डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jun 29, 2010

जंगल, आदिवासी और नक्सल क्या ये अलग अलग हैं?

जंगल, आदिवासी, नक्सल, और वन्य जीव: 
छतीसगढ़ अतीत में दक्षिण कोशल के नाम से जाना जाता था, रामायण के
अनुसार यह क्षेत्र राम के पिता दशरथ के आधीन था। और श्रंगी रिषि जैसे आर्य मह्त्माओं का निवास रहा, यह क्षेत्र, यहाँ के जंगलों में आर्य-आनार्यों का बहुत सा इतिहास व्याप्त है, जो तमाम पौराणिक रचनाओं व विदेशी यात्रियों के विवरणों में मिलता है, जंगलों और जंगली जीवों का यह बसेरा जिसमें भारत वर्ष की आदि संस्कृतियां बसती आयी, बिना किसी से कुछ लिए! किन्तु विदेशी शासन से लेकर आजतक लोग इन जंगलों और वहाँ के रहने वालों को अपने हितों में इस्तेमाल करते रहे! इसके बावजूद ये लोग समाज की मुख्य धारा से नही जुड़ पाये या जोड़े नही गये ! नतीजा आप सब के सामने है!  प्राकृतिक संशाधनों का दोहन ब्रिटिश भारत से लेकर आजतक होता रहा, इसका नुकसान वन्य-जीवों और आदिवासियों दोनों पर पड़ा। जंगल सिकुड़ते चले गये, और जमीने बाहर के लोगों को या सरकारी इस्तेमाल में ली जाती गयी, व्यवसायिक पौधारोपड़ कराये गये, जिनसे इन आदिवासियों को कोई लाभ नही है! अब सरंक्षण नीतियों में भी जंगल के आदमी और और नियमों में सामंजस्य नही है, कमोवेश अब वही लोग जो जंगल से उतना ही लेते थे, जितने में उनकी जिन्दा रहने की बुनियादी जरूरते पूरी हो जाती थी, अब वही लोग इन जंगलों के प्रति वह भाव नही रख पा रहे है, कारण सभी को स्पष्ट है।
इतिहास के आइने में नस्लों के अतीत को देखे तो यही तो सबसे पौराणिक भारतीय हैं, और इन्हे ही बेदखल रखा गया मुख्य धारा से!
अभी बहुत समय व्यतीत नही हुआ जब आदिवासी और वन्य प्राणी आपसी समरसता के साथ जंगल में निवास किया करते थे। १९ वी सदी के प्रारम्भ में अंग्रेजों ने इमारती लकड़ी की पूर्ति के लिए वृहद स्तर पर सागौन का रोपण शुरू किया। आजादी के बाद भी आज तक हम उन्ही नीतियों को लेकर चल रहे हैं। लाखों एकड़ प्राकृतिक वनों को काटकर उसका कोयला बना दिया गया। प्राकृतिक वनों में जो आज लुप्त होने की कगार पर है, आदिवासियों के लिए भी और वन्य प्राणियों के लिए भी भरपूर भोजन उपलब्ध था, यदि आप चंद बचे हुए नेचुरल फ़ारेस्ट में जाए तो वहाँ की जैव-विविधिता और सुन्दरता आपका मन मोह लेंगी।

हांलाकि अंग्रेजो ने अन्य प्रजातियों के भी १५ से २० % वृक्ष रखने के नियम बनाया था। लेकिन भारत में जहाँ शहरों में नियमों का पालन नही होता वहाँ वन में जहाँ आदिवासियों और शिकारियों को छोड़ कर यहाँ तक कि वन विभाग के अधिकारी भी नही जाते वहाँ नियमों का कितना पालन हो रहा होगा। यह सभी जानते हैं!

