डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 11, 2010

एक विलुप्त हो रही प्रजाति को बचाने की मुहमि!

डा० प्रमोद पाटिल *
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का आवास प्रबंधन:-
"ग्रेट इंडियन बस्टर्ड सेंक्चुरी, सोलापुर महाराष्ट्र”
महाराष्ट्र भारत के उन छह प्रदेशों में से एक है, जहां ग्रेट इंडियन बस्टर्ड यानी “हुकना” पक्षी की मौजूदगी है। अतीत में यह चिड़िया महाराष्ट्र के सूखे इलाकों में अच्छी तादाद में देखी जाती थी।

जवाहर लाल नेहरू बस्टर्ड सेंक्चुरी (८४९६.४४ वर्ग कि०मी०) महाराष्ट्र के अहमदनगर और सोलापुर जनपदों के अन्तर्गत स्थित है। इसकी स्थापना सन १९७९ ई० में हुई। जैव-भौगोलिक क्षेत्र- डेक्कन प्रायद्वीप, तापमान १३ डिग्री सेल्सियस से ४३ डिग्री सेल्सियस तक। सन २००९ की पक्षी गणना के मुताबिक कुल २१ ग्रेट इंडियन बस्टर्ड पायी गयी, जिनमें १३ मादा व ८ नर थे।
सूखा प्रवण कार्यक्रम-
सन १९७५ ई० में विश्व बैंक के सहयोग से सूखा प्रवण कार्यक्रम की शुरूवात सोलापुर जनपद में की गयी, जिसमें वन विभाग द्वारा वन्य-जीवन के पुनर्जनन के लिए जो कदम उठाये, मैदानों से झाड़ियों व पेड़ों की कटाई से चराई के मैदान व लकड़ी आदि की प्राप्ति हुई। इस इलाके के डी०पी०ए०पी० (सूखा प्रवण कार्यक्रम) के तहत तैयार किये गये ननंज भू-खण्ड में १९७८ ई० में पहली बार ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को देखा गया।

ननंज भू-खण्ड में आवास के प्रकार-

१-        चरागाह भू-खण्ड- इस जगह पर बबूल के वृक्ष, तरवार की झाड़िया (चरभंरगा- डायविटीज में उपयोगी वनस्पति) और कई प्रकार की घासें पाई जाती है।
२-      वुक्षों वाले भू-खण्ड- यहाँ वन-विभाग द्वारा नीम, बबूल, कन्थ, शीशम आदि के कुछ वृक्ष रोपित किये गये थे इस कारन अब ये मैदान घासों के बजाए वृक्षों से आच्छादित हो गये है।
३-      चराई के मैदान
४-      पथरीलें चराई के मैदान
५-      फ़सल क्षेत्र
हुकना पक्षी ज्यादातर छोटी घासों वाले खुले मैदानों को पंसद करते है और बड़ी घासों वाले मैदानी क्षेत्र जो वृक्षों से आच्छादित हो, वहां इसे कभी नही देखा गया। यह पक्षी घोसले बनाने से लेकर, प्रजनन, भोजन आदि सभी गतिविधियों के लिए घास के खुले मैदान पंसद करते है। पूर्व के अध्ययनों में भी यह बात साबित हो चुकी है।

आवास प्रबंधन की आवश्यकता-
ननंज १० व करंबा इलाके में कुछ विदेशी प्रजातियों के वृक्ष लगाये गये, साथ ही लेन्टाना व अन्य खरपतवारों ने इन जगहों को घने जंगलों में तब्दील कर दिया। गूगल अर्थ से जब इन स्थलों की विभिन्न वर्षों की छविया देखी गयी तो पता चला के ये घास के मैदान विदेशी प्रजातियों के लगायें गये वृक्ष व झाड़ियों के कारण जंगल में परिवर्तित हो रहे है। चूंकि यह स्थल इन पक्षियों का प्राकृतिक आवास रहा, इसलिए इनके अस्तित्व को बचाने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ सिफ़ारिशे की, ताकि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के हैविटेट को बचाया जा सके।

