डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 27, 2012

क्या वाकई हम अपने मुस्तकबिल को जानते है?

भारतीय राजनीति में पर्यावरण और वन्य जीव कभी मुद्दा नही बनते ! क्यो?

उत्तर प्रदेश की सियासी जंग में तमाम राष्ट्रीय और क्षेत्रीय पार्टियां चुनाव के मैदान में जोर आजमाइस कर रही है, साथ ही भारत और उत्तर प्रदेश के कुछ कथित पुरोधा भी पांच वर्ष के लिए जनता के भाग्य-विधाता बनने की पुरजोर कोशिश में है, इनके पास बड़े-बड़े सपनों की फ़ेहरिस्त भी है, इनका ये खयाली सब्ज बाग इनके काम भी आता है, हम इन्हे चुन कर प्रदेश या देश की उस इमारत में बैठने का मौका दे देते है, जहां ये बड़े आराम से गुत्थम-गुथ्थी खेलते मजे से पूरे पांच वर्ष ! क्या वाकई ये हमारा मुस्तकबिल सवांर रहे हैं? या हम ही अनजान है, अपने मुस्तकबिल से?....असल में पर्यावरण चुनावी मुद्दा कभी नही होता, कुरूप होती प्रकृति को सवांरने की बात भी कोई नही करता, यही तो है हमारा मुतकबिल “मदर नेचर”।

हमारे राज नेता या खुद हमने क्या कभी गौर किया कि हमारे आस-पास कितनी प्रजातियों के वृक्ष है, कितनी झाड़ियां है, और उन पर रहने वाले कितने प्रकार के रंग-बिरंगे जीव है? या किसी ने समीक्षा करने की जहमत उठाई, कि आज से पचास या बीस या फ़िर दस वर्ष पहले हमारे गांव-शहर में कितनी वनस्पतियां थी, और् आज कितनी बची हुई है, साथ ही यह कभी सोचा गया, कि इस अनियोजित विकास में उन वनस्पतियों या जीवों पर कितने समुदाय अपनी रोजी-रोटी चलाते रहे है, और ग्रामीण जीवन में कितनी वनस्पतियों का उपयोग औषधि के रूप में होता आया हैं...कितना बचा है अब हमारे पास? अवैध पट्टों के चलते हमारे चरागाह, खलिहान और तालाब सभी नदारद है गांवों से, हां नक्शे पर कही विराजमान हो तो अलग बात है। असल में यही तो मौजूद होती है जैव-विविधता विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तु वनस्पतियां, जिनका पर्यावरण में कोई न कोई अमूल्य योगदान है, चिड़िया जंगल लगाती है, तितलियां और कीट-पंतगें वनस्पतियों में परागण में सहयोगी होते है, और वनस्पतियां भोजन से लेकर औषधीय प्रयोगों में काम आती है।

जब ये जंगल तालाब और नदियां नही बचेगी तो हवा, पानी और भोजन इन तीनों बुनियादी चीजे प्रभावित होगी। हां अगर ये जीव-जन्तु भारतीय राजनीत में मताधिकार का प्रयोग करते होते तो शायद इनके ठिकाने यानी तालाब, परती भूमियां, जंगल, इत्यादि के पट्टे इनके नाम कर दिए जाते जो वास्तव में वैध होते।

खीरी पीलीभीत और बहराइच जनपदों में जो जंगलों की टूटी फ़ूटी श्रंखलायें बची हुई है उन्हे सरंक्षित करने की जरूरत है, ये जैव-विविधता का खजाना संजोए हुए है, और अतुलनीय प्रजातियों की मौजूदगी भी इनमें है। क्या हम तराई में यदि हम विशाल से लेकर छोटी-छोटी नदियों और जंगलों को बचाने का मुद्दा चुनाव में नही बना सकते है जो कि जरूरी है, और अपने वास्तविक मुस्तकबिल के लिए वोट नही कर सकते।

क्यों कि एक बार अगर ये जंगल नष्ट हुए तो इन्हे इनके पूर्व स्वरूप में वापस लाना नामुमकिन होगा, और इन नदियों को अगर हम नही बचा पाए तो इनका लौटना मुश्किल है- क्योंकि नदियां कभी भी वापस नही लौटती।

मुद्दे-
१-    दक्षिण खीरी और पीलीभीत के नष्ट हो रहे जंगल व उनमें रहने वाले वन्य जीवों को संरक्षित किया जा सकता है, इन जंगल श्रंखलाओं को जोड़कर नये वन्य जीव विहार का दर्जा देकर।

२-    पद्म-भूषण टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह के निवास टाइगर हावेन को संग्रहालय का दर्जा-ताकि नई पीढ़िया उनके वन्य जीवन पर किए कार्य से अवगत होकर प्रेरणा ले सके।

३-    तराई की नदियों में खुलेआम बहाया जा रहा औद्योगिक कचरा जिससे जल मे रहने वाले सभी जीवों व वनस्पतियां नष्ट हो रही है और प्रदूषित भी, इन जीवों व वनस्पतियों पर निर्भर समुदाय हो रहे है रोग-ग्रस्त।

४-    ग्रामों की परती भूमियों, जलाशयों, चरागाओं, व बचे हुए छोटे छोटे जगलों पर अतिक्रमण।

५-    सामुदायिक जंगलों के विकास का मुद्दा

६-    संकर प्रजातियों व जहरीले कीटनाशकों के खिलाफ़ मोर्चाबन्दी और देशी प्रजातियों को बढावा देने का मुद्दा ताकि हम अपनी जैव संपदा को सरंक्षित कर सके।

कृष्ण कुमार मिश्र

1 comments:

Anonymous said...

very nice article,believe me its a heaven on earth, no other forest in India can match the bio diversity of dudhwa and connecting forest, but the kind of deforestation happening in dudhwa everything will get spoiled, this forest is still neglected by govt. i saw lot of NGOs who are working in forests like bandhavgarh, ranthambore etc. but there are hardly anyone in this terai junle. its only because, that our govt. is not interested, rather then they are just working to fill there pockets,, why not these political parties include agenda to protect our mother nature and i think this is the basic right of each and everyone living in this world,,, i just want to request each and everyone who is reading this post, please write something, write something about your locality and highlight some issues which you feel... AMIT

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