डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 6, 2010

मौत का भयानक रूप....?

रैबीज यानि मौत का विकराल ताण्डव: 
Rabies virus photo courtesy: educational communication board
सन २०१०, एक सौ पच्चीसवाँ वर्ष है, रैबीज के टीके के अविष्कार का, जब लुईस पाश्चर ने सफ़लतापूर्वक इस वैक्सीन का परिक्षण किया था। इस जीवन रक्षक वैक्सीन के ईजाद हो जाने के बावजूद आज भी पूरी दुनिया में ५५,००० मौते रैबीज के कारण होती है, जिनमें ९५ फ़ीसदी मौते अफ़्रीकी व एशियाई देशों में होती हैं।

भारत में रैबीज का ताण्डव दिल दहला देने वाला है, यहाँ हर आधे घण्टें में एक जान रैबीज की वजह से जाती हैं, और भारत में रैबीज से होने वाली मौतों की यह रफ़्तार दुनिया के हर देश से ज्यादा है।



Photo Courtesy: Wikipedia
लुई पाश्चर
लुई पास्टर फ़्रान्स के महान रसायनज्ञ एंव जीवाणुतत्ववेत्ता थे, इनका जन्म दिसम्बर २७, सन १८२२ को फ़्रान्स के "डोल" शहर में हुआ, इन्हे तमाम भयानक रोगों के निवारण के लिए जाना जाता हैं। इनकी खोजों से  चाइल्डबेड फ़ीवर के कारण होने वाली मृत्यदर में कमी आई, साथ ही एन्थ्रैक्स के बैक्टीरिया तथा रैबीज  के विषाणुओं के कारण होने वाली भयानक मौतों से मनुष्य जाति को छुटकारा मिल सका। दरसल लुई की पाँच सन्तानों में से तीन की मृत्यु टायफ़ायड की वजह से हुई, और इस व्यक्तिगत त्रासदी ने उन्हे बीमारियों के निराकरण की ओर उन्मुख किया, नतीजा हम सब के सामने है, रैबीज जैसे घातक वायरस का इलाज।
एन्थ्रैक्स व रैबीज के टीको का अविष्कार लुई ने किया।
पाश्चराइजेशन विधि का अविष्कार लुई ने ही किया, जिसमें दूध जैसे महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ को सरंक्षित करने का बेहतर तरीका मिल सका।  किण्वन के कारण दुग्ध व  अन्य खाद्य पदार्थ नष्ट  होने लगते है, जो कि पाश्चराइज करने के उपरान्त उसमें जीवाणुओं की वृद्धि रूक जाती है। पाश्चराइजेशन विधि में दूध को एक निश्चित तापमान तथा निश्चित समय के लिए गर्म किया जाता है फ़िर तत्काल उसे ठण्डा करते है, इस प्रक्रिया से गुजरने के पश्चात दूध में हानिकारक वैक्टीरिया पनप नही पाते। इस विधि का पहला परीक्षण लुई और उनके साथी क्लाड बर्नार्ड ने अप्रैल २०, सन १८६४ में किया था।
जैव-उत्पत्ति (bio-genesis) का सिद्धान्त भी लुई पाश्चर द्वारा प्रतिपादित किया गया, जिससे सैकड़ों वर्ष पुराने "स्वाभाविक उत्पत्ति" (spontaneous genesis) के सिद्धान्त का अन्त हुआ।



