International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Jun 3, 2016

भारत सरकार की सकारात्मक पहल - मृदा स्वास्थ्य कार्ड



डा0 मो0 सुहेल, डा0 पी0के0 बिसेन, डा0 एन0के0 त्रिपाठी, डा0 एस0के0 विश्वकर्मा

‘‘भू स्वास्थ्य यदि अच्छा है तो मानव सब कुछ कर सकता है।

अगर चेतना यह न जागी तो भू से जा सकता है।।’’

आजादी के उपरान्त हमारे देश में खाद्यानों की अति कमी थी जिससे देश हर व्यक्ति बखूबी वाकिफ है। किन्तु पिछले कुछ दशकों से हमारे वैज्ञानिकों, कृषकों, प्रसारकर्ताओं, राजनेताओं आदि के संयुक्त प्रयास से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई जिससे हम खाद्यान को निर्यात करने की स्थिति में आ गये है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में हमने अधिक उपज देने वाली प्रजातियों, असंतुलित उर्वरकों का प्रयोग एवं अन्य कृषि क्रियाओं का भरपूर प्रयोग किया। क्योंकि वह उस समय की हमारी आवश्यकता थी, जोकि मृदा उर्वरता का हृस का मुख्य कारण है। पौधों के विकास एवं उत्पादन हेतु 16 पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है। वर्ष 1950 में भूमि में मात्र एक तत्व नत्रजन की कमी पायी जाती थी, जो प्रत्येक दशक 1960, 1970, 1980, 1990, 2000 में क्रमशः दो, पाँच, सात, नौ, दस पोषक तत्वों की कमी एवं 2020 में ग्यारह पोषक तत्वों की कमी सम्भावित है।

यह भी अति आवश्यक है कि बढ़ती हुई आबादी के साथ उत्पादन को भी बढ़ाना होगा, जो संस्तुतित संतुलित उर्वरकों, प्रजातियों, फसल सुरक्षा, कृषि क्रियाएें आदि के संयुक्त प्रयोग से ही सम्भव है। अतः लक्ष्य प्राप्ति के लिए सभी को संयुक्त रूप से प्रयास करना होगा। मृदा परीक्षण के उपरान्त प्राप्त मृदा स्वास्थ्य कार्ड एक महत्वपूर्ण योजना भारत सरकार द्वारा आरम्भ की गई।

19 फरवरी 2015 को प्रधानमंत्री ने पूरे देश में कृषि मिट्टी की सेहत पर ध्यान देने का आहवान राजस्थान के सूरतगढ़ से देशव्यापी मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना का शुभारंभ किया। प्रधानमन्त्री द्वारा वन्दे मातरम् की चर्चा करते हुए कहा कि भूमि को सुजलम-सुफलम बनाने के लिए मिट्टी का परीक्षण आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के अन्तर्गत कृषि एवं सहकारिता विभाग द्वारा इस दिशा में लाई गई है। इसलिए उन्होंने कहा कि बेटी और धरती माँ दोनों को बचाना आवश्यक है। मृदा स्वास्थ्य कार्ड के सम्बन्ध में सभी राज्य अपने-अपने यहां की कृषि योजनाएं नीति आयोग को प्रस्तुत करें। अगले तीन वर्षों में 2.53 करोड मृदा नमूने से 14 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी करने के लिए रू0 568.54 करोड की धनराशि के साथ लक्ष्य निर्धारित किया है। देश के प्रत्येक कृषि संस्थानों, प्रादेशिक कृषि विभागों को मृदा नमूने, मृदा स्वास्थ्य कार्ड की जानकारी कृषकों को प्रदान करने के लिए तन-मन से सहायता करनी चाहिए। मृदा परीक्षण एवं मृदा कार्ड कार्य हेतु कौशल विकास कार्यक्रम में इस योजना को सम्मिलित किया जाये ताकि कृषकां को सुगमता से मृदा परीक्षण परिणाम एवं कार्ड व युवकों को रोजगार प्राप्त हो सके। 

मृदा स्वास्थ्य कार्ड क्या है?
मृदा परीक्षण के उपरान्त छपा हुआ कार्ड जिस पर 12 बिन्दुओं पर यथा पी0एच0 मान, ई0सी0, कार्बनिक पदार्थ, नत्रजन, फासफोरस, पोटाश, जिंक, लोहा, कापर, बोरान, मैग्नीशियम अंकित कर कृषकों को उपलब्ध कराया जाता है। जिससे कृषक अपनी फसलानुसार, क्षेत्रानुसार संतुलित उर्वरकों का प्रयोग कर अच्छा उत्पादन प्राप्त कर सकें। 

कार्ड किस प्रकार कृषकों की सहायता करता है?

