डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 31, 2010

सफ़ेद बाघ

मनोज शर्मा* इसका रंग ही बन गया इसकी कैद का सबब:
मैंने सफ़ेद टाइगर को छतीसगढ़ में भिलाई के मंत्री गार्डेन में पहली बार देखा था तो लगा की सफ़ेद टाइगर कुदरत का ये अनमोल तोफहा है। लेकिन  उस के  बारे जाने की कोशिश की  तो लगा अपने सफ़ेद रंग के कारण से यह कितनी बड़ी सजा मानव के द्वारा मिल रही है।  अपने सफ़ेद रंग के कारण से पूरा जीवन जेल में कटाता है  क्या उसके साथ हम अन्याए नहीं कर रहे है  ? 
सफेद बाघ  बड़े ही आकर्षक - विशाल आकार, श्वेत चर्म पर गहरी भूरी धारियां, हल्के गुलाबी होंठ और नाक, तथा कठोर नीली आंखें। इन विलक्षण जानवरों की कहानी अत्यंत रोचक है।

देश-विदेश के चिड़ियाघरों में प्रदर्शित सभी सफेद बाघों का पूर्वज मोहन नाम का सफेद बाघ है। उसे १९५१ में रीवा के बाग्री वनों में अपनी मां के साथ विचरते समय पकड़ा गया था। उसकी मां तो शिकारियों की गोलियों की भेंट चढ़ गई पर मोहन, जो उस समय एक निरा दूध-पीता बच्चा था, जिंदा पकड़ लिया गया। उसके विलक्षण रंग को देखकर रीवा के महाराजा ने उसके विशेष परवरिश की व्यवस्था कर दी। जब वह बड़ा हुआ तो बेगम नाम की एक साधारण बाघिन से उसका जोड़ा बांधा गया। बेगम ने १९५३-५६ के दौरान तीन बार बच्चे जने और कुल १० शावक पैदा किए। ये सब साधारण रंग के बाघ थे। वर्ष १९५८ में उनमें से एक बाघिन राधा से, जो मोहन की ही पुत्री थी, मोहन के चार बच्चे हुए, जो सभी श्वेत रंग के निकले। आज चिड़ियाघरों में दिख रहे बीसियों सफेद बाघ सब इन्हीं चार शावकों के वंशज हैं। इन सबके पितामह मोहन ने २० वर्ष की लंबी आयु पाई और १९६९ में मध्य प्रदेश में रीवा नरेश के एक महल में उसका देहांत हुआ।


यद्यपि मोहन से पहले भी जंगलों में सफेद बाघ देखे गए हैं, लेकिन उनमें और मोहन में एक खास अंतर है। मोहन इन सफेद बाघों के समान "एलबिनो" नहीं था। एलबिनो जानवरों की आंखें गुलाबी रंग की होती हैं। वे बहुधा कमजोर एवं कद में छोटे होते हैं और अधिक समय जीवित नहीं रहते। मनुष्य समेत अनेक प्राणियों में एलबिनो पैदा होते हैं। मनुष्यों में उन्हें सूर्यमुखी मनुष्य कहा जाता है। उनके शरीर - बाल समेत - सफेद रंग का होता है क्योंकि उनमें रंजक पदार्थ नहीं होते। इसके विपरीत मोहन की आंखें नीली थीं और वह सामान्य बाघों से बड़ा और शक्तिशाली था। बंदी अवस्था में भी वह स्वस्थ रहा और उसने प्रजनन किया।

सच तो यह है कि मोहन एक "रिसेसिव म्यूटेंट" था। बाघों की चमड़ी, नाक और आंख के रंग को एक खास जीन निर्धारित करता है जिसे 'क' नाम दिया जा सकता है। इसके प्रभाव को निष्क्रिय बनानेवाला एक दूसरा जीन भी होता है, जिसे इसका रिसेसिव जीन कहा जाता है। इसे 'ख' से अभिहित किया जा सकता है। यदि किसी जीव में 'क' जीन न हो तो यह रिसेसिव जीन 'ख' सक्रिय हो उठता है और उस जीव को एलबिनो बना देता है। सामान्य रंग वाले बाघों में 'क-क' अथवा 'क-ख' का जीन-संयोजन पाया जाता है, जबकि सफेद बाघ में अनिवार्यतः 'ख-ख' का जीन-संयोजन होता है, यानी उनमें 'क' जीन का अभाव होता है। इस तरह यदि बाघ-बाघिन में से एक भी 'क-क' हो, तो सभी शावक सामान्य पैदा होंगे, परंतु यदि दोनों 'क-ख' हों तो एक-आध शावक सफेद पैदा हो सकते हैं। परंतु यदि दोनों ही 'ख-ख' हों, तो उनके सभी बच्चे सफेद पैदा होंगे। यद्यपि १९५१ से पहले भी शिकारियों द्वारा सफेद बाघ मारे गए हैं, लेकिन मोहन पहला सफेद बाघ था जिसे जिंदा पकड़ा गया और उसने बंदी अवस्था में प्रजनन भी किया। उसकी संतति के कारण सफेद बाघ विश्व-प्रसिद्ध हो गए।

उनके विलक्षण रंग और विशाल आकार के अलावा सफेद बाघों और अन्य बाघों में कोई भी अंतर नहीं होता है। दुर्भाग्य से अत्यधिक अंतरप्रजनन के कारण इस विलक्षण जीव की नस्ल बहुत क्षीण हो गई है। मोहन की वंश परंपरा में ११४ सफेद बाघ पैदा हुए, जिनमें से केवल २५ आज भारत और अन्य देशों में जीवित हैं।




मनोज शर्मा ( लेखक लाइव इंडिया में लखीमपुर के जिला सवांददाता है, किशनपुर वन्य जीव विहार के निकट मैलानी में निवास, इनसे manojliveindia@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)

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