वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

ये जंगल तो हमारे मायका हैं

Apr 28, 2020

कोरोना डायरी-सदियों में इश्क़



कुछ कुछ कहानी जैसी. .! #कोरोना_डायरी_की_नई_कहानी

ये किस्सा भी कुमाऊं प्रदेश का है, उत्तर भारत के नेपाल राज्य से लगा हुआ देवदार से आच्छादित यह प्रदेश, प्राचीन मंदिरों, परम्पराओं और अपने ख़ूबसूरत जंगलों की वजह से दूसरे सूबों के लिए धरती के स्वर्ग का ख़िताब पाता रहा है, यहीं एक कहानी उपजती है, और पल्लवित भी होती है, और फिर बिखर जाती है यहां ही हवा में, मिट्टी में और पानी मे...वह बिखरना खूबसूरत था, या फिर दुःखद, ये आपही निर्णय लीजिएगा....तो चलता हूँ कुमाऊं की छोटी सी पर सुरम्य पहाड़ी में जिसे चंपावत के नाम से जानते हैं लोग.....आप भी चलिए हमारे साथ.....

उस जंगली इलाके की एक चोटी पर छोटा गांव बसता था, लोग खेती बाड़ी करते थे, और प्रकृति की तमाम दुरुहताओं को अपनी खुशियों में तब्दील कर चुके थे, मीलों दूर से नौलों से महिलाये पानी लाती, बारिश न हो तो फसल चौपट हो जाती, नतीजतन सूखा रूखा भोजन और जंगली वनस्पतियों पर अपने को निर्भर कर लेते लोग....कुमाउँनी बोली के गीत कहानियां किस्से होते, जब वे इकट्ठे होते रात में अग्नि के चारो तरफ...बस यूं ही कठिन सी लगती जिंदगी को वे आसान बना लेते....

बैगा हुड़किया कहता है कि उसी गांव में बहुत सुंदर लड़की रहती थी, उसका नाम था सुकृति...भगवान ने उसे नाम की तरह गुण भी दिए थे, पूरे गांव की प्रिय...बस उससे अगर किसी को नफरत थी तो गांव की एक बूढ़ी चाची को....वह जादूगरनी थी?

एक रोज उस गांव में शाम ढलते ही एक मुसाफिर पहुंचा ...उसे इसी गांव में एक रात्रि की शरण लेनी थी, मुसाफिर से पूँछा गया कि कहां से आए हो? उसने उत्तर दिया तराई प्रदेश से और जा रहा हूँ, न्याय के देवता के दर्शन करने, जिनका रामगंगा पार स्थान है....स्वयं के परिचय में उसने अपना नाम कार्तिकेय बताया.....!
कार्तिकेय सुकृति के ही अहाते में ठहरा था, संध्या भोजन के बाद जब सुकृति के घर वाले अग्नि जलाकर अहाते में बैठे तो कार्तिकेय भी इस ठंड से निज़ात पाने के लिए वहां बैठ गया, उसने तराई के जंगलों खेती, बोली बानी, और नरभक्षी बाघों की कहानियां सुनाई, अपने मुलुक की बात करना और उसे और सुंदर बनाकर प्रस्तुत कर देना, आदमी की फितरत है, शायद तब से जब वह धरती पर आया, चलते रहना उसका स्वभाव, था, फिर जब कृषि की तकनीक विकसित कर ली आदमी ने तो वह ठहर गया, गांव बसे, सम्पत्ति परिवार बने, और फिर बन गए उसके मुलुक, अपने अपने मुलुक, और आदमी प्यार करने लगा अपने अपने मुलुकों की माटी से, पेड़ों से, नदियों से और उस हर चीज से जिसे वह जानता है....फिर कार्तिकेय कैसे पीछे रहता अपने मुलुक की बड़ाई में, उसने अपनी नदियों को दुनिया की सबसे बड़ी नदी बताई, अपने जंगलों को स्वर्ग से तुलना, वहां के बाघों को दैवीय और अपनी बोली बानी को सर्वश्रेष्ठ...वह बोलता ही जा रहा था...वह तिल को ताड़ बना रहा था...और उसकी इस कला पर मुस्करा रही थी सुकृति.....बड़ी संजीदगी से सामान्य चीजों को ऐसे विशेषण दे देना की लोगों को प्रतीत होने लगे कि वे सब चीजे अलाहिदा ही होगी...एक काल्पनिक आकर्षण मन मे उपज जाए...ऐसी बाते करता था कार्तिकेय....रात बहुत हो गई तो सभी को विश्राम भी करना था, आस पास के जंगलों में जगराता शुरू हो चुका था, सियार, और भेड़िया अपने अपने सुर ताल में हूक रहे थे, तो कभी कभी हिरनों की भी आवाजे गूंज जाती शायद किसी बाघ व तेंदुए को देख लिया था उन हिरनों ने. .रात जंगल का दिन है, वहां जिंदगी जीने के लिए सारे संघर्ष इन्ही अंधियारी उजियारी रातों में खेले जाते हैं, आदमी जब सोता है, तब जंगल जागते हैं!