मृदा स्वास्थ्य के अनुसार फसल एवं प्रजाति के चुनाव करने में।
समय-समय पर पोषक तत्वों के प्रयोग में।
विशेषज्ञों से सम्पर्क करके भूमि सुधारने, अधिक समय तथा उर्वरा शक्ति बनाये रखने, फसल चक्र आदि क्रियाओं में।
क्षेत्रीय एवं मृदा के प्रकार के आधार पर फसलवार तत्वों की संस्तुति प्रदान करने में।

योजना की सफलता
इस योजना का क्रियान्वयन फरवरी 2016 में 84 लाख कार्ड वितरित करके किया गया। अब तक आन्ध्रप्रदेश में सबसे ज्यादा कृषकां को मृदा स्वास्थ्य कार्ड का वितरण किया गया। उत्तर प्रदेश में भी यह कार्य काफी गति प्रप्त किये है। इस कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा मृदा स्वास्थ्य पोर्टल ूूण्ेवसपसीमंजीण्कंबण्हवअण्पद को भी आरम्भ किया गया। जिसका मुख्य उद्देश्य यह है कि भविष्य में देश के लिए कृषि सम्बन्धित क्षेत्रानुसार नवीन शोध एवं योजनायें तैयार की जा सकें। इस योजना के द्वारा भारत सरकार की यह मंशा है कि मृदा परीक्षण कर कृषकों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराये जायें जिन के आधार पर फसलवार संतुलित पोषक तत्वों की मात्रा का प्रयोग किया जा सके क्योंकि भारत में 20-30 प्रतिशत यूरिया, 90 प्रतिशत डी0ए0पी0 एवं 100 प्रतिशत म्यूरेट आफ पोटाश का आयात किया जाता है, की निर्भरता को कम किया जा सके। अतः मृदा स्वास्थ्य जानने के लिए मृदा परीक्षण, मृदा नमूना लेना अति आवश्यक पहलू है।

नमूना लेने का उद्देश्य एवं मानक

जी0पी0एस0 आधार पर सिंचित क्षेत्रों से 2.5 हे0 एवं असिंचित क्षेत्र से 10 हे0 क्षेत्रफल मानक पर एक मृदा नमूना लिया जायेगा।
फसलों में खाद की सही मात्रा का निर्धारण करने के लिए।
ऊसर तथा अम्लीय भूमि के सुधार तथा उसे उपजाऊ बनाने का सही ढंग जानने के लिए।
समस्त फसल की अनुकूलता तय करने के लिए।
मृदा परीक्षण शुल्क
राज्य सरकारों  को प्रत्येक नमूने को एकत्र, परीक्षण एवं  मृदा कार्ड तैयार करने व कृषकों से वितरित करने हेतु रूपये 190 प्रति  नमूहा भारत सरकार द्वारा देय है।
मिट्टी परीक्षण क्यों?
मिट्टी की पोषक तत्वां की उपलब्धता ज्ञात करने एवं आवश्यकतानुसार, फसलानुसार प्रयोग मात्रा जानने के लिए।
ऐसी भूमि जहां उर्वरकों की आवश्यकता नहीं है वहां पर उर्वरकों का प्रयोग न करके उनकी बचत करना।
विभिन्न क्षेत्रों के लिये मृदा उर्वरता मानचित्र तैयार करने के लिये।
फसलों की अधिकतम उपज प्राप्त करने के लिये उनकी आवश्यकतानुसार उर्वरक तथा सुधारक प्रयोग करने हेतु।
उर्वरकों की उपयोग क्षमता में वृद्धि करना।
जैविक उर्वरकों का प्रयोग करना।

मिट्टी परीक्षण का महत्व

किसान वर्षो के अनुभव के बावजूद भी अपने खेत की उपजाऊ शक्ति का सही-सही अन्दाजा नहीं लगा सकते। अक्सर किसी पोषक तत्व की कमी भूमि में धीरे-धीरे पनपती है और पौधों में जब कमी के लक्षण प्रकट होते हैं तो काफी देर हो चुकी होती है और फसल की पैदावार पर विपरीत प्रभाव पड़ चुका होता है। दूसरी ओर हो सकता है कि भूमि में किसी एक तत्व या तत्वों की मात्रा अत्यन्त पर्याप्त हो परन्तु उस तत्व या तत्वों का निरन्तर प्रयोग करते रहते हैं। ऐसा करना न केवल आर्थिक दृष्टि से हानिकारक होता है अपितु तत्वों के आपसी असन्तुलन की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती है। जिससे उत्पादन पर विपरीत प्रभाव पड़ता हैं इसलिए खेत की उपजाऊ शक्ति का अंदाजा लगाना आवश्यक है ताकि यह जाना जा सके कि निरन्तर अच्छा उत्पादन पाने हेतु खेत में कौन-कौन सा उर्वरक कितनी मात्रा में डालना चाहिए। ऐसा मिट्टी परीक्षण के आधार पर ही संभव है।
मिट्टी परीक्षण कहाँ करायें?
कृषि विश्वविद्यालयों, भारत सरकार के कृषि संस्थानों, प्रदेशीय कृषि विभाग, इफको, कृभको आदि संस्थानों द्वारा मृदा परीक्षण कराकर कार्ड प्राप्त किये जा सकते हैं।

मिट्टी का प्रतिनिधि नमूना कैसे लें?

(क) सामान्य फसलों के लिएः-
1. निशानदेह स्थानों से ऊपरी सतह से घास-फूस, कंकड़-पत्थर आदि साफ कर लें।
2. निर्धारित 8 से 10 निशानदेह स्थानों से खुरपी या फावड़े से 15 सेमी0 गोलाकार या वर्गाकार गहरा गड्ढा बनाते हैं।
3. इस मिट्टी को साफ-सुथरे तसले, ट्रे या बोरी पर रख लें।
4. इसी प्रकार खेत के बाकी स्थानों से भी मिट्टी नमूनों को एक जगह इकट्ठा करके आपस में अच्छी तरह मिला लें।
5. मिले हुए नमूने की मिट्टी से घास-फूस, जडें, कंकड़-पत्थर आदि निकाल लें। नमूने को तसले या बोरी पर मोटी तह में फैला लें।
6. फैलाई हुई मिट्टी को चार बराबर भागों में बांट लें। आमने-सामने के दो भागों की मिट्टी को रखकर बाकी फेंक दें।
7. इस प्रक्रिया को तब तक दोहराएं जब  तक मिट्टी का कुल नमूना लगभग 250-300 ग्राम न रह जाए। इस नमूने को प्रतिनिधि नमूना कहते हैं।
(ख) ऊसर भूमि से प्रतिनिधि नमूनाः- ऊसर भूमि में क्षार व नमक की मात्रा मौसम के अनुसार भूमि की सतह पर घटती-बढ़ती रहती है। ऐसे समस्याग्रस्त खेतों से मिट्टी का नमूना 0-15, 15-30, 30-60 और 60-100 सेमी0 गहराई से अलग-अलग चार नमूने ले लेना चाहिए। नमूना लेने के लिए भूमि की सतह पर जीम लवण की पपड़ी को खुरच कर अलग नमूने के तौर पर रख लें।
(ग) बाग व अन्य वृक्ष लगाने के लिए नमूनाः- बागवानी के लिए नमूना 0-15, 15-30, 30-60, 60-90, 90-120, 120-150 और 150-200 से0मी0 गहराई से अलग-अलग 7 स्थानों से लें।

मिट्टी का नमूना कब लें?

फसल की कटाई के बाद खाली खेत से रबी (अक्तूबर-नवम्बर) की बुआई से पहले, खरीफ (अप्रैल-मई) में नमूना लेना बेहतर रहता है। खड़ी फसल में मिट्टी का नमूना लेना आसान रहता है। यदि खड़ी फसल से मिट्टी का नमूना लेना हो तो कतारों के बीच से नमूना लें। परन्तु ध्यान रखें कि खेत में उर्वरक या कोई जैविक खाद कम से कम 20-30 दिन पूर्व प्रयोग किया गया हो अन्यथा परिणाम गलत हो सकता है। 
नोटः- कम से कम 3 या 5 साल के अन्तराल पर अपनी भूमि की मृदा का परीक्षण एक बार अवश्य करवा लें। एक पूरी फसल-चक्र के बाद मृदा का परीक्षण हो जाना अच्छा है। 

नमूना लेने में क्या सावधानियां बरतें?

1. खेत में उगे किसी पेड़ के जड़ वाले क्षेत्र से नमूना न लें। 2. उस स्थान से नमूना न लें जहां पर खाद, उर्वरक, चूना, जिप्सम आदि को इकट्ठा किया गया हो। 3. ऊसर आदि की समस्या से ग्रस्त खेत या उसे किसी भाग का नमूना अलग से लें। 4 .जहां तक सम्भव हो गीली मिट्टी का नमूना न लें अन्यथा उसे छाया में सुखाकर ही प्रयोगशाला को भेजें। 5. नमूने को खाद के बोरों, ट्रैक्टर आदि की बैटरी या अन्य किसी रसायन आदि से दूर रखें। 6.नमूना लेने से पूर्व खेत की सिंचाई न करें। 7. ऐसे क्षेत्र जहां अधिकतर समय पानी भरा रहता हो वहां से नमूने एकत्र न करें। 8.मृदा अपरदन के कारण जिस क्षेत्र की ऊपरी सतह कटकर बह गई हो तो उसके नमूने से अलग लेने चाहिए। 9.यदि सघन कृषि की जा रही हो तो नमूने एक फसल चक्र के पूरा होने पर प्रतिवर्ष लेने चाहिए।
10.यदि खेत अधिक ढालू है तो नमूने कई स्थानों से लेना चाहिए। 

मृदा नमूने परीक्षण हेतु प्रयोगशाला भेजना

प्रत्येक नमूने को साफ कपड़े की थैली में रखकर उसमें निम्नांकित सूचनाऐं लिख कर प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु भेजना चाहिए। 1. खेत का नम्बर या नाम 2. अपना पता 3. बोई गई फसल एवं बोई जाने वाली फसल का नाम 4. सिंचाई साधन आदि। 

Corresponding Author 
Dr. Suhail 
Scientist Horticulture 
Krishi Vigyan Kendra Lakhimpur Kheri
Uttar Pradesh 
drsuhail.lmp@gmail.com



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