International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Jul 30, 2010

नही रहा सुमित!

सुमित हा्थी और महावत
दुधवा लाइव डेस्क* नही रहा सुमित! हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ
चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था, अब न तो वह बारातों में शामिल हो सकता था और न किसी अन्य प्रशासनिक जलसे में, कहने को उसे राजकीय सम्मान से भी नवाजा गया, पर बेकार हो चुके जानवर की क्या कीमत, वह पर्यटको को अपनी पीठ पर लादकर सैर भी नही करा सकता! लिहाजा उसे दुधवा नेशनल पार्क भेजकर चिड़ियाघर प्रशासन ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लिया, साथ ही उस ६५ वर्षीय बूढ़े व लाचार हाथी की पेन्शन भी बन्द कर दी गयी! सूत्रों के मुताबिक किसी तरह की अन्य सहयोग राशि भी दुधवा प्रशासन को नही दी जा रही थी, जिससे वह इस बीमार अशक्त हाथी की देखभाल कर सके!

बताते चले कि स्थापना के दो दशकों से अधिक समय के बावजूद दुधवा टाइगर रिजर्व में कोई वन्य-जीव चिकित्सक की तैनाती नही की गयी, और न ही यहाँ कोई वन्य-जीव चिकित्सालय है! पलिया के स्थानीय वेटनरी डाक्टरों के इलाज पर निर्भर और दुधवा के महावतों द्वारा जो पहले से ही १७ पालतू हाथियों की देखभाल के लिए कम है, की गयी सेवा पर यह लाचार गजराज कब तक जीवित रह सकता था!आखिरकार सुमित ने बुधवार को दुधवा के जंगलों में अपनी जीवनलीला की आखिरी साँस ली! इसी के साथ उस निरीह जीव ने मानवीय संवेदनाओं और प्रशासनिक कारगुजारियों पर तमाम सवाल खड़े कर दिए! कहते है सुमित को बचपन से ही आँखों में कम दिखाई देता था फ़िर भी उसे बारातों के चकाचौध और पटाखों रवाइशों गर्जना व धुए से भरे प्रदूषित माहौल में जाना होता था! एक हाथी जो प्रवृत्ति से इतना शर्मीला होता है कि जंगल में आदमी को देखकर घास में अपने को छुपा ले, शान्त और शुद्ध वातावरण का आदी....ये जीव...हजारों की भीड़ में....रायफ़ल, रिवाल्वर..पटाखों की गर्जना के मध्य अपने को कैसा पाता होगा....क्या यह एनीमल क्रूअलटी नही है?
मृत सुमित का घावों से भरा शरीर: फोटो© डी पी मिश्र

आंखों से न दिखने के बावजूद महावत के इशारों पर सुमित ने न जाने कितने समारोहों में शिरकत की! पर जब वह पैरों से लाचार हुआ तो उसे किसी वन्य-जीव चिकित्सालय में भेजने की जगह दुधवा के हवाले कर दिया गया, जहाँ वन्य जीवों के इलाज की कोई मौजूं व्यवस्था नही है! वन्य-जीव प्रेमियों द्वारा कई बार प्रधानमन्त्री को पत्र लिखकर इस बात के लिए लिखा गया कि दुधवा में वाइल्ड लाइफ़ रेस्क्यू सेन्टर, वाइल्ड लाइफ़ हास्पिटल की व्यवस्था की जाये, क्योंकि बाढ़ व अन्य कारणों से तमाम जीव घायल होते है, जिनका इलाज यहां से सैकड़ो किलोमीटर दूर बरेली (इज्जत नगर) व लखनऊ के अलावा संभव नही, नतीजतन ये जीव रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं, बाघों के मामलें में भी ऐसा कई बार हो चुका है जब वह रोड एक्सीडेन्ट में घायल होकर तड़पते रहे, और जब उन्हे बरेली या लखनऊ के लिए ले जाया गया तो रास्ते में ही उनकी मौत हो गयी।
 
सुमित की मौत अतीत की उस बात जैसी तो नही पर उससे मिलती जुलती जरूर है, "कि घोड़े के पैर बेकार हो जाय तो उसे गोली मार दो" यहाँ सुमित के पैर बेकार होते है तो उसे चिड़ियाघर से दुधवा भेजा जाता है...यह जानते हुए कि यहां कोई वाइल्ड लाइफ़ डॉक्टर नही है और न ही इलाज की कोई सुविधायें!
सेन्ट्रल ज़ू अथारटी को जरूर इस विषय में कोई कदम उठाने चाहिए ताकि चिड़ियाघरों के जानवरों की  आइन्दा ऐसी स्थिति न हो!


दुधवा लाइव डेस्क 

3 comments:

  1. भारत की दुर्दशा और भ्रष्टाचार की बलि चढ़ते इन निरीह प्राणियों का अंत स्वयं देश वालों के विनाश का सेतु बनेगा.

    स्वार्थलिप्सा और पाप पंक में गले तक डूबा समाज लोभ की पराकाष्ठा तक पहुँच किसी का महत्व नहीं समझता. सरकारी दावों की पोल पट्टी खुली पड़ीं है.

    गत दिनों गीर-वन के सिंहों की दुर्दशा पर भी किसी का जीवंत संस्मरण पढ़ा था. जिन प्राणियों को बचाए रखने की जद्दो जहद में विश्व जुटा है, वे धड़ल्ले से मृत्यु की ओर धकेले जाते जा रहे हैं .... मन खिन्न हो अत्यंत कष्ट पाता है.

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  2. सुमित के साथ जो दुर्व्यवहार हुआ, वह शर्मनाक है.

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  3. कृष्ण मिश्रAugust 1, 2010 at 5:36 PM

    जब हम इतने स्वार्थी और क्रूर हो गये है तो फ़िर क्यो इन हाथियों को जंगलों से पकड़ कर पालतू बनाते है, ताकि ये हमारा बोझ ढो सके! क्यों अलग करते इनके परिवारों से और ट्रेनिंग के दौरान असहनीय पीड़ा से गुजारते इस प्राणी को, लाखों भाले चुभने का दर्द, लाखों चीत्कारों के बाद जब यह आदी हो जाता है हमारा हुक्म मानने के लिए....वर्षों वफ़ादारी से हमारा बोझ उठाता है, पर जब यह बूढ़ा, लाचार और बीमार होता है, तब हम अपनी जिम्मेदारी से भाग लेते है...इसे विवश और बीमार छोड़कर....कुछ ऐसा ही हुआ लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा लाये गये सुमित के साथ!

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नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था