भोर होते ही कार्तिकेय चलने के लिए तैयार हो गया, सुकृति के परिवार वालों को अभिवादन करके वह चल दिया, अभी वह उस गांव के उत्तर में बहने वाली नदी के पुल पर पहुंचा था कि उसे अपने पीछे किसी के कदमों की आहट सुनाई दी, वह मुड़ा, तो देख रहा है कि सुकृति खड़ी है पीछे मडुए की रोटियां लिए हुए...वह मुस्कराई बोली इतनी दूर जाओगे भूख भी लगेगी इसे खा लेना...कार्तिकेय कुछ औपचारिक बात बोलता इससे पहले सुकृति ने खिलखिलाते हुए बोल दिया...बड़े आए रघुनाथ माथे माथ..... कुमाउँनी की इस कहावत के मायने ही है बड़े आए एटीट्यूड वाले! और वह लौट पड़ी अपने गांव की ओर थके कदमों से...किसी प्रिय को विदा कर लौटने में ऐसी ही मनोदशा होती है, मन उसके साथ जा रहा होता है, शरीर को दूसरी तरफ ले जाना होता है और तब पैर भी साथ नही देना चाहते हैं शरीर का....

कार्तिकेय आगे बढ़ता है, न्याय के देवता के दरबार जो पहुंचना है उसे.....प्रत्येक वर्ष यह यात्रा उसके लिए अनिवार्य सी है,जानते हैं? मन में कुछ बस जाए तो वह संस्कार बन जाता है, और यही संस्कार जब विशाल हो जाते हैं तो परम्पराएं, और परम्पराएं जब विकराल रूप धारण करती है तो वह धर्म बन जाती हैं! कुल मिलाकर कार्तिकेय अब धर्म का पालन कर रहा था, इस धार्मिक यात्रा में.....सुकृति से मिलन ने उसके धर्म में चुटकी भर ख़लल तो डाल ही दी थी, राई से पहाड़ बनना अभी बाक़ी था!

कार्तिकेय जब घर लौट रहा होता है तो फिर वह रामगंगा पर बने झूले वाले पुल पर पहुंचता है, उसका मन खोज रहा होता है पुल के पार सुकृति की आकृति को, हां ये आकृतियां मन में नक़्शे की तरह पैबस्त हो जाती हैं, जिन्हें सरसरी निगाह से भी मन खोज लेता है, सुकृति जैसी प्रेम की आकृतियां हमारे मन मस्तिष्क में कम्प्यूटर के अरबों टेराबाइट डेटा में से झट से निकल आती है बाहर बिना सर्च किए....यही तो प्रेम की रवानी है! पर यह क्या सुकृति सामने से दौड़ी चली आ रही है....दरअसल गौधूलि में सुकृति इस पुल पर कार्तिकेय की रोज़ राह तकती थी, उस वक्त जब मोटर कार नही थी तो यात्राएं सुबह प्रारम्भ होती थी और मुसाफिर ठिकाने पर शाम तक जरूर पहुंचता था, राह में ऐसी धर्मशालाएं, मंदिर, गांव व छोटे छोटे धर्म स्थान जरूर होते थे कि पथिक को रात्रि के प्रहर ठहरने का इंतजाम हो जाए...कार्तिकेय के मन में भी सुकृति का गांव मिडवे मोटेल सा हो चुका था, वह हर यात्रा में यहां ठहरना चाहता था, अब शायद यह मिडवे नही उसका डेस्टिनेशन होने वाला था...बस प्रेम की वह चुटकी अंजुली भर में बदलने की देर थी!