विश्व रैबीज दिवस, जो कि प्रत्येक वर्ष सितम्बर की २८वीं तारीख को मनाया जाता है, इस दिन यानि २८ सितम्बर सन १८९५ को लुईस पाश्चर की मृत्यु हुई थी, उनकी स्मृति में उनकी पूण्य तिथि के दिन को "विश्व रैबीज दिवस" के रूप में मनाया जाने लगा। और अब यह दिन यह विश्वास दिलाता है, कि रैबीज से होने वाली भयानक मौत से बचा जा सकता है, इसका ईलाज हैं।
रैबीज जानवरों व मनुष्य के मध्य प्रसारित होता है, जब कोई मनुष्य किसी रैबीज वाहक/ संक्रमित जानवर के द्वारा काटनें व नाखूनों द्वारा घायल किए जाने से संपर्क में आता हैं। भारत में यह संक्रमण अधिकतर कुत्तों के काटने से फ़ैलता हैं।
मानव शरीर में रैबीज के वायरस के पहुंचने पर, सर्वप्रथम ये मनुष्य की मांसपेशियों में अपनी सख्या बढ़ाते हैं, फ़िर तन्त्रिका कोशिकाओं द्वारा रीढ की हड्डी में पहुंचकर मानव मस्तिष्क में प्रवेश कर जाते हैं, मस्तिष्क में यह अपनी तादाद को और बढ़ाते हैं, यह प्रक्रिया एक महीने से तीन महीने तक की हो सकती हैं, मस्तिष्क में वायरस के पहुंच जाने पर संक्रमित व्यक्ति की मृत्यु निश्चित होती हैं।
रैबीज वायरस के संक्रमण के पश्चात मृत्यु निश्चित है, इसका कोई माकूल ईलाज नही है, सिर्फ़ अपवाद स्वरूप कोई व्यक्ति इस मौत के भयानक राक्षस से विजयी हो पाता हैं। केवल रैबीज के संक्रमण से पूर्व वैक्सीन ही मात्र इसका एक सफ़ल रोकथाम हैं।
लुई पास्टर और उनके सहयोगियों ने सबसे पहले संक्रमित खरगोश से रैबीज की वैक्सीन का निर्माण किया। रैबीज से ग्रसित खरगोश की रीढ़ की हड्डी को निकालकर काफ़ी समय तक सुखाया गया, जब तक कि रैबीज की कमजोर रूप को प्राप्त न किया जा सके, इस जटिल प्रक्रिया के बाद टीके का जो निर्माण हुआ वह कमजोर वायरस से मजबूत वायरस की एक श्रंखला के रूप में था।
इस टीके को सबसे पहले कुत्ते पर आजमाया गया। सन १८८५ में लुई की प्रयोगशाला में  एक बुरी तरह से कुत्ते के काटने से हुए घायल बालक को यह वैक्सीन दी गयी। यह बालक ९ वर्ष का था और इसका नाम जोसेफ़ मेस्टर था, यह प्रथम मनुष्य था जिसे रैबीज की वैक्सीन दी गयी थी। बाद में लुई पस्टर की प्रयोगशाला में वैक्सीन का निर्माण व सफ़ल वैक्सीनेशन निरन्तर १९६० तक चलता रहा।
सेम्पल वैक्सीन:
सन १९११ में लेफ़्टीनेन्ट सर डेविड सेम्पल की नियुक्ति केन्द्रीय शोध सम्स्थान कसौली हिमाचल प्रदेश में हुई,  इनके द्वारा रैबीज की वैक्सीन का निर्माण शीप के मस्तिष्क में रैबीज के वायरस का रेप्लीकेशन कराकर किया गया। यह काफ़ी सरल प्रक्रिया थी। सर दविड सेम्पल के नाम पर सेम्पल वैक्सीन के नाम से जानी गयी।
हांलाकि इस वैक्सीन के तमाम दुष्परिणाम भी थे, जैसे तन्त्रिका तन्त्र का कमजोर होना, पक्षाघात आदि। यह वैक्सीन सन २००४ तक निरन्तर भारत में इस्तेमाल होती रही हैं।
नई वैक्सीन:
यह वैक्सीन शोधित कोशिकाओं एंव बतख के भ्रूण द्वारा निर्मित होती हैं, यह ज्यादा प्रभावी हैं, और इसके खास दुष्प्रभाव भी नही हैं, किन्तु यह अत्यधिक महंगी हैं, जोकि भारत जैसे अर्थ व्यवस्था वाले देश में आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती है यह वैक्सीन, जो उनके लिए जीवन हैं! विशेषज्ञों ने इस वैक्सीन के उपयोग का एक नया तरीका निकाला है, जिससे यह वैक्सीन कम मात्रा में भी अधिक प्रभावी है, और इसकी लागत भी कम हो जाती हैं। अब यह वैक्सीन मांस में न लगाकर त्वचा के नीचे लगाई जाती हैं।
भारतीय गणराज्य के १३ प्रदेशों में नये टीकों का प्रयोग किया जा रहा हैं। 

