बांध परियोजना की कुल लागत प्लानिंग कमीशन कंे अनुसार 806.50 करोड रू0 है जिसके लिये 90 फीसदी केन्द्र सरकार व 10 फीसदी राज्य सरकार का रू0 अनुदान राशि में सम्मिलित किया गया है। परियोजना विस्तार में 2009-10 की समयावधि में 24.30 करोड रू0 व 2010-11 के लिये 160.315 करोड रू0 जारी किये जा चुके है। उन्होने बताया कि इस लिंक को बुंदेलखण्ड क्षेत्र के महोबा जनपद की धसान नदी से जोडकर 38.60 कि0मी0 लम्बी नहर लहचुरा डैम जिसकी क्षमता 73.60 क्यूमिक पानी को रोकने की है से अर्जुन बांध में मिलाया जायेगा तथा 31.30 कि0मी0 लम्बी लिंक नहर अर्जुन बांध से नये कबरई बांध जिसकी क्षमता 62.32 क्यूमिक पानी रोकने की है को शिवहार चंद्रावल बांध से मिलाते हुये जनपद बांदा की केन नहर से जोडा जाना प्रस्तावित है । वर्षा जल संग्रहण के मद्देनजर बरसात मे कबरई डेम 9.23 मी0 से 163.46 मी0 जलस्तर बडने पर 1240 हेक्टेअर मी0 से 13025 हेक्टेअर मी0 तक की भूमि को कृषि के लिये सिंचाई का जल उपलब्ध करायी जाने की परियोजना की डी0पी0आर0 में बात कहीं गयी है। वहीं इस पूरी नहर बांध की कुल ल0 165.40 किमी0 है जिसमें 50 किमी. नये कबरई बांध व 115.40 किमी0 अन्य विस्तारित माइनर की लं0 रखी गयी है। 


सूखे कुएं

इस परियोजना बांध मे कुल 149, 764 हेक्टेअर भूमि समतली करण के अध्रिग्रहण का प्रस्ताव  है जिसमें कि वार्षिक समतलीकरण 59, 485 हेक्टेअर भूमि महोबा क्षेत्र से ली जानी है इन जमीनो के अधिग्रहण को लेकर जहां एक तरफ प्रभावित क्षेत्र के कुल 112 गांव जिनमें की जनपद महोबा से करबई , कबरई , मरहटी, टोला उत्तर, गोहारी, कैमहा , इमलहाई , सिरसीकलां, कहला, बंहिंगा , सिरसीखुर्द , बधवा , नहदौरा, घंडुवा , तिदुही, खिरूही, नायकपुरवा, अतघार, पचपहरा, खम्हरिया, रूपनगर, अकगेहा, घुटवई , राइलपुर, बेरीखेडा ,सुदामापुरी , उदयपुरा, इमलीखेरा, बनमेथा, इटवा, सुईजना, फतेहपुर, इमलिया डाड़ , दयालपुरा , बगरौन , छिकहरा, बरातपहाड़ी, गंज, गुगौरा एवं जनपद हमीरपुर के खंडेह अकबई, जिनौड़ा, इचौली, गुसियारी, अडाईपुरवा, कपसा, टिकरी बुजुर्ग , भटरी, तिदुआ, चांदीखुर्द , बेहरका, सिजवाही, घटकना, पाखून, लेवा, बेजेमऊ, किसवासी, परहेटा व बांदा के नूरपुर , मोहनपुरवा, उजरेहटा, गोयरामुगली, अछरौड़ , त्रिवेनी, उजरेहटा, सुरौली बुजुर्ग , सुरौली खुर्द , अमरौली के साथ छोटापुरवा जैसे बडे छोटे गांव लिंक क्षेत्र में आते है।

मगर क्या करे उन किसानो का जो बीते 6 माह से इस भूमि अधिग्रहण काला कानून जो के बिट्रिश शासन की देन है से आजिज आकर अधिग्रहण की मार झेलते हुये अपने मुवावजे की मांगे कर रहे है। केन्द्र सरकार के मुताबिक बांध क्षेत्र के लिये ली गयी जमीनो का मुवावजा 2.20 लाख प्रति हेक्टेअर सरकुलर रेट के तहत है लेकिन यह कही पर 4.5 लाख प्रति हेक्टेअर भी दिया गया है जिनमें गंज ,धरौन , गुगौरा, जैसे गांव आते है। कहीं कहीं सरकार की पक्षपातपूर्ण नीति से किसानो में आपसी असंतोष भी उपजा है इसी के चलते ग्राम झिरसहेवा के युवा किसान रामविशाल कुशवाहा ने गुजरे दिवस नायब तहसीलदार सदर एम0 ए0 फारूकी के सामने धरना प्रदर्शन के समय कैरोसीन का तेल डालकर आत्मदाह कर लिया मौके पर मौजूद किसानो ने बताया कि तकरीबन 100 मी0 तक मृतक किसान आग का गोला बनकर नेशनल हाइवे 76 की तरफ दौड पडा लेकिन किसी की भी इतनी जहमत नही हुयी कि वो उसकी जिंदगी को बचा पाता वहीं नायब तहसीलदार इस घटना को देखकर मौके से फरारा हो गये। आज भी इस बांध परियोजना से आहत किसान एकजुट होकर संघर्ष पर उतारू है। हाल कुछ भी हो इन किसान आंदोलन का पर तयशुदा है कि वर्ष के 6 महीनो में पानी को निहारते पत्थर वाली नदियां भला कैसे बांध परियोजना से किसानो के लिये सिंचाई का पानी मुहैया करा पायेगी। आधे अधूरे अध्ययन और प्लानिंग कमीशन में बैठे आला अधिकारियों को न तो देश प्रदेश की भूगौलिक क्षेत्रो का अनुमान होता है और न ही वहां कि परिस्थिति का आंकलन फिर कैसे और क्यों तैयार होती है नदी बांध परियोजनायें जो कि पानी व किसान की मौत का एक मात्र कारण है।


आशीष दीक्षित "सागर" (लेखक सामाजिक कार्यकर्ता है, वन एंव पर्यावरण के संबध में बुन्देलखण्ड अंचल में सक्रिय, प्रवास संस्था के संस्थापक के तौर पर, मानव संसाधनों व महिलाओं की हिमायत, पर्यावरण व जैव-विविधता के संवर्धन व सरंक्षण में सक्रिय, चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय से एम०एस० डब्ल्यु० करने के उपरान्त भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय के उपक्रम कपाट में दो वर्षों का कार्यानुभव, उत्तर प्रदेश के बांदा जनपद में निवास, इनसे ashishdixit01@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

1 comments:

आशीष सागर said...

Jane Kaisa hai ye Es Desh ki Sarkaro ka Rog ,
Marti nadiya aur Marte Log !
Pani ko Band Botlo me Enki Taiyari hai , Hamari Janta ko Enko hi Sarkar Banane ki Aadatn Bimari hai....

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