एकबारगी कार्तिकेय को लगा ये उसकी दृष्टि का भरम तो नही, पर तब तक सुकृति उसके नज़दीक आ चुकी थी, सजल नैन कुछ कह रहे थे, पर अधर चिपके हुए थे मर्यादा की गोंद से...वह हो ली कार्तिकेय संग, वह बराबर में चल रही थी, मानों उनमें हिस्सेदारी हो चुकी हो! वह लिवा लाई अपने घर कार्तिकेय को, संध्या भोजन के उपरांत फिर अग्नि प्रज्वलित हुई और बैठ गए सब जन अपनी अपनी बीती सुनाने, अग्नि की स्वर्णिम आभा में सुकृति और कार्तिकेय के चेहरे चमक रहे थे, दरअसल यह चमक स्वाभाविक नही थी, न ही प्रकाश की कोई कारस्तानी थी इसमें, ये कारस्तानियां थी प्रेम की, जो प्रज्वलित हो चुका था दोनो के अंतर्मन में, बल्कि लपटों में तब्दील....

दरअसल शब्दों की बलिहारी और चासनी पर बने सम्बन्धों में असल प्रेम तत्व हो नही सकता, वह तो छलावा है, प्रेम में भाषा और व्याकरण का क्या काम, फिर साहित्य भी हाशिए पर हुआ,  प्रेम तो स्वयं में मौन है जहां संसार की सारी भाषाएं व्याकरण साहित्य हिलोरे मारते है पर मज़ाल है कि प्रेम के मौन को विचलित कर सकें....

खैर सुबह फिर होती है, विदा लेने की बेला भी है यह सुबह, इस बार कार्तिकेय के कदम बोझिल है, क्योंकि न्यायदेवता के मंदिर से उसे लौटना ही था सुकृति के पास, इस बार वह अपने घर जा रहा है, अब एक बरस बाद उसे आना है न्याय देवता के मंदिर...उस एक बरस के फासले ने उसके मन में दूरी के सारे भेद मिटा दिए थे, अब जो बचा था वह समय था....केवल समय!

कार्तिकेय तराई के अपने गांव आ जाता है, जीवन अपनी गति से लयमान है, पर कार्तिकेय के मन की लय विचलित हो चुकी है, समरूपता खो गई कहीं...शायद सुकृति के गांव में या उस रामगंगा वाले पुल पर......
अगले बरस चैत्र का महीना फिर आता है, कार्तिकेय को इंतजार था इस महीने का जब उसकी यात्रा प्रारंभ होती थी, बहुत अधीरता से वह चलता है, अबकी कदम बोझिल नही बल्कि उत्साह से भरे है, मन कदमों के आगे आगे चल रहा है......

वह सुकृति के गांव पहुंचता है, पर सुकृति नही मिलती उसे उस घर में, पता चलता है कि वह तिब्बत प्रदेश की दरमा घाटी में ब्याह दी गई...ब्याह देना भी कितना सामाजिक व्यापार की तरह होता है, यह समझना हो तो किसी स्त्री के मन से पूँछे?, कार्तिकेय का रक्त मानों जम सा गया हो, वह शब्दविहीन हो गया और चल दिया न्याय देवता के दरबार की तरफ, उसने वह पुल पार किया, स्मृतियों का क्या वे कहां पीछा छोडती हैं, मड़ुए की रोटियां लिए सुकृति की छवियां मन के पर्दे पर बनती बिगड़ती......
पहाड़ में एक कहावत है ..."पहाडै चेलिनौक एतुकै आस भै
म्हैण लाग चैत नरै लागि मैत"...यानी पहाड़ की लड़कियों की इतनी ही आशा होती है कि किसी तरह चैत का महीना आए...और वह अपने मायके जाएं, पर सुकृति इतनी दूर ब्याही गई थी कि वह इस चैत में भी अपने गांव न आ सकी, आती तो कार्तिकेय को देख भर लेती.....

