डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 23, 2010

दुधवा टाइगर रिजर्व में रेलगाड़ी ने फ़िर ली हिरणों की जान

किशनपुर वन्य जीवविहार में हुआ ये हादसा...
हिरणों को रौंदते हुए गुजर गयी रेल....
 मैलानी रेन्ज में राजनरायनपुर रेलवे स्टेशन के आस-पास घटित हुई ये दुर्घटना...
प्रशान्त "पीयुष"(खीरी) दुधवा से निकली रेल ट्रैक बेजुबानों की मौत का सामान कब तक बनती रहेगी ये एक बडा सवाल है, जो हर बार उठता है? इस बार फिर ट्रेन दो चीतलो को मौत की नींद सुला गई। वाकया २१ दिसम्बर का है, सुबह का समय था.....ये जोड़ा सुबह की मस्ती मे चरने निकला था...कोहरे की चादर  थी... चीतलो का ये जोड़ा अपनी ही उमंग में था अभी ये जोड़ा चरते हुए आगे बढ़ रहा था, कि अचानक रेल पटरी आ गई... ये दोनो उस पर से पर जाने लगे ......पर अचानक जंगल का सीना चीरती  ट्रेन..मैलानी की तरफ से आ गई...जब तक ये दोनो बेजुबान कुछ समझते तब तक...बहुत देर हो चुकी थी...धड़धड़ाती हुई ट्रेन इन दोनो के चिथरे उड़ाते हुए ,रौन्दते उपर से निकल गई...दोनो ट्रैक पर खून से लतपथ परे थे...ट्रेन की आवाज धीरे-धीरे जंगल की खामोशी में गुम हो गई..और इन मासूमों की आवाजे तो शायद..मुंह मे ही घुट के....किसी ने खबर दी दुधवा का पार्क प्रशासन पहुंचा...देखा गया तो पता चला कि.. एक नर चीतल था एक मादा....मादा गर्भ से थी...जल्द ही जंगल मे खुशिया आने वाली थी..पर कातिल रेल ने पहले ही सब...खत्म  कर दिया....बच्चे ने जन्म से पहले दम तोड दिया वो भी कुछ इस भयावह तरह से...पार्क प्रशासन ने कागजी कार्यवाही  शुरू की.... वही...पोस्टमार्टम और लिखा-पढी ...शायद फिर रेल वालो को पत्र भी भेजा जाए...मुकदमा भी दर्ज करवाया जाए...पर इस सब से क्या होगा...जंगल और जीव जन्तु के तथाकथित बचाने वाले भी शायद शोर मचाए...पर वो सब नक्कार-खाने में तूती की तरह...ही साबित होगा....पर बडा सवाल ये भी है, की क्या बेजुबान इसी तरह मरते रहेंगे?  जंगल  की खुशिया क्या इस चीतल परिवार की तरह...उजड़ती रहेंगी? क्या इसी तरह खत्म होते रहेंगे,  ये बेजुबान अपने ही घर में? 

पहली घटना नही  है...ये?
देश भर में जंगल से निकाली ट्रेन ट्रैक तमाम जंगली जन्तुओ को समय से पहले ही मौत की नींद सुला रहे है...कही जंगली हाथी, तो कभी बाघ ,भालू और घड़ियाल....हम दुधवा की ही बाट करे तो करीब ६० किलोमीटर से ज्यादा जंगल से गुजरी रेल ट्रैक हर साल ही कोई न कोई वन्य जीव को मौत की नींद सुला रही  है...पिचले तीन महिलो मे ही यहाँ ८ चीतल ट्रैक से कट के मर चुके है...२४ अक्टूबर को दुधवा के ही कतरानिया घाट मे ५ चीतल ट्रेन से कट गए....३ नवम्बर को यही १ चीतल ट्रेन की चपेट मे आकार मौत के मुंह मे चला गया. 

बिली अर्जन सिंह ने कई बार लिखा था पत्र....
टाइगर मैन  के नाम से जाने जाने वाले बि्ली अर्जन सिंह कई बार उत्तर प्रदेश और केन्द्र सहित रेलवे को पत्र लिख कर दुधवा से निकाली ट्रेन को जंगल सेबहर निकाल्ने को लिखा..कई बार बिली खुद प्रधानमन्त्री और अफसरो से भी मिले और मांग की की दुधवा की रेल ट्रैक को हटाय जाए पर उनकी ये इच्छा पुरी नही हो पाई.

लकडी ढोने को बिछी थी रेल...
दुधवा मे रेल ट्रैक साखू की लकडी ढोने को बिछी थी...अंग्रेजों ने देश भर मे रेल पटरी बिछाने के लिए साखू के जंगल को काट कर बेशकीमती लकडी को देश भर में तराई के इस क्षेत्र से ही पहुंचाया। पर अब ये बेजुबानो की मौत का सामान बन रही है.

5 comments:

Anonymous said...

This issue need to be sorted out by the Railway ministry....but unfortunately the most profitable and biggest employer of the world is not willing to discuss this ......Rohit

शरद कोकास said...

सीधी सी बात है अव्वल तो जंगल से रेल की पटरियाँ जानी ही नहीं चाहिये और अगर गईं हैं तो उनके दोनो ओर बाड़ लगाना चाहिये ।

दीपक बाबा said...

शरद कोकास जी से सेहमत हूं......

marie muller said...

http://sphotos.ak.fbcdn.net/hphotos-ak-snc4/hs1236.snc4/156824_1748149182045_1188280368_31959170_4261748_n.jpg

Anonymous said...

if you put baad...then it will cause population isolation.....Rohit

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