डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 15, 2010

जंगलनामा में अरूंधती रॉय और नक्सल!

अरूंधती रॉय की राय से सहमत क्यों नहीं:
अरूंधती रॉय एक भद्र और विदुषी महिला है। उनकी अनेक किताबें प्रकाशित हो चुकी है। उन्हे बुकर एंव साहित अकादमी सहित अनेक पुरस्कार प्राप्त हो चुके है।
एक लेखक तभी सफ़ल होता है। जब वह समाज की भावना को समझकर उसकी इच्छानुरूप  लिखता है। ऐसे में यह बात अजीब लगती है। कि उनके जैसी सफ़ल लेखिका  आज नक्सलवाद का समर्थन कर रही है। जबकि आज समाज की मुख्य धारा नक़्सलवाद के सख्त खिलाफ़ है।

लेकिन जब हम उनकी बातों को गम्भीरता से समझे तो हमे महसूस होगा, कि वे आदिवासियो और पर्यावरण को हो रहे अकल्पनीय नुकसान से चिन्तित है! उन्हे यह भी मालूम है, कि देश में जो आज पत्रकारों अधिकारियों और राजनीतिज्ञों का जो नेक्सस आकन्ठ भ्रष्टाचार में डूबा हुआ है। उसे केवल उद्योगपतियों के सिक्कों की खनक सुनाई पड़ती है। बेगुनाह आदिवासियों की और बेजुबान वन्यप्रणियों की चीत्कार नही सुनाई पडती।
कल दिये एक इन्टरव्यू में उन्होंने कहा कि आदिवासी इलाकों मे हर जंगल नदीं नालों और गावों के लिये एम ओ यू हो रहा है। वहां एक ऐसी सुनामी आ रही है, जिसका जवाब ना आदिवासियो के पास है,  और न ही वन्यप्रणियों के पास! उनका यह भी कहना था कि प्रजातन्त्र में हर किसी को अपनी बात कहने का पूरा हक है। लेकिन इस बात को कोई गम्भीरता से ले, इसकी कोई व्यवस्था तो मुझे  दिखाई नही पडती।

उनकी बाते आज छत्तीसगढ पर पूरी तरह से लागू होती है। आज छत्तीसगढ देश का सर्वाधिक नक्सल प्रभावित राज्य है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में राज्य सरकार पर टिप्पणी की,  कि आप निर्णयों को लागू कैसे करोगे? राज्य के 50 % इलाकों में तो आपका नियन्त्रण ही नही है।

कारण क्या है! कि माओवाद आज हमारी  सरजमी पर सर उठा चुका है!  वजह साफ़ है कि हम बीमारी के लक्षणों को पहचान नही पाये और नौबत यहां तक आ गयी, कि राज्य के एक बडे हिस्से में आज शासन किलाबन्द थानों तक सीमित हो गया है। और तो और इन में कई थानें तो ऐसे हैं, जिनमे रसद और सिपाही केवल हेलिकाप्टर से ही भेजे जा सकते हैं। क्योकि सड़क मार्ग पर नक्सलवादियों का नियन्त्रण हैं।

ऐसा क्यों है, कि आदिवासी नक्सलवाद से जुड़ गये, उनकी तकलीफ़ें शासन और आम जनता तक पहुंच क्यों नही बन पायी, क्यों यह जानते हुए कि हर नये एम ओ यू से नये इलाकों के आदिवासी भी नक्सलवाद से जुड़ जायेंगे  धड़ाधड़ M.O.U. (Memorandum of Understanding) होते गये देश की मुख्यधारा की जनता तक ये खबरे क्यों नही पहुचीं।

किसी भी राजनीतिक तंत्र में पत्रकारिता की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। लेकिन आज चंद पत्रकारों को छोड़ दे तो आज भारत में पत्रकारिता की स्थिति दयनीय है। आज हर सरकारी दफ़्तर में पत्रकार पैसे की उम्मीद में घूमते नजर आते है। और जो स्थापित हैं उनके पास पैसा अपने आप पहुंच जाता है। वह क्या खबर छापनी है और क्या नही यह पूँजीपति, राजनेता और अधिकारी तय करते हैं। वास्तविक्ता के कड़वे सत्य को छापनें का इनके लिये कोई बन्धन भी नही है। अर्थिक प्रतिफ़ल भी नही और यदाकदा कोई सत्यवान आ भी जाये तो उसकी खबर छापेगा कौन छापते तो वो हैं जो छापते क्या हैं! जरा गौर फ़रमायें-
"किया कराया खाया खिलाया प्रेम विवाह मनचाहे स्त्री पुरु वशीकरण कर्ज तन्त्र-मन्त्र पारिवारिक कलह सभी तरह की समस्या के समाधा के लिये मिले पंडित रामकुमार शर्मा 11 बार के गोल्ड मेडलिस्ट नोट हमारें यहां एक घन्टे मे नतीजा दिया जाता है"

ये वो बानगी है, जो हमारे खबरीलाल छापते हैं, और दिक्कत क्या है भाई पैसे की क्या कमी है, मुख्यमन्त्री से लेकर नीचे तक सभी आपकी सेवा करते है। फिर पैसे की इतनी कमी कि महज् 3000 हजार के लिये महीने भर तक यह एड चलता है।
खैर छोडिये  बात अरुन्धती राय की हो रही थी! उन्हे लगता है कि देश की इन परिस्थितियों में देश में केवल सशस्त्र आन्दोलन के द्वारा ही व्यवस्था की सडान्ध को दूर किया जा सकता है। बात सही भी है, कि भ्रष्टाचार के इस नेक्सस को तोड़ना अत्यन्त कठिन है। किसी चलते आन्दोलन का समर्थन करना आसान है! और नया आन्दोलन खड़ा करना बहुत मुश्किल!
 पर उन्हें इस बात को समझना होगा कि नक्सलवाद इससे भी बडा खतरा है। नक्सलवादी अपने कब्जे के इलाकों में अत्याचार की सीमा लांघ चुके है। प्रतिदिन निर्दोष लोगों को शासन का मुखबिर बता कर मार रहे हैं। वन्यप्राणियों की इनके आन्दोलन में कोई जगह् नही है। पत्रकारों को भी ये ध्यान रखना होगा कि जो पूँजीपति उन्हे पैसा देते है, उनकी भी नक्सलवादियो से साठगाठ है! आज नक्सलवादी सदियों से समरसता से रह्ते आये आदिवसियों में एक ऐसा वर्ग भेद पैदा कर रहे हैं, जिसके घावों को भरने में दशकों लग जायेंगे उनकी लगाई बारूदी सुरंगें सिपाही और आम आदमी में फ़र्क नही करती! उनके द्वारा सेना में भरती किये जा रहे मासूम  बच्चे किस यंत्रणा से गुजर रहे है, इसका अंदाज़ा लगाना भी मुश्किल है।


हमें यह भी समझना होगा कि माओवाद और प्रजातन्त्र में मूलभूत अन्तर है!  प्रजातन्त्र में आप परिवर्तन के लिये वोट कर सकते हैं और माओवाद में परिवर्तन के लिये खून बहाना पडता है। अरुन्धती जी शायद थ्येन आन मन चौक में हुए नरसंहार को भूल गयी हैं। एक दुश्मन को हराने के लिये दूसरे से हाथ मिलाना बेवकूफ़ी ही होगी।
भ्रष्टाचार के कुचक्र को तोडने के लिये आवश्यकता अभिमन्यु बनने की है!  दुस्शासन बनने की नही! हमें नक्सलवाद को खत्म करने के लिये आदिवासियों की परेशानियों को दूर करना होगा और उस जंगल को मूल स्वरूप में उन्हे लौटाना होगा, जिसमें वे और वन्यप्राणी हजारों वर्षों से खुशहाल जीवन व्यतीत करते आये थे।
 ऐसा भी नही है, कि यह काम आसान है, वर्षों के शोषण के बाद ये काम मुश्किल भी है, और श्रमसाध्य भी! साथ ही  हमारे देश के लोगों में एक ऐसी भावना बनी हुई है, कि सेना हमें हर मुश्किल से मुक्ति दिला सकती है! पर सेना के भी हाथ जकड़े हुए हैं! वह हमें तत्कालिक मोर्चों पर तो जीत दिला सकती है, लेकिन लोगों के मनों पर जीत नही दिला सकती!  हमें यदि माओवाद को हराना हैं। तो हमें पहले प्रजातंत्र में आयी खामियों को दूर करना होगा और हम जो अंधाधुंध कथित विकास के नाम पर पर्यावरण और वनवासियों को जो नुकसान पहुंचा रहे है, उसे रोकना होगा।
अगर हम लाखों एकड में फ़ैले साल और सागौन के वनों को हम फ़लदार एंव महुआ और तेंदू जैसे पेडों के वन में परिवर्तित कर दें तो ना आदिवासी बदहाल रहेंगें ना ही भारत की जनता और वन्य प्राणी भूखे। माओवाद नामक जिन्न अपने आप बोतल में बन्द हो जायेगा!

इस आन्दोलन का बीज उसी दिन पड़ गया था, जिस दिन हमने उन प्राक्रतिक फ़लदार वनों  को काटकर उसका कोयला बना दिया था। उसके बदले में सागौन व नीलगिरी जैसे पेड़ों का प्लान्टेशन कर दिया था। इस बीज को सींचा हमारे अधिकारियों के बेलगाम व्यवहार एंव पत्रकारों की अनदेखी ने! इसे प्राणवायु दी उस लालच ने जो येन केन प्रकारेण किसी भी कीमत पर पैसा कमाना चाहता है।

समय कम है, मोर्चें पर हमारे सैनिकों की प्रतिदिन लाशे गिर रही हैं, हमें व्यवस्था की खामियों को दूर् करना पडेगा जब तक बहुत जरूरी ना हो, हमें वन क्षेत्रों में खनन को रोकना होगा। हमें समझना होगा कि सागौन नीलगिरी साल जैसे पेड हमारे लिये अपरिहार्य नही हैं, उनसे जैव-विविधता को नुकसान होता है। हमें वनों को उनके मूल स्वरूप में लौटाना होगा। लाखों एकड़ बेकार पड़ी रेवेन्यू और रेलवे की जमीन में भी फ़लदार एंव ऐसे पेड़ों का रोपण करना होगा, जिनके पत्ते हमारे मवेशी खाते है, इससे रोजगार भी उत्पन्न होगा भोजन भी, और दूध भी। देश मे खुशहाली केवल खदानों से कारखानों से ही नही बल्कि दूसरे माध्यमों से भी आ सकती है। ये माध्यम पर्यावरण के लिये भी अच्छे है। समय रहते कदम उठाने होंगे वरना यदि गैर आदिवासी गरीब जनता ने भी माओवादियो से और पर्यावरण् तन्त्र ने ग्लोबल वर्मिंग से एम ओ यू कर लिया तो सिवाय बगले झाकंने के अलावा कोई उपाय नही रह जायेगा!
 
 
अरुणेश सी दवे*  (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)  
Arundhati Roy photo credit: keralawomen.com 

3 comments:

prithvii said...

apne sahi kha hai ki हमें वन क्षेत्रों में खनन को रोकना होगा. हमें समझना होगा कि सागौन नीलगिरी साल जैसे पेड हमारे लिये अपरिहार्य नही हैं, उनसे जैव-विविधता को नुकसान होता है. हमें वनों को उनके मूल स्वरूप में लौटाना होगा. lekin chinta ki baat yahi hai ki is jarurat ko koi samjh nahi rha hai wisheshkar sarkar aur sarkari prtindhi jo bahut kuch kar sakte hain.

rupal ajabe said...

aroonesh jee!!!! aapka lekh padha aur samjha bhi hamare desh k buddhijeevi bhi khud ko insaan nhi maante, ye ke bahut hi gehari baat hai jo mujhe kai dino se mehsoos ho rhi hai!! naksalwaad ! maaowaad!!!saare waad wahin k wahin khade hein!!! desh ki janataa wo hi piti hui haalat mein hai jaise use kuchh maaloom hi nhi hona dena chahte hein ye log!!! aapne sena shaasan ki baat kahi kahin to sena k ye haal hein aur kahin senaa aataataai bani hui hai manipur k haalaat humse chhipe nhi hein!! sainik shaasan wahaan se ugrawaad khatm karne k liye laagu kiya gaya aur aaj wahaan sainik shaasan k atyaachaar k kaaran kai ugrawaadi sangathan ban gaye hein!! kya maaloom kya hai ye!!! aam janataa ka to haal ye hai k wo apne hi desh mein rah kar soch rhi hai k wo kahaan jaaye!!!

rupal ajabe said...

badhaai aur shubhkaamnaaein aapko!!!!

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