आज आदिवासी विद्रोह कर चुका है, और बाघ एंव उसकी प्रजा खत्म होने के कगार पर है। और महापुरूषों के रूप मे जन्म ले चुके अधिकारियों जिनकी ताकत और दौलत अकल्पनीय है, वह पर्यावरण की चिन्ता करे यह सोचना भी बेकार है। इन महानुभाओं ने बांधवगढ़ जैसे महत्वपूर्ण बाघों के आवास में सागौन को तो छोड़िए नीलगिरी तक का रोपण करवा रखा है।
ये वही अधिकारी है, जो आसाम के चाय के बागानों और उनके जैसे ही सागौन के जंगलों को बड़े शान से भारत के हरित भू-भाग में गिनते हैं। आज सरगूजा के जंगलों में रहने वाले हाथी ग्रामीनों पर कहर ढाह रहे हैं। क्योंकि प्लान्टेशन के जंगलों में उनका पेट भरने के लिए कुछ भी नही है।
एक तरफ़ हमने अन्धाधुंध विकास के नाम पर नवजवान आदिवासी पीढ़ी को टी०वी० मोटरसाइकल एंव अन्य सुविधाओं का स्वप्न दिखा दिया और दूसरी ओर उनके रिहाइसी इलाकों को ऐसा अकल्पनीय नुकसान पंहुचा दिया है, जिससे न केवल उनका पेट भरता था बल्कि जिसने हजारों सालों तक भारत भूमि को उपजाऊ बनाये रखा था।

बाघ जो उस पर्यावरण तन्त्र का धोतक है, जो हमारी जीवन रेखा है, आज अपने अस्तित्व की आखिरी घड़िया गिन रहा है, आज बचा हुआ है तो इस लिए कि राष्ट्रीय उद्द्यानों से हटे हुए गांवों की जमीन ने जो घास के मैदान बन चुकी है, उसकी भोजन श्रंखला को आखिरी सहारा दिया हुआ है।
पर अब उसका बच पाना मुश्किल है, हजारों सालों से उसके मित्र रहे आदिवासी अपनी भूख मिटाने के लिए वन्य प्राणियों के शिकारी बन गये हैं। और संसार चंद जैसे खिलाड़ी उनको चंद रूपये थमा कर मनचाहा शिकार करवा लेते हैं।
किन्तु आदिवासी अब करे क्या? जो प्राकृतिक जंगल उसे खुशहाल रखते थे। वो अब है नही, और जो सागौन के जंगलों से उसे खाना तो दूर जलाऊ लकड़ी भी नही मिलती, अत: अब वो शिकारी है, कभी बाघ का कभी पुलिस वालों का और उसके घर में उसको रोक पाना कठिन है!

अगर आप ने हिसाब लगाया है, तो आप भी समझ जायेंगे कि हर साल १००० रूपये देने वाला महुआ अच्छा है या ८० साल में १०,०००० देने वाला सागौन! पर दिक्कत यह है कि महुए से १००० रूपये मिलते है आदिवासी को और सागौन से १०,०००० मिलेंगे अधिकारियों और उनके स्वंमसेवक ठेकेदारों को!
अब सरकार ने गाँव-गाँव में वन रक्षा समिति बना दी है, लेकिन क्या अपने कभी किसी किसान को बंजर खेत की रखवाली करते देखा है, नही न!तो फ़िर आदिवासी सगौन और नीलगिरी की रखवाली क्यों करने लगा।
आज बाघ विलुप्त हो रहे है, तो इसकी वजह शिकार नही है, बल्कि इस वजह से कि उनकी भोजन श्रंखला का पेट भरने के लिए जरूरी प्राकृतिक वनों को हमने उजाड़ दिया है और प्लान्टेशन के जंगलों में भोजन की कमी के कारण वह बाघों की बड़ी आबादी को सहारा नही दे सकता।
एक ऐसा जानवर जो हर दो वर्षों में तीन से चार बच्चों को जन्म देता है, भले ही उनकी मृत्युदर अधिक हो पर यह कारण नही हो सकते, कि कान्हा के जगलों में पिछले कई दशकों से बाघों की संख्या ८० से १०० के बीच बनी रहे, कारण स्पष्ट है, जितना भोजन उतने जानवर।
जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचने के लिए भी प्लाटेशन नीति मे बदलाव लाने की जरूरत है,  नही तो विविधता पूर्ण जंगलों की विलुप्ति के साथ आदिवासियों की बुनियादी जरूरतों पर ग्रहण लग जायेगा, साथ ही वन्य जीवों में भी विविधता समाप्त हो जायेगी, और इसके परिणाम में आदिवासियों के मनोभावों में परिवर्तन  जिससे जंगल और जंगल के राजा बाघ को नुकसान पहुंचेगा और हमारी व्यवस्था और आदिवासियों के मध्य  दूरियां भी!