१-        किसी तरह का वुक्षा रोपण न किया जाय।
२-      घास के मैदानों का उचित प्रबंधन हो, क्योंकि बस्टर्ड ज्यादा बड़ी व घनी घास मे रहना पंसद नही करता। इसलिए घास की कटाई व छटाई समय समय पर की जाय।
गौरतलब हो कि ये सभी प्राविधान वन्य-जीव विहार के प्रंबधन योजना में शामिल है, किन्तु उनके द्वारा इस सन्दर्भ में कुछ भी ऐसा नही किया गया।
मौजूदा प्रबंधन वन-विभाग द्वारा-
सन २००६ में पुणे के वन-विभाग द्वारा महाराष्ट्र के मुख्य वन सरंक्षक को एक प्रस्ताव भेजा गया ताकि घास के मैदानों का प्रबंधन में शामिल कार्यक्रमों को लागू किया जा सके। यह प्रस्ताव ननंज व करंबा भू-खन्डों के लिए था। फ़न्ड की व्यवस्था होने पर कार्य की शुरूवात वन सरंक्षक( वन्य-जीव) डा० वाई०एल०पी० राव के दिशा-निर्देशन में मार्च २००८ में प्रारंभ हो पायी।
२५ हेक्टेयर भूमि से वृक्षों को हटाया गया जिसमें १५ हेक्टेयर भूमि करंबा भू-खण्ड की और १० हेक्टेयर भूमि, ननंज भू-खण्ड की थी। वृक्षों को जमीन से खोद-कर हटाया गया ताकि इनकी जड़ों से दोबारा वृद्धि न हो सके।

अगस्त २००९ में लेखक द्वारा इस स्थल का अवलोकन किया गया, जिसमें ननंज इलाके में एक नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड दिखायी दिया।
ये घास के मैदान बस्टर्ड के अलावा अन्य पक्षियों को भी आवास प्रदान करते है। इसलिए वृक्ष विहीन घास के मैदानों का संरक्षण व संवर्धन किया जाय। कई अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि ग्रेट इंडियन बस्टर्ड खुले घास के मैदानों को ही अपनी रिहाइशगाह बनाते है।

पृथ्वी पर कुछ ही स्थान बचे है जहां यह शानदार पक्षी अपना अस्तित्व बचाये रह सकता है। यहां केवल ननंज को इस लिए संरक्षित करने की बात नही है, कि यह विलुप्त हो रही ग्रेट इंडियन बस्टर्ड का हैविटेट है, बल्कि यह एक जीन बैंक है, तमाम तरह की घासो और झाड़ियों का, जो जरूरी है हमारे देश की पारिस्थितिकी और खाद्य सुरक्षा के लिए। जैव-विविधिता के सरंक्षण के लिए इन घास के मैदानों का उचित प्रबंधन आवश्यक हो जाता है।
वन विभाग ने मर्दी, अकोलेकटी व करंबा भू-खण्डों में ५,२४४ वृक्षों के काटने लिए प्रस्ताव किया है। यह कार्य बस्टर्ड के हैविटेट के पुनर्जनन में मदद करेगा।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड धरती से तकरीबन ९० फ़ीसदी विलुप्त हो चुका है। बस्टर्ड प्रोजेक्ट के जरिए उम्मीद जतायी जाती है, कि इस प्रजाति के अस्तित्व को कायम रखा जा सकता है। (अनुवाद:- कृष्ण कुमार मिश्र)


डा० प्रमोद पाटि ( लेखक पक्षी वैज्ञानिक है, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के सरंक्षण में संलग्न हैं, बस्टर्ड के हैविटेट प्रबंधन में शोध। आप कोल्हापुर महाराष्ट्र मे रहते हैं। इनसे gibpramod@gmail.com  अथवा +91-9960680000 पर संपर्क स्थापित कर सकते है।)

3 comments:

अजातशत्रु said...

क्या मैदानों में खड़े कूछ बबूल के पेड़ काट डालने से बस्टर्ड को लुभाया जा सकता है, प्रकृति का प्रबंधन हो सकता है?, जब कोई ग्रासलैंड मैनेजमेंट नही था तब तो बहुत सख्या थी इन चिड़ियों की! फ़िर..............

Anonymous said...

I apologies for not to post in Hindi, my Hindi is poor.
In previous times grasslands were maintained in proper state because of traditional grazing which now banned in protected land. another point is trees which are uprooted are of glyricidia like exotic plants which are of no use to bustards.
this report suggest that uprooting of such heavely planted areas is one of the measure to help bustards, its not the ONLY way. we have to try collective measure. and we must encourage system to work in proper way.

Piyush Kumar Pant, Haldwani, Nainital said...

आज पूरा देश अचानक बाघों को बचाने की मुहिम मे आगे आ गया हैं. ये हमारे देश का दुर्भाग्य हैं की हम किसी बीमारी का इलाज भी तब करते हैं जब हमे लगे के अब बचना नामुमकिन हैं, और फिर हम डॉक्टर से आशा करते हैं की वो हमे जीवन दान देगा और जैसे ही तबियत मैं थोडा सा सुधार होता हैं तो हम फिर लापरवाही कर जाते हैं. ये बात एक बार के नहीं हैं ये हमारी आदत बन गयी हैं. फिर चाहे वो पाकिस्तान के साथ हमारे रिश्ते हो या कुछ और.
जैसे हे हम पर कोई आतंकवादी हमला होता हैं तो हम एकजुट होकर पाकिस्तान के खिलाफ रोष प्रदर्शन करते हैं, लेकिन फिर २-४ दिनों मैं हम सब भूल जाते हैं. और विडम्बना ये हैं के मीडिया इसे हमारी जिंदादिली का नाम दे देता हैं. और नेता भी केवल इसी मौके का इंतजार करते हैं की कब जनता शांत हो और वो वापस अपने बचे कार्यकाल का पूरा फायदा उठा पाए. हमलो को भूल कर वापस अपनी रोज की ज़िन्दगी मैं व्यस्त हो जाना जिंदादिली नहीं हमारी लापरवाही हैं जो पडोसी मुल्क को फिर हमारे खिलाफ खड़ा होने का मौका दे देती हैं. ये संभव नहीं हैं की हम हर रोज सड़क पे आकर सरकार व नेताओ के खिलाफ नारे बाज़ी करे. लेकिन हम उनको ये एहसास करा सकते हैं के हम हर हमले पर आपके उदासीनता का जवाब आपको अगले चुनाव मैं देंगे. नहीं तो ये नेता ये ही समझते रहेंगे की हमारी यादाशत कमजोर हैं. और हम उसके हर गुनाह को चुनावो से पहले ही भुला देंगे.
इंदिरा गाँधी के समय मैं जब बाघों की संख्या मैं कमी हुई तो इंदिरा जी द्वारा १९७३ मैं प्रोजेक्ट Tiger की शुरवात हुई. इंदिरा गाँधी द्वारा स्वयं रूचि लेने के कारण ये प्रोजेक्ट सफल रहा और बाघों की संख्या मैं वास्तव मैं बढ़त हुई. लेकिन बाद के नेता अपने फायदे मैं ही व्यस्त रहे.
नेताओ के निजी स्वार्थ के कारण एक अदभुद जीव अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करने को विवश हैं. भले ही इंसान भविष्य मैं मशीन का इन्सान और मशीन के जानवर बनाने मैं सक्षम हो जाये मगर जैसा जीव भगवान ने बनाया वैसा बना पाना कल्पना से भी बाहर हैं. ऐसा नहीं हैं की इस अदभुद जीव को बचाना मुमकिन नहीं हैं. बस दूरदर्शिता की जरुरत हैं. आज चारो और जहा चले जाओ, आवारा जानवर घुमते पाए जाते हैं. मरने वाले बाघों मैं अधिकतर मनुष्य की आबादी वाले इलाके मैं घुसने के कारण मारे जाते हैं. कियोकी मनुष्य ने उनके जंगलो मैं घर बना लिए हैं. अगर सरकार आवारा जानवरों को जंगलो मैं छोड़ दे तो आम आदमी को उन आवारा जानवरों से मुक्ति मिलेगी, उन जानवरों को प्लास्टिक व अन्य कचरा खाने से मुक्ति मिलेगी और जब तक वो बाघ का शिकार नहीं बन जाते तब तक जंगल का चारा वो अन्य भोज्य सामग्री मिलेगी. और जब वाघ को अपने आसपास शिकार मिल जायेगा तो वो जंगल से बाहर नहीं जायेगा और कुछ समय और बचा रहेगा. क्या इस शानदार जानवर को जिंदा रहने का कोई अधिकार नहीं हैं.
अगर आपको नहीं लगता हैं की इस जानवर को कुछ और समय तक बचना चाहिए. अगर आपको लगता हैं तो हर उस मुहिम का साथ दे जो जंगल के इस रजा को बचने मैं लगी हैं.

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