इम्युनोग्लोबुलिन: रैबीज में जीवन रक्षक दवा-
रैबीज द्वारा बुरी तरह से संक्रमित होने पर मरीज को सीधे प्रयोगशाला में निर्मित एन्टीबाडीज दी जाती है< जिन्हे इम्युनोग्लोबुलिन के नाम से जानते हैं। हांलाकि रैबीज के खिलाफ़  तैयार यह एन्टीबाडीज बहुत महंगी पड़ती हैं।


 रैबीज के प्रसार में कुत्तों का सर्वाधिक योगदान हैं, यदि इन कुत्तों का टीकाकरण कराया जाय, तो यह मौत का वयारस थम सकता है, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक थाईलैण्ड, व श्रीलंका में अभियान चलाकर कुत्तों का वैक्सीनेशन कराया गया, नतीजतन वहां रैबीज से काफ़ी हद तक निजात मिल गयी।
रैबीज तमाम जंगली प्रजातियों को भी संक्रमित करता है, यह बड़ी भयानक स्थिति होती है उस समष्टि के लिए...खासतौर से जंगलों से सटे ग्रामीण इलाकों के कुत्तों द्वारा, सियारों आदि में यह संक्रमण हो जाता है, और यह खतरनाक वायरस जंगल में भी अपनी दस्तक दे देता है।
सरकार यदि इन दो प्रजातियों को इस मौत के ताण्डव से बचाना चाहती है, जिनका सामाजिक ताना-बाना आपस में गुथा हुआ है, तो रैबीज का टीककरण एक बड़े अभियान के तौर पर शुरू करे! इसमें गैर-सरकारी संगठनों को भी आगे आना चाहिए......नही तो इस भयंकर मौत के ताण्डव को रोका नही जा सकता....नष्ट होता तन्त्रिका तन्त्र....कुरूप होते शरीर.... अनियन्त्रित दिमाग,  घुटन....से मरती ये दोनों प्रजातियां....भयावह...!!


कृष्ण कुमार मिश्र ( प्रकृति व प्रकृति के इतिहास में गहरी दिलचस्पी, किताबे, कैमरा, और जंगल से जुड़ाव, आजकल इन्सानी व्यवहार के असफ़ल अध्ययन में व्यस्त हैं....! इनसे krishna.manhan@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

3 comments:

Dr. shyam gupta said...

कुत्तों के वेक्सीनेसन की बात एक दम सही है परन्तु अभी भारत में मनुष्यों को ही एन्टी रेबिक वेक्सीन पूर्ण रूप से उपलब्ध नहीं है कुत्तों के लिये कहां से आये.....

marie muller said...

rabies is a viral disease that can be transmited to men by scratching, ,biting,
from infected animals such as dogs ,bats,monkeys,cats....and the scary thing is that letality is around 100% ...
so this is why
imunization of animals...so important!!!!
i remember i had a indian friend bite by a dog.. pet dog..infected with rabies...and i was so so worried about him...but hes fine,imunization saved his life.,..

and ..here in Brasil..we have regular governemt campain free all over the country to imunizate animals..pets and all...

sushant jha said...

बढ़िया लेख। आजकल लोग जब वन्यजीव की जब बात करते हैं तो वेचारे कुत्तों पर तो किसी का ध्यान ही नहीं जाता। वैसे भी रेवीज के बारे में सब बात करते हैं लेकिन शायद ही कहीं इस पर इतना अच्छा लेख मिले। कृष्णकुमार जी आपको इसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

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