अरुणेश सी दवे*  (लेखक छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में रहते है, पेशे से प्लाईवुड व्यवसायी है, प्लाई वुड टेक्नालोजी में इंडियन रिसर्च इंस्टीट्यूट से डिप्लोमा।वन्य् जीवों व जंगलों से लगाव है, स्वतंत्रता सेनानी परिवार से ताल्लुक, मूलत: गाँधी और जिन्ना की सरजमीं से संबध रखते हैं। सामाजिक सरोकार के प्रति सजगता,  इनसे aruneshd3@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।) 

8 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत सुन्‍दर आलेख, दवे जी को धन्‍यवाद.

कृष्ण मिश्र said...

बनधु ये वही आदिवासी है जिन्हे आर्य इतिहास में बन्दर, गीध, रीछ आदि न जाने कह कर पुकारा गया, आर्यों से लेकर मुसलमानों, अंग्रेजों और आज की सरकारों ने इनके घरों यानी जंगलों का दोहन किया और इनका इस्तेमाल गुलामों की तरह किया, यहाँ तक प्रत्येक कथित सभ्य व्यक्ति ने चाहे वह सरकारों काअ नुमाइन्दा हो, या फ़िर जनसाधारण सभी ने इनका शोषण किया वह भी इस स्तर पर कि इनकी बहू-बेटियों की इज्जत पर अपनी मैली भावनाओं के हमले कर! हद तो तब हुई जब कार्पोरेट जगत ने सरकारों की निगहबानी में इनके घरों(वनों) से कीमती चीजे खोद-खोद कर पूरी दुनिया में बेच दी, और इन सब कामों में जंगल उजड़े या वन्य जीव बेघर हुए इसका कोई मतलब नही, बावजूद इसके की सरंक्षण की सभी नीतियां यही लोग बनाते हैं, यानी मेहरबान ही शैतान है! मजे कि बात यह कि हमारा संविधान कहता है कि इन आदिवासियों को वह सब सुविधाओं में प्राथमिकता दी जाय जो सरकारों द्वारा शुरू की जाती है, अब आप ही बताये इन आजी के ६० सालों में हमारी इन्तजामिया से कितने आदिवासी लभान्वित हुए, या कितने सिविल सेवाओं में चुने गये.....ये सिर्फ़ मजाक है, क्यों कि वह समाज की मेन स्ट्रीम में कभी लाये ही नही गये। कभी वन-ग्रामों में रहने के कारण उन्हे मताधिकार से वंछित रखा गया तो कभी उन्हे वनों की सुरक्षा के नाम पर बेदखल...अब ये संगठित हो खड़े हो गये तो इन्हे मिटाने की बात हो रही है, अपने ही लोगो को मिटाने कि जो एतिहासिक दृष्टि से खालिश भारतीय है, बजाय अन्य मिश्रित कौमॊम के जिनमे, तुर्कों, अफ़गानों, और न जाने कितने चंगेजखानों का खून दौड़ रहा है। और यही वर्ग सत्ता में या सत्त के दायरे में है, इतनी बाते तो अमेरिका ने भी नही कही जब उसके यहा वर्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला हुआ, उसने तब भी कहा हम उन्हे लोकतन्त्र के दायरे में खींच कर लायेंगे। यदि हमने इन सम्स्याओं को जल्द ही समझदारी से दूर नही किया तो न तो वन्य जीव बच पायेंगे और न ही जंगल..सिर्फ़ बारूद और हथियारों की खेती बचेगी। सौहार्द और समस्या की बुनियाद में निराकरण निकाले जाय तभी कुछ सभव होगा

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुंदर, समझ विकसित करने वाला उपयोगी आलेख!

naveen singh said...

its a very very real write up!!!!! because in it those things are given wich we just dont see..or pretend that they r not visible!!!!!whole govt is after those jungle pplz...(so called..naxalite)but whole system supports those corrupt leaders n beaurocrats!!!!!

mayank bajpai said...

बात अगर जंगल को बचाने की कर रहे है तो सब ठीक है !लेकिन इस बहाने से अगर आप किसी गंभीर मुद्दे पर कोई टिप्पड़ी कर रहे है खासकर नक्सलवाद पर तो मुझे आपको रोकना पड़ेगा एक बार !!लेखक छत्तीसगढ़ के रहने वाले है तो हम भी उत्तर प्रदेश के एकमात्र नैशनल पार्क दुधवा के इलाके से है और ऐसी जगह से है जहाँ अनुसूचित जनजाति के ढेरों लोग आबाद है !सवाल ये है की जंगल है किसका !वन विभाग का !लकड़ी के ठेकेदारों का !वन माफियाओं का !बौधिक जुगाली करने वाले पत्रकारों का या कथित वन्य जंतु प्रेमियों का !दरअसल जंगल आज उन सबका है जिनका इससे सरोकार नहीं है !जंगल बस उनका नहीं है जिन्होंने इसे जवान किया है !जी हाँ मै आदिवासियों की बात कर रहा हू! आप जंगल पर उनका हक रहने देना कहाँ चाहते हो !!!याद करिए हालत पलिया ब्लोक के उन गावों की जो जंगल के रस्ते से जाते है !वहा रात को अगर किसी औरत को बच्चा पैदा करना हो तो उसके सामने एक ही रास्ता है की वह अपने घर में कल के चिराग को जन्म दे !ईमानदारी से सोचिये !!जंगल पे उनका कोई हक नहीं ....!
चलते चलते कहुगा
##जो धरती को कटे बोये ...वो धरती का राजा होए !
जो हल चलाये उसकी जमी हो ..ये फैसला हो आज और अभी हो ....!

Dehaatkibaat said...

nice

अफ़लातून said...

संतुलित आलेख । ’इंसान की उपेक्षा से वन्य-जीव बचेगा ’ वाली नासमझी से ग्रस्त नहीं हैं दवेजी इसलिए हकीकत के करीब पहुंच सके हैं ।

NANI said...

Very nice article..

Post a Comment

आप के विचार!

विविधा

आओ प्यारे कम्प्युटर पर बाघ बचायें!
अरूणेश सी दवे, जहाँ तक रही बात प्रबुद्ध बाघ प्रेमियों की जो नचनियों की तरह सज-धज कर जंगल कम इन्टरनेट पर ज्यादा अवतरित होते हैं, तो उनके लिये मै इंटरनेट मे वर्चुअल अबुझमाड़ बनाने का प्रयास कर रहा हूं । ताकि वो अपनी कोरी कल्पनाओं और वर्चुअल प्रयासों को इस आभासी दुनिया में जाहिर कर अपनी ई-कीर्ति बढ़ा सकें।

सामुदायिक पक्षी सरंक्षण
पक्षियों के संरक्षण का जीवन्त उदाहरण: ग्राम सरेली कृष्ण कुमार मिश्र, लखीमपुर खीरी* उन्नीसवी सदी की शुरूवात में ब्रिटिश हुकूमत के एक अफ़सर को लहूलुहान कर देने से यह गाँव चर्चा में आया मसला था।
तो फ़िर उनसे सीखा हमने योग!
धीरज वशिष्ठ* 84 लाख प्रजातियां और 84 लाख योगासन: पक्षियों-जानवरों से सीखा हमने आसन: धार्मिक चैनलों और बाबा रामदेव के कार्यक्रमों ने आज योग को घर-घर तक पहुंचा दिया है।
नही रहा सुमित!
दुधवा लाइव डेस्क* हाँ हम बात कर रहे है उस हाथी कि जो दो मई २०१० को लखनऊ चिड़ियाघर से दुधवा नेशनल पार्क भेजा गया था! वजह साफ़ थी, कि अब वह बूढ़ा हो गया था

पर्यावरण

क्या वे राज धर्म से वाकिफ़ हैं!
कृष्ण कुमार मिश्र* भारत के कुछ पूर्व नेताओं ने मिसाले कायम की पर्यावरण व वन्य-जीव संरक्षण में

अबूझमाड़ के जंगल- जहाँ बाघ नही नक्सल राज करते हैं!
अरूणेश सी दवे* अबूझमाड़- एक प्राकृतिक स्वर्ग:

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Featured Post

क्षमा करो गौरैया...

Image Courtesy: Sue Van Coppenhagen  संस्मरण गौरैया और मैं -- (3) ....डा0 शशि प्रभा बाजपेयी बात उस समय की है जब घर के नाम पर ...

वन्य-जीव

भारत की वन-नीति में बदलाव आवश्यक
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* आजादी के बाद बनी भारतीय वन-नीति की समीक्षा वर्ष 1988 में की गई थी।

घायल तेन्दुए को जंगल में छोड़ा गया
दुधवा लाइव डेस्क* अधूरे इलाज के बाद जंगल में छोड़ा गया घायल तेन्दुआ!