डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 02, February 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 1, 2011

जल-जमीन और वे लोग ?

 नर्मदा बचाओं आंदोलन में एक उत्साही रिपोर्टर की शिरकत की एक कहानी-


नर्मदा तट पर बच्चे
अभी तो मैं विदेश में हूँ,  लेकिन कुछ महीने पहले तक भारत में एक न्यूज़ चैनल में रिपोर्टर थी। अब रिपोर्टर हूँ, तो  काफी घूमने का मौका मिलता है,  इसी बहाने, काफी जगह भी घूम ली, जहां भी जाओ, एक बात तो है, हमारे देश में, हर २००  किलोमीटर में दुनिया बदल जाती है, आप अगर आपके सफ़र  में पांच घंटे सो गए, तो आँख  खुलते ही एक अलग दुनिया में पहुँच जायेंगे, जहां की रहन-सहन, बोल-भाषा, आचार-विचार सब अलग है। आप वहां एक अजनबी बन जाते है, लेकिन एक अपनापन हमेशा कायम रहता है, यही खूबी है, हमारे देश की, ऐसा ही एक एक्सपेरिएंस है मेरा, यह कहानी, उसी के बारे में  है!

पिछले साल, मुझे नर्मदा बचाओ आन्दोलन सम्मलेन देखने का अवसर मिला है। जहां पे , मुझे मेधा पाटकर जी से मिलके काम करने का सौभाग्य मिला है। एक बात तो भूल ही गयी यहाँ कहना, मेरा पूरा अध्ययन   पर्यावरण विषय में  हुआ,  तो मैं अपने आपको प्रकृति  और पेढ़  पौधों के काफी करीब महसूस करती हूँ। जब मुझे नर्मदा बचाओ आन्दोलन को देखने और उसपे रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला, तब में खुद को खुशनसीब समझी।

हैदराबाद से ट्रेन सफ़र के बाद, हम पहुंचे महाराष्ट्र एक छोटी सी गाँव में, वहां से शुरू हुई हमारी वन विहार, नर्मदा नदी तक पहुँचने में हमे दो दिन लगे, क्योंकि बीच में हम काफी जगह  पर  रुक कर आगे बढ़े, वहां मेधा जी का कार्यक्रम की शूटिंग करके फिर अगले जगह पर जा रहे थे,  इस पूरी सफ़र में मैंने एक चीज़ सीखा है, वह है, हमारी जीवन जो शहरों में जिया जाता है, उसमे और वह जीवन  जो भारत के गांवों में जिया जाता  है...उसमे....जमीन आसमान का फर्क है,  मेरे लिए ट्रक और बैलगाड़ी सिर्फ सामाँन लाने ले जाने के लिए है, लेकिन यहाँ आने के बाद मैंने सीखा है, कि इन्ही यातायात साधनों के जरिये , लोग सफ़र करते है। जब ट्रक में बैठके मैंने सफ़र किया, तब मुझे जिंदगी के वह कठिनाईया महसूस हुई जो हर एक आम आदमी के ज़िन्दगी में हर रोज होते है। उन  कठिनाई में जो मिठास है, शायद ही मैंने कभी पहले खो दी..


आधी रात में नर्मदा
सात घंटो की सफ़र के बाद हम नर्मदा के किनारे उतर गए, चांदनी रात में, ऐसा लग रहा था की पूरे नदी पे किसी ने चांदी  का कपडा डाल दिया हो, नदी की शांत में हमारे मुह से एक शब्द भी गूँज उठेगी, चारो तरफ छोटे छोटे पहाड़ है, ऐसा लग रहा था कि पवित्र नर्मदा की रक्षा कर रहे है, कुछ पल के इंतज़ार के बाद, हमारे नाव आ गये। अब नाव में सफ़र करके, हमे पहुँचना  है, एक पहाड़ पे जहां पे नर्मदा की जनजाति है। उस गांव जो पहाड़ पर है, उसका नाम है खारा बादल। यह बात सोचके ही मेरे मन में कई प्रश्न उठे है, शहर  में रहके, हम बड़े बड़े आलीशान  घर देखते है. २४ घंटे हमारे घर में बिजली रहती है,  कार के बिना हम घर से बाहर नहीं आ सकते, इन्टरनेट के बिना हमे दम घुट जाती है, शौपिंग के बिना हमारी  मन को तसल्ली नहीं मिलती है। अब उस छोटे से पहाड़ पे कोई कैसे रह सकता है? क्या उनको पता है कि हम जैसे लोग किस तरह की ज़िन्दगी जीते है?  शायद उनको नहीं पता है, और  मैं आशा करती हूँ, कि  उनको पता भी न चले, मेरी पूरी कहानी पढने के बाद, आप खुद समझ जायेंगे.

