डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 12, 2014

खत्म हो जायेगा बाघों और घडियालों का बसेरा


पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए विनाशकारी है केन - बेतवा लिंक परियेाजना 

जीवनदायिनी नदी के नैसर्गिक प्रवाह से खिलवाड़ करना खतरनाक 


पन्ना, 11 नवम्बर - किसी भी जीवनदायिनी नदी के अविरल प्रवाह को बाधित कर उसकी प्रकृति से छेड़छाड़ करना खतरनाक साबित हो सकता है. ऐसा करने से लाभ होने की तुलना में हानि की संभावना अधिक है. चूंकि हर नदी की अपनी अलग केमिस्ट्री और बायोलॉजी होती है, इसलिए नदियों को लिंक करने से उनकी नैसर्गिकता खत्म हो जायेगी जिसका असर पूरे ईको सिस्टम पर पड़ेगा. यह बात केन नदी के अध्ययन प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने खजुराहो में आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला में कही. 
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ईकोलॉजी के तत्वाधान में आयोजित इस कार्यशाला में देश की विभिन्न नदियों का गहन अध्ययन करने वाले विशेषज्ञ, रिसर्चर व छात्र शामिल रहे. कार्यशाला में केन नदी के विभिन्न पहलुओ उसके ईको सिस्टम तथा ऐतिहासिक व सांस्कृतिक महत्व पर विस्तृत चर्चा हुई. जिसमें यह बात उभरकर सामने आई कि दो नदियों को जोडऩा अवैज्ञानिक और अव्यवहारिक है. नदी जीवनदायिनी होती है और उसके बहाव से खिलवाड़ करना जीवन से छेड़छाड़ करने जैसा है. केन - बेतवा लिंक परियोजना के संदर्भ में प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने बताया कि यह परियोजना पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए जहां विनाशकारी साबित होगी वहीं केन नदी जो कि घडिय़ालों का घर है वह भी उजड़ जायेगा. नदी जोड़ परियोजना से डाउन स्ट्रीम में घातक दुष्परिणाम दिखाई देंगे जिसका असर मानव जीवन पर भी पड़ेगा. 


 पन्ना टाइगर रिजर्व के बीच से प्रवाहित होने वाली केन नदी का दृश्य 
इस कार्यशाला में मौजूद पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक आर.श्रीनिवास मूर्ति ने बताया कि केन - बेतवा लिंक परियोजना के मूर्त रूप लेने पर पन्ना टाइगर रिजर्व का सौ वर्ग किमी. से भी अधिक क्षेत्र डूब में आ जायेगा. डूब में आने वाला यह क्षेत्र टाइगर रिजर्व का कोर एरिया है तथा बाघों का सबसे उत्तम रहवास है. निश्चित ही इस परियोजना से पन्ना टाइगर रिजर्व की अपूर्णीय क्षति होगी. आपने कहा कि केन नदी पन्ना टाइगर रिजर्व के लिए जीवनदायिनी है, यह एक जीवन्त नदी है. इसलिए इसमें सिर्फ पानी को देखना काफी नहीं है, इसके अलावा भी यह बहुत कुछ है जिसे उसकी पूरी समग्रता में देखे जाने की जरूरत है. तभी हम यह समझ पायेंगे कि नदी से हम कैसे प्रभावित होते हैं तथा नदी को हम कैसे प्रभावित करते हैं. श्री मूर्ति ने कहा कि ज्यादातर प्राकृतिक आपदायें मानव निर्मित होती हैं, आपने कहा कि नदियों के किनारों को बचाने के लिए एकीकृत प्रबंधन होना चाहिए. 


प्रोफेसर के.डी. जोशी ने अपने अध्ययन रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि हमने केन नदी में 89 प्रजाति की मछलियां पाई हैं. इस नदी की इकोनामिक वैल्यू क्या है यह इस प्रोजेक्ट के पूरा होने पर निकल कर आयेगा. श्री जोशी ने कहा कि यहां सिर्फ केन नदी की बात करना ठीक नहीं है, हमें केन रिवर्स की बात करनी होगी. क्यों कि केन की अनेको छोटी - बड़ी सहायक नदियां भी हैं. आपने बताया कि नदी का सबसे बड़ा धर्म ग्राउण्ड वाटर रिचार्ज होता है. नदी तथा उसके ईको सिस्टम को हम जितना जानते हैं वह बहुत कम है. नवम्बर के महीने में नदी सूखनी नहीं चाहिए, यदि कोई नदी सूखती है और सीजनल बन गई है तो उसके कारणों को जानने की कोशिश होनी चाहिए. कार्यशाला में दिनेश मरोठिया व रीतेश शर्मा सहित अन्य लोगों ने भी केन नदी तथा ईको सिस्टम के संबंध में अपने विचार साझा किये. 



केन नदी के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा के लिए शिल्प नगरी खजुराहो
में आयोजित कार्यशाला को सम्बोधित करते हुए
 प्रोफेसर ब्रिज गोपाल तथा उपस्थित अतिथिगण

प्रवाह रूकने पर कैसे आयेगी बालू 

नदी की इकोनामिक वैल्यू क्या है, इस पर चर्चा करते हुए प्रोफेसर ब्रिज गोपाल ने बालू का उदाहरण देते हुए बताया कि नदी मुफ्त में बालू देती है. यदि बालू को बनाने का प्रयास किया जाय तो यह कितना मंहगा सौदा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है. इसके बावजूद उस गुणवत्ता की बालू का निर्माण मुमकिन नहीं होगा जो बालू प्राकृतिक रूप से नदियों में मिलती है. आपने कहा कि प्राकृतिक व्यवस्था के तहत नदियों में बालू का स्टोर होता है, यदि नदी का प्रवाह थम गया तो बालू का निर्माण भी नहीं हो सकेगा. प्रवाह के बिना कुछ भी नहीं होगा. नदी का प्रवाह रूकने से सिर्फ बालू बनना ही नहीं थमेगा बल्कि अन्य कई बदलाव भी आयेंगे, जिसका हम इस प्रोजेक्ट में अध्ययन करने का प्रयास करेंगे. 


अरुण सिंह 
aruninfo.singh08@gmail.com

0 comments:

Post a Comment

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Featured Post

क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!