International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Feb 16, 2014

नियमों का उल्लंघन करते हुए मोईली ने महान को पर्यावरण क्लियरेंस दिया


एस्सार-हिंडाल्को के पक्ष में नीचे गिरते हुए मोईली ने महान को दूसरे चरण की मंजूरी दी।

12 फरवरी, नई दिल्ली। एस्सार एनर्जी ने घोषणा की है कि सिंगरौली में स्थित महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की पर्यावरण क्लियरेंस मिल गयी है। जबकि पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इससे पहले किसी तरह की घोषणा नहीं की थी। इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए ग्रीनपीस की प्रिया पिल्लई ने कहा, हमें पहले ही डर था। मोईली लगातार जल्दबाजी में पर्यावरण क्लियरेंस बांट रहे हैं उससे हजारों लोगों की जीविका खत्म हो जायेगी। वनाधिकार कानून तथा दूसरे अन्य जरुरी शर्तों के उल्लंघन के बावजूद मोईली ने महान कोल ब्लॉक को दूसरे चरण की मंजूरी दे दी है। इस प्रोजेक्ट से करीब 500,000 पेड़ और हजारों लोगों की जीविका को नुकसान होगा। मोईली ने जनजातिय मामलों के मंत्री केसी देव द्वारा उठाये गए सरोकारों को भी नजरअंदाज कर दिया। बड़ा सवाल है कि क्या वास्तव में सरकार जंगलों के निवासी और पर्यावरण की चिंता करती है?”

महान संघर्ष समिति के कार्यकर्ता और अमिलिया निवासी कृपानाथ ने कहा कि हमलोग इस फैसले से निराश हुए हैं। इस प्रोजेक्ट से हमारी जिन्दगी खतरे में है। हम हजारों लोग इसी जंगल पर निर्भर हैं। हमलोग अपनी लड़ाई को जारी रखेंगे और अपना जंगल महान कोल ब्लॉक को नहीं देंगे।केन्द्रीय जनजातिय मामलों के मंत्री के समर्थन के बावजूद इस खबर ने हमें अचंभित किया है। क्या केन्द्र और राज्य सरकार आदिवासियों और जंगल निवासियों के लिए सही में चिंता करती हैउसी सरकार द्वारा वनाधिकार कानून लाने का क्या औचित्य है जो खुद उसके कार्यान्वयन से बचता है ?”

जूलाई 2013 में, जनजातिय मामलों के मंत्री ने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री और राज्यपाल को सिंगरौली में वनाधिकार कानून के उल्लंघन के बारे में लिखा था। साथ ही, मांग की थी कि बिना वनाधिकार कानून लागू किए बिना पर्यावरण क्लियरेंस नहीं दिया जाय। वनाधिकार कानून को लागू करवाना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन पर्यावरण क्लियरेंस देने से पहले केन्द्र सरकार की जिम्मेदारी है कि वो वनाधिकार कानून को सुनिश्चित करे। वनाधिकार कानून लागू न करने की वजह से ही नियामगिरी में वेदान्ता और ओडिसा में पोस्को के प्रोजेक्ट आगे बढ़ने में असफल हुए।

22 जनवरी को ग्रीनपीस तथा महान संघर्ष समिति ने एस्सार के मुंबई स्थित मुख्यालय पर विरोध प्रदर्शन किया था तथा मोईली द्वारा जल्दबाजी में उद्योगों के पक्ष में दिए जा रहे निर्णय पर सवाल उठाया था। एस्सार ने ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति के ग्रामीणों पर 500 करोड़ का मानहानि तथा चुप रहने का मुकदमा किया है।

एस्सार ने ग्रीनपीस द्वारा मांगे जा रहे पर्यावरण मंत्री मोईली के इस्तीफे पर भी निषेधाज्ञा लगाने की कोशिश की थी। न्यायालय में उपस्थित ग्रीनपीस की कार्यकर्ता अरुंधती मुत्थू ने बताया कि एक निजी कंपनी द्वारा केन्द्रीय मंत्री को बचाने की कोशिश करना बेहद संदेहास्पद था। एस्सार द्वारा तेजी से क्लियरेंस बांट रहे  वीरप्पा मोईली को बचाने का मतलब अब आसानी से समझा जा सकता है। उनलोगों को पहले से ही उम्मीद थी कि यह क्लियरेंस मिलने वाला है

कोयला घोटाले के दौरान महान कोल ब्लॉक 2006 में एस्सार और हिंडोल्को को संयुक्त रुप से आवंटित किया गया था। फिलहाल यह कोल ब्लॉक सीबीआई की जांच के दायरे में भी है। कोल ब्लॉक के आवंटन के तरीकों पर सवाल उठ रहे हैं शुरुआत में राज्य सरकार द्वारा इस कोल ब्लॉक को एस्सार को देने का विरोध किया था और फिर सिर्फ तीन महीने के भीतर उसने अपना पाला बदल लिया।
ग्रीनपीस और महान संघर्ष समिति मांग करती है कि वनाधिकार कानून के उल्लंघन के सबुत के आधार पर इस क्लियरेंस को रद्द किया जाय। साथ ही वो क्लियरेंस के खिलाफ लड़ने के सभी उपायों पर विचार करेगी। 

Please contact
Priya Pillai, Senior Campaigner, Greenpeace India: 09999357766,priya.pillai@greenpeace.org
Avinash Kumar Chanchal, Media Officer, Greenpeace India: 08359826363, avinash.kumar@greenpeace.org
Jagori Dhar, Senior Media Officer, Greenpeace India: 09811200481,jagori.dhar@greenpeace.org
Anindita Datta Choudhury, Senior Media Officer, Greenpeace India: 09871515804, adattach@greenpeace.org

1 comment:

  1. पैसे के आगे सब कुछ गौण हो जाता है.कोयला ब्लॉक्स के घोटाले सामने आने के बाद तो मोयली संदेह के हज्रे में आ ही जाते है.पहले जयन्ती मैडम थी अब मोयली साहब. पर्यावरण बचाने का राग तो केवल भाषण देने,, टी वी पर विज्ञापन देने तक ही सीमित है.फिर कोई छोटी कंपनी होती तो कान उमेठते भी,अब यहाँ तो पूरी सरकार ही नतमस्तक है, तो कैसी उम्मीद .

    ReplyDelete

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था