जैसे ही हमारी नाव की सफ़र शुरू हुई, हम सब अपने पाने जगह ले लिये. कुछ पालो के बाद, नर्मदा के गाने शुरू हुए. जो हमारे सात है, वोह गाना गाने शुरू किये. उन गीतों  में प्रकृति का एक एक शब्द हमे पता चलता है. कुदरत की खूबसूरती की तारीफ़ में अपने आपको भूल जाते है. शांत नर्मदा के ऊपर, चांदनी रात में, पहाडो के बीच, यह सारे शब्द गूँज रहे है. उन चन पालो में, मुझे पता चला, कैसे एक एक छोटी  चीज़ में भी विषय होती है.  करीब दो घंटे की सफ़र के बाद हम पहुंचे उस छोटे से पहाड़ पे! जिसका  नाम  है  खारा  बदल ।

वह एक छोटी सी पहाड़ है, जो हमारे शहर के २० मंजिल के इमारतों से भी छोटी है, वहां सब  एक परिवार की तरह कुछ लोग अपना ज़िन्दगी गुज़ार रहे है,  उनको नर्मदा ही सब है,  उनकी रहन सहन हमसे अलग है, वहां बिजली नाम की कोई चीज़ नहीं है, उनको नहीं पता की हवाई जहाज़  कैसे  चलती है?  उनको  नहीं पता की इन्टरनेट नाम की कोई ऐसी चीज है, जो हमे दुनिया से मिला सकती है, उनकी पूरी दुनिया वह नदी और वह छोटी सी पहाड़। लेकिन उनके पास वह सब कुछ है जो हमारे पास नहीं है। हर तरफ हरियाली, शुद्ध हवा और साफ़ जल। जो हमे पैसे खर्च करने पर ही मिलते है,  उनके मन स्वच्छ है, उनका दिल साफ़ है। करीब २०० लोगो को खाने बनाके, हम सब लोगो की खातिरदारी किया उन्होंने। एक रात में वहां के जनजाति के बारे में काफी  सीखने को मिला. और हैरानी की बात यह है कि, वहां उस छोटे से पहाड़ पर, एक छोटी सी विद्यालय भी है, जहां पे आसपास के बच्चे आकर शिक्षा लेते है. वहां के लोग, शायद ही इन इमारतों के बारे में अनजान है, लेकिन प्रकृति के काफी करीब है. उनमे एक अनुशासन है, लगाव है, जीने की इच्छा है, और सबसे ज्यादा प्रकृति के प्रति खूब प्यार है। शायद हरियाली, पानी, पेड़- पौधे, जंगली जानवर- इन्ही लोगों की वजह से अभी भी जीवित है।

खारा  बादल  शायद ही बड़ी सी दुनिया में एक छोटी सी गांव है, लेकिन अगर ज़िन्दगी की खूबसूरती जानना है, तो खारा बादल जैसे गांव में एक बार तो आपको जाना ही चाहिए !
 स्वाथी करमचेती (लेखिका पत्रकार है, रेडियों, टेलीविजन, अखबार जैसे विभिन्न माध्यमों से खबर का नया चेहरा गढ़ने में माहिर, यू०एन०डी०पी द्वारा यंग-लीडर के तौर पर दो बार चयनित, अपने मित्रों में ये चलती फ़िरती इनसाइक्लोपीडिया के नाम से मशहूर है, ज्ञान को बांटने में सदैव तत्पर, अपने कार्यों द्वारा दुनिया को तमाम मसलों से अवगत कराने की निरन्तर कोशिश, इनसे swathikaramcheti@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)



1 comments:

Dehaatkibaat said...

good job
and live story

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