कार्तिकेय चल रहा था पर वह अध्येय हो चुका था, बस परम्परा का पालन ही अशेष था....वह पहुंचता है मंदिर, तो पुजारी बताता है उसे कि कोई सुकृति नाम की कन्या आई थी अर्जी देकर गई है कि अगले जन्म में कार्तिकेय के संग हिस्सेदारी हो उसकी... जीवन की हिस्सेदारी....पुजारी कहने लगा कि जब तुम आओ तो तुम्हे यह ख़बर दे दी जाए....घण्टियों में बंधी उस अर्जी को पढ़ता है वह और....अश्रुधाराएँ वेगधारण कर लेती है नियति के उन एक एक अक्षरों को पढ़कर जिसे लिखा तो सुकृति ने था, पर फैसला समय का था, नियति का था, सच ही तो है, कार्तिकेय ने दूरी को दरकिनार कर दिया था, समय ही बचा था उसके पास, वह समय से पहले चला था इस बार यात्रा में, पर समय आगे निकल गया उसके समय से......शायद आयाम बदल चुके थे?.....उसे सुकृति के वे शब्द रह रह कर याद आते जब उसने पहली बार खिलखिलाकर उस पर तंज कसा था....रघुनाथ माथे माथ...!

एक सदी बीत गई इस घटना को....समय चक्र ने बहुत कुछ परिवर्तित कर दिया था, सिवाय एक चीज के वह था जीवित प्राणियों के मन का प्रेम...प्रेम उसी स्वरूप में था....अस्थिर

बैगा हुड़किया कहता है कि अब वह सुकृति का गांव ख़त्म हो चुका था, वहां अंग्रेजो की कोठियां थी, चर्च बन गए थे, मिशनरीज़ भी पहुंच चुकी थी, यह इलाक़ा अब योरोपियन समुदाय से गुलज़ार था, चर्च की घण्टियाँ, प्रार्थनाएं, और मिशनरीज का आसपास के गांव वालों में फैली हैज़ा चेचक, बुखार, मलेरिया जैसी बीमारियों का इलाज जारी था, पूरी सेवा के साथ, यीशु के प्रेम व सेवा के सन्देश का यहां क्रियान्वन मन और तन से हो रहा था.....

वह रामगंगा पर बना पुल अभी भी जस का तस था, जहां कार्तिकेय और सुकृति की स्मृतियां चिड़ियों की चहचहाहट में जिंदा थी.....

एक रोज सुबह सबेरे, एक अंग्रेज डॉक्टर मोरिशन अपने घोड़े पर सवार झूले वाले पुल पर गुज़र रहा था, तभी अचानक एक खिलखिलाती हुई लड़की जो अमेरिकन एपिसकोपल चर्च की मिशनरी में नर्स थी....मोरिशन के घोड़े की लगाम पकड़ कर कुमाउँनी बोली में बोली.....रघुनाथ माथे माथ......!

वह बुढ़िया जादुगिरनी पुल के दूसरे छोर से नियति का यह खेल देख रही थी, और डबडबाई आंखों से मुस्करा भी रही थी.....न्याय देवता ने सुकृति के अर्जी स्वीकार कर ली थी।

बैगा हुड़किया का हुडुक और तेज़ी से बजने लगा...अब वह बहुत उत्साह में गा रहा था इस प्रेम कहानी को अपनी कुमाउँनी बोली में....

कृष्ण कुमार मिश्र
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