डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 28, 2010

कानपुर चिड़ियाघर में शाहजहाँ के जलवे !

फ़ोटो साभार: सीजर सेनगुप्त*
"दुधवा के एक खूबसूरत बाघ की कहानी"

1. शाहजहां नाम उस बाघ को दिया गया जो मई से लेकर सितंबर तक पीलीभीत, लखीमपुर, शाहजहांपुर और फर्रूखाबाद में गदर काट दिया था।

2. यह बाघ पीलीभीत के दियोरिया रेंज के जंगल से निकला था, इसने आधा दर्जन से अधिक लोगों को अपना निवाला बनाया था।

3. इस बाघ को पकड़ने के लिए कई जिलों की वन टीमें लगी थीं और लाखों रुपये इसे पकड़ने पर खर्च किए गए थे।

4. अंत में शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह के नेतृत्व में टीम ने इसे बेहोश कर पकड़ा और इलाज के बाद इसे कानपुर चिड़ियाघर भेजा।

5. चूंकि शाहजहांपुर की टीम ने इस खतरनाक हो चुके बाघ को पकड़ा था, इसलिए इस बाघ का नाम शाहजहां ही रख दिया गया।

शाहजहांपुर। उस वक्त तो बस पूछिए मत...हर कोई अपने घरों में दुबका रहता था। बंडा और खुटार इलाके में लगता था जैसे कि कफ्र्यू लगा हो। हर कोई उस आदमखोर हो चुके बाघ के हमले के डर से घर से निकलना ही नहीं चाहता था। एक नहीं चार-चार जिलों के लोगों में बाघ की दहशत साफ देखी जा सकती थी। वन महकमा भरी बरसात में जंगलों की खाक छान रहा था, लेकिन बाघ की लोकेशन तक नहीं मिल पा रही थी। एक के बाद एक आधा दर्जन लोगों को बाघ अपना निवाला बना चुका था। प्रदेश भर में इस बाघ का हल्ला मचा हुआ था। तब शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह और उनकी टीम इस आदमखोर बाघ के पीछे लगी। इस टीम ने बाघ का तब तक पीछा नहीं छोड़ा, तब तक उसे बेहोश कर पड़क नहीं लिया। पकड़े जाने के बाद बाघ को लखनऊ चिड़ियाघर भेजा गया, वहां से उसे कानपुर चिड़ियाघर भेज दिया गया। तब से बाघ कानपुर में ही है और पूरी तरह से स्वस्थ्य है। बाघ को शाहजहांपुर की वन विभाग की टीम ने पकड़ा था, इसलिए उसका नाम भी शाहजहां रख दिया गया। अब यह बाघ कानपुर चिड़ियाघर में आने वालों का आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। वहां लोगों को बताया जाता है कि जब एक जानवर अपने आप को बदल कर सामान्य जिदंगी जी सकता है तो इंसान क्यों नहीं बदल सकता है। इधर, शाहजहांपुर के डीएफओ पीपी सिंह को पिछले दिनों मुख्यमंत्री ने बाघ को सफलता पूर्वक पकड़ने के लिए प्रशस्ति पत्र भी दिया है।

आइए बताते हैं शाहजहां की कहानी

बात मई की है। पीलीभीत वन प्रभाग की दियूरिया रेंज से एक बाघ निकला। उसने एक-एक कर छह ग्रामीणों को मार दिया। वन संरक्षक बरेली ने बाघ को पकड़ने के लिए अपनी अध्यक्षता में प्रभागीय वनाधिकारी पीलीभीत, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर की सदस्यता में एक समिति का गठन किया। इस कार्य में सहायता के लिए वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ  इंडिया (डब्लू टी आई) तथा डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंडिया की सहायता ली गई। तमाम प्रयासों के बाद भी बाघ लगातार टीम को चकमा देता जा रहा था। इसी बीच बाघ ने पीलीभीत जिले से भागकर खन्नौत नदी पार करते हुये शाहजहांपुर में 23 अगस्त को प्रवेश कर एक ग्रामीण को मार डाला। जब तक शाहजहांपुर वन प्रभाग में आवश्यक तैयारी हो, 26 अगस्त को बाघ ने एक और ग्रामीण को मार दिया। तीन दिन के अंतराल में एक ही गांव के दो-दो लोगों की बाघ हमले में मौत के कारण जनता में भय व्याप्त हो गया था, साथ ही आक्रोश भी। 27 अगस्त को प्रमुख वन संरक्षक वन्य जीव ने आंतकी बाघ को पकड़ने के लिए प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर को निर्देश दिया गया। भीषण बरसात, बाढ़ तथा दलदले वन क्षेत्र में, चारों ओर फैले गन्ने के खेत के अंदर बाघ को पकड़ना तो दूर की बात है, बाघ के दर्शन मात्र भी मुश्किल थे। 27 सिंतबर तक बाघ के लिए खुटार वन क्षेत्र में निरंतर प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर के नेतृत्व में अनुश्रवण कराया गया। उक्त के दौरान बाघ को दो बार पकड़ने के लिए प्रयास भी किया गया, परन्तु बाघ भागने में सफल रहा। 

फिर आया सिंतबर का महीना

सितंबर के अंतिम सप्ताह में बाघ शाहजहांपुर से निकलकर लखीमपुर, हरदोई होते हुये 13 अक्टूबर की रात में रामगंगा तथा गंगा नदी पार करते हुये फर्रूखाबाद पहुंच गया। 14 अक्टूबर को प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग शाहजहांपुर अपने प्रशिक्षित दल के साथ हीरानगलासिंह गांव में दोपहर करीब एक बजे पहुंचे तथा बाघ को पकड़ने का अभियान प्रारंभ किया। लगभग दस हजार ग्रामीणों की भीड़ को नियंत्रति कर कटीले झाड़ीदार जंगल के अंदर बाघ को बेहोश करना अत्यंत ही कठिन कार्य था। सहयोगी कर्मचारियों की सहायता से शाम करीब पौने सात बजे अंधेरे मे सर्च लाइट की सहायता से बाघ को बेहोशी का इंजेक्शन लगा और वो लगभग 15 मिनट के अंदर बेहोश होकर जैसे ही जमीन पर गिरा, जाल की सहायता से उसे कब्जे में ले लिया गया तथा बाघ को लोहे के पिंजड़े में बंद कर दिया गया और उसे होश में लाने का इंजेक्शन दिया गया। बाघ संपूर्ण स्वस्थ्य एवं सही हालत में था। प्रमुख वन संरक्षक, वन्य जीव से प्राप्त निर्देशों के अनुसार उक्त आतंकी बाघ को रात्रि में ही लखनऊ प्राणी उद्यान पहॅुचाया गया। 

अब कानपुर में हैं इसके जलवे

आवश्यक चिकित्सीय परीक्षण के उपरांत कानपुर प्राणी उद्यान भेज दिया गया। प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी प्रभाग, शाहजहांपुर द्वारा उक्त आदमखोर बाघ का शाहजहांपुर जिले के नाम से नामकरण करते हुये उसका नाम ’’शाहजहां’’ रखा। आज की तिथि में लगभग तीन वर्ष उम्र्र का ’’शाहजहां’’ कानुपर प्राणी उद्यान में दर्शकों को रोमांचित कर रहा है। मई 2010 से अक्टूबर 2010 तक उत्तर प्रदेश के पांच जिलों में में आतंक फैलाने वाले आदमखोर बाघ को जीवित पकड़े जाने के उपरांत जनमानस में फैला आंतक समाप्त हुआ एवं ग्रामीण निश्चित होकर अपना कृषि कार्य कर रहे हैं।

पीपी सिंह को मिला सम्मान

बाघ को सफलतापूर्वक पकड़ने के लिए शासन द्वारा मुख्यमंत्री की सहमति से पीपी सिंह, प्रभागीय निदेशक सामजिक वानिकी वन प्रभाग, शाहजहांपुर को प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। प्रश्नगत राष्ट्रीय पशु बाघ का नामकरण ’’शाहजहां’’ होने से तथा शाहजहांपुर जिले के वनाधिकारी पीपी सिंह प्रदेश स्तर से सम्मानित होने पर जिला शाहजहांपुर गौरवांवित हुआ।

( *बाघ की तस्वीर शाहजहाँ की नही हैं, यह मात्र प्रतीकात्मक है।)
हिन्दुस्तान दैनिक से साभार (शाहजहाँपुर संस्करण में २७ दिसम्बर २०१० को प्रकाशित)

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