International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Mar 12, 2010

तराई में आन्दोलन की शक्ल अख्तियार कर रहा है, विश्व गौरैया दिवस

गौरैया, फ़ोटो साभार: सतपाल सिंह
 कृष्ण कुमार मिश्र* भारत प्रकृति के प्रति जितना अनुग्रहीत रहा, उतना शायद ही विश्व में कही कोई
सभ्यता प्रकृति के प्रति कृतज्ञ रही हो, आर्य सभ्यता हो या द्रविड़ या फ़िर हमारे देश के जंगलों में पल्लवित हुई मातृ प्रधान सभ्यतायें सभी ने वृक्षों, पशु-पक्षियों और धरती के प्रति सम्मान, और प्रेम के मान स्थापित किए, पर आज हम चीजों के वैज्ञानिक महत्व समझने के बावजूद प्रकृति के विभिन्न हिस्सों के प्रति उदासीन हैं, और अपनी पारंपरिक वृत्ति को भी भूल चुके है, जिनमें, पशु-पक्षियों का हमारे सामाजिक सरोकारों में महत्व-पूर्ण स्थान हुआ करता था। कोई यज्ञ या  जन्म से लेकर मृत्यु तक के अनुष्ठान तब तक पूरे नही होते, जब तक हम इन जीवों को आवाहित कर इन्हे भोजन न कराते,   हम पृथ्वी, गाय और अन्तरिक्ष की शान्ति के श्लोक भी पढते! किन्तु बदलती जीवन शैली ने हमारी प्राचीन सुन्दर वृत्तियों को तो नष्ट ही कर दिया, और विज्ञान बोध भी डिग्रियां हासिल करने की जुगत तक ही रहा!
दुनिया बदली तो प्रकृति के स्वरूप को भी बदल डाला या यूँ कहें की गदला कर डाला, फ़लस्वरूप सरंक्षण वादियों की एक खेप उत्पन्न हो गयी, किन्तु नतीजा सिफ़ड़ ही है अब तक, यदि सामुदायिक सरंक्षण के सफ़ल उदाहरणों को छोड़ दिया जाय तो सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों द्वारा किए गये तमाम भागीरथी प्रयास विफ़ल ही रहे हैं, वसुन्धरा के अंग-प्रत्यंगों की रक्षा में। इन्ही सरंक्षण वादियों ने एक और दिवस का अविष्कार किया है, जिसे २० मार्च २०१० को "विश्व गौरैया दिवस" के रूप में मनाया जाना हैं,  निबन्ध प्रतियोगितायें, भाषण-बाज़ी, पोस्टर-लोगो और तस्वीरों का प्रदर्शन आदि-आदि..............किन्तु अब शायद ये दिवस मात्र एक औपचारिकता नही रहेगा, क्योंकि खीरी जनपद के लोगों ने इसे एक आंदोलन का रूप देने की तैयारी की, ताकि सदियों से हमारे साथ रहती आई यह प्रजाति(गौरैया) का सरंक्षण व संवर्धन हो सके। इसी प्रयास में पूरे जनपद में  जगह-जगह गौरैया के महत्व और गौरैया से हमारे सदियों पुराने रिस्तों का जिक्र किया जाएगा, और इसे एक बार फ़िर साहित्य, धर्म और विज्ञान के पटल पर सुसज्जित करने की कोशिश!
दुधवा लाइव पर प्रकाशित गौरैया दिवस के संबध में हिन्दुस्तान अखबार में रवीश कुमार नें जब इस सुन्दर पक्षी की उन यादों कों उकेरा जो वक्त की भागम-भाग में कही धूमिल हो चुकी थी, और यही कारण बना उन तमाम लोगों के अन्तर्मन की सोई हुई उन यादों का, जिन्हे उन्होंने अपने बचपन में जिया था, गौरैया के साथ, कभी इसे दाना चुगा कर तो कभी रंगों में रंग कर। आज वे सब इस पक्षी को अपने घरों में फ़िर से वापस देखना चाह्ते हैं, अपने बचपन की तरह और शायद अपने बच्चों को वह विरासत भी देना चाहते है, जो कही खो गयी थी या खोती जा रही है, यानी इस चिड़िया का हमारे घरों में आना-जाना, बसना, घोसला बनाना और हमारी दीवारों पर टंगें आईने में अपनी ही शक्ल देखकर चोंचे लड़ाना!
दुधवा लाइव की इस पहल में खीरी जनपद के सामाजिक कार्यकर्ता रामेन्द्र जनवार ने गौरैