डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 1, 2010

एक आदिम प्रजाति जो अब संकट में हैं!

सीम (Chitra indica)

सीम Chitra indica (Narrow headed soft-shell turtle)
छोटे सिर और मुलायम कवच वाले इस जीव का ब्यौरा दे रहे है भास्कर मणि दीक्षित
इसे लोग हिन्दी में सीम और स्योतर कहते है। ये मुख्यतः गंगा, गोदावरी, सिंध, कावेरी, कृष्णा तथा महानदी आदि नदियों में पायी जाती हैं। किन्तु तराई में ये सरयू तथा घाघरा नदी में भी काफी संख्या में पायी जाती है। सरयू नदी आगे जा कर घाघरा नदी से मिलती है। राम के जन्म स्थान अयोध्या तक ये नदी सरयू के नाम से ही जानी जाती है, लेकिन उसके बाद ये घाघरा के नाम से पहचानी जाती है। सरयू नदी की कुल लम्बाई 160 किमी0 के लगभग है।
मछलियाँ चित्रा इंडिका का प्रिय भोजन है इसलिये ये मछलियों को अपने सिर से प्रहार कर के शिकार करते हैं। सिर से प्रहार करने के कारण लोग इसे फाइटर भी कहते है। इन्हें शव खाना पसन्द नही है।
यह काफी शर्मिला प्राणी है इसलिये यह अपना दिन का अधिकाँश समय नदी की गहरी बलुही तलहटी पर ही बिताता है और रात से सुबह तक ये शिकार तथा भ्रमण करने मे बिताता है। लेकिन साँस लेने के लिये इसे कई बार पानी की सतह पर आता पढ़ता है और कम समय के लिये बाहर निकलने के कारण ये अत्यन्त ही रहस्यमयी प्रकृति का प्राणी है इसलिये इनके बारे मे जानना और इनको देखना दोनो ही अत्यन्त मुश्किल है।
इसकी पीठ मे वैसी ही रेखायें और आकृतियाँ बनी होती है जैसा कि नदियों में पाये जाने वाले एक तरह के घास (सेवार) की होती हैं जिसके बीच में ये छुप जाता है और फिर मछली के पास आने पर उसे अपने सिर से प्रहार कर शिकार कर लेता है। शरीर के आकार के हिसाब से ये अपने सिर को निकालता हैं।

 इसका सिर छोटा, लम्बा और पतला होता है तथा इनकी गर्दन और सिर एक दूसरे से इस तरह चिपके होते है कि इन्हें अलग अलग देखना मुस्किल होता है। इनके ऊपर का खोल नीचे झुका और अन्डाकार होता है। इनके ऊपरी हिस्से का रंग हल्का हरा या भूरा और उस पर कुछ आड़े तिरछे रेखायें, कुछ जाल की तरह चौकोर और गोल आकृति बनी होती है। गर्दन पर ट के आकार का निशान होता है। इसके नीचे का हिस्सा सफेद रंग का होता है। इनकी आँखें नाक के पास ही होती हैं। इसकी आँखे राई या सरसो के दानों के बराबर होती हैं। खास बात ये है कि उम्र और आकार बढ़ने के बावजूद
इनकी ये छोटी आँखें बहुत तेज होती हैं और पानी की सतह पर ये अपनी छोटी सी आँखें निकाल कर चारो तरफ देखते है और दूर से ही पानी में होने वाली किसी भी तरह की हलचल को भाप कर तुरन्त ही नदी की घाँसों में अथवा रेत के अन्दर छुप जाते है। आँखों के साथ साथ इनकी सूघने की क्षमता भी बहुत अधिक होती है जिससे ये मछलियों का शिकार उनकी गंध से ही करते हैं।

रेत के अन्दर छुपता चित्रा इंडिका का नवजात इस कछुवे में मादा बड़ी होती है और इसका वजन लगभग 3 कुन्टल तक और लम्बाई चौडाई करीब 5.5 ग 4.5 फीट तक होता है। नर कछुवा, मादा से वजन और आकार मे छोटा होता है। ये 24 से 30 महीने मे वयस्क हो जाते हैं और अपना जोड़ा बना लेते हैं।

ये जुलाई से नवम्बर माह तक अन्डे देते है। मादा एक बार में 70 से 250 तक अन्डें देती है। ये कछुवें नदी से काफी दूर और ऊंची जगह पर पेड़ो या झाड़ियों के नीचे जमीन को खोद कर बिल जैसे गढ्ढे मे अन्डें देकर ऊपर से मिट्टी से बंद कर के आस पास की मिट्टी को भी खोद कर एक जैसा बना देते हैं। उस स्थान की मिट्टी मे रेत, एक निश्चित तापमान और नमी का होना कछुए के अन्डों के घोसलों के लिये उपयुक्त होता है।
नदी से घोसलें की ऊचाई नापते हुए घोसलों में अण्डें, अण्डों को देने के बाद मादायें उसे प्रकृति के निगरानी मे छोड़ कर चली जाती है। ऐसा भी देखा गया हैं कि कभी कभी वे मातृत्व भाव से प्रेरित हो कर अपने घोसलों के निरिक्षण के लिये पुनः वापस भी आती हैं। नेवला तथा सियार जैसे जानवर इन घोसलों की ताक मे अण्डे देने जा रही माँ के पीछे लग जाते हैं या फिर घोसलों को सूंघ कर ढूढ लेते है और खा जाते हैं। इन जानवरों को धोखा देने के लिये और घोसले के लिये उपयुक्त स्थान तलाशने के लिये यह कई दिन तक कई स्थानों को खोदती रहती है। इन जंगली जानवरों के अलावा कुछ सभ्य जानवर यानी इन्सान भी इन अण्डों के फिरा़क मे रहते हैं।

चित्रा इंडिका के बच्चें अगर इन सब जानवरो से घोसला और अण्डें बच भी गये तो भी इनकी जिन्दगी के लिये दौड  खत्म नही होती है। सभी जलीय कछुवों के बच्चे जन्म लेते ही अपने घोसले को छोड़ कर नदी की तरफ दौड़ते हैं और इस जिन्दगी की दौड़ में वही जीवित बच पाता है जो समय से नदी में पहुच पाता है क्योकि उनके
शिकार की ताक में बहुत से पशु और पक्षी घात लगाये बैठे रहते हैं। ऐसा नही है कि नदी में पहुंच कर, ये सुरक्षित हो जाते हैं, नदियों के अन्य जीव जन्तु यहाँ तक की दूसरे प्रजाति के मांसाहारी कछुवें भी इस निरीह तथा पौष्टिक भोजन के इन्तजार में आँख लगाये बैठे रहते हैं।

अगर ये इन सब से बच भी गये तो थोड़े बड़े होने के बाद शिकारियों का निशाना बनते है क्योकि 8 किलो वजन का होने के बाद इनके शरीर के कुछ अंगों की अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर माँग बढ़ जाती है अतः लालचवश इन्सान इस मासूम प्राणी के पीछे हाथ धो कर पड़ जाता है।

पूरे देश के साथ साथ सरयू तथा घाघरा नदी में इनका जबरदस्त शिकार हो रहा है जिससे ये यहाँ से लुप्त होने की कगार पर है। इनकी संख्या नदियों में इतनी कम हो गयी है कि इन्हें नदियों में देखना अब नामुमकिन सा हो गया है।

इस पृथ्वी में जितने भी प्रजाति के जीव तथा जन्तु पाये जाते हैं उन सभी का इस प्रकृति के लिये विशेष महत्व होता हैं। प्रकृति ने हर प्राणी तथा जीव जन्तुओं को विशेष प्रयोजन से बनाया है। हर प्रजाति के कछुवें को भी प्रकृति ने जल, तथा थल की सफाई के लिये रचित किया। हम इन्सानों की लालच की वजह से आज इनकी कई प्रजातियाँ संकटग्रस्त की श्रेणी में आ गये हैं।

चित्रा इन्डिका को इन्डियन वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 के अन्तर्गत शेड्यूल -I के अन्तर्गत CITES के अनुसार परिशिष्ट II में रखा गया है। IUCN के मुताबिक इस प्रजाति का अस्तित्व खतरे में है, और इसे endangered की श्रेणी में रखा गया है।

आप  सभी से अनुरोध है,  कि इन्हे बचाने की पहल करें । इनके बारे में जानकारी एकत्र कर के तथा दूसरों से बाँट कर औरों को भी जागरुक करें।मासूम प्राणियों पर हो रहे अत्याचार को नजरअंदाज ना करें उसका विरोघ करें। आप भी इनके संरक्षण में

अपना अपने कीमती समय से थोड़ा सा समय इनके लिये भी निकालिये। मासूम निगाहों से ये हम सभी की ओर आशा तथा विश्वास के साथ देख रहें हैं।
आइये हम सभी इस बेजुबान और संकटग्रस्त प्राणी को बचाने मे अपना सहयोग करें।

भास्कर मणि दीक्षित (लेखक वन्य जीव सरंक्षण व उनके अध्ययन में  "तराई एन्वायरनमेन्टल फ़ाउन्डेशन गोन्डा" द्वारा बेहतर सामूहिक प्रयास कर रहे हैं। गोण्डा जनपद में निवास, इनसे   bdixit63@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं)

5 comments:

Anonymous said...

VERY INTERESTING....!!!!!!!!!

PN Subramanian said...

इस विचित्र कछुए की जानकारी के लिए आभार.,

Anonymous said...

thank you for the interesting information.

Dr.Ravi Singh said...

I appreciate yr writing and effort

Dr.Ravi Singh said...

U know once I was travelling to Balrapur via Bagh express, on boarding to Badshahnagar we found that in general comartment at toilet there was some container, we scared for explosive and I at once called Railway helpline no 9919099190, they followed me and reached with policeman at Barabanki Junction.
As soon as they approached the toilet they said "are ye to kachua hai"even without opening the container.(means they know very well about smugling).
They carried the container with them.

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विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
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