International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Apr 8, 2015

जीवों से प्रेम की एक मिसाल और ....


 रणा राम की आवाज पर दौड़े चले आते है ये जीव.… 


राजस्थान, पाली जिले के कानेलाव गांव के रणाराम खेतीहर मजदूर है। उन्होंने ने तो पशु-पक्षियों को नियन्त्रित करने के लिए प्रशिक्षण लिया है और ना ही वे उनके साथ रहे है। रणा प्यार की भाषा जरूर जानते है, तभी तो उनकी एक आवाज पर गांव के तालाब के कछुए दौड़े चले आते है।

संवेदनशील कछुए जो हल्की सा आहट पर अपने खोल में छिप जाते हैं, रणा के आते ही बेखौफ होकर चहलकदमी करने लगते हैं। इस दौरान काफी संख्या में ग्रामीण वहां मौजूद रहते है लेकिन कछुए उनसे नहीं डरते।


पांच साल की मेहनत

रणाराम बताते है कि ये सिलसिला करीब पांच साल पहले शुरू हुआ। एक सुबह वह गांव के आखरिया के निकट स्थित तालाब में रोटी लेकर गया तो उसकी आवाज सुनकर काफी कछुए बाहर आ गए। उसने हाथों से कछुओं को रोटी खिला दी। फिर तो एेसा सिलसिला चला जो अभी तक बरकरार है। अब तो तालाब में रहने वाले सारे कछुए उसके दोस्त बन गए।

गांव के बड़े तालाब में स्थिति ये है कि कछुए सुबह गांव के चौक की ओर स्थित किनारे पर उसका इंतजार करते हैं। अलसुबह वह घर से रोटियां बनाकर लाता है। जैसे ही तालाब किनारे पहुंचकर कछुओं को आवाज लगाता है तो तालाब में जगह-जगह से कछुए भागे चले आते हैं। कुछ ही देर में तालाब किनारे कछुए ही कछुए नजर आने लग जाते हैं।

दिनचर्या में हुआ शुमार

रणाराम मीणा नियमित रूप से घर से आठ से दस रोटी बनाकर लाता है और कछुओं को खिलाता है। कछुओं से उसकी दोस्ती का आलम यह है कि थोड़ी देर में तालाब किनारे कछुओं का झुण्ड लग जाता है। दोस्ती के इस अनूठे नजारे को देखने के लिए गांव के लोग भी एकत्र हो जाते हैं।

केवल रणा से प्रेम

रणा जब किसी काम से गांव से बाहर जाते हैं तो उनके बेटे या परिवार के अन्य सदस्य को जिम्मेदारी सौंप कर जाते हैं। हालांकि, उनका बेटा जब रोटी खिलाने जाता है तो कछुए तालाब से बाहर नहीं आते। वो तालाब के पानी में ही रोटी डालकर चला जाता है।

साभार: Kamal Jeet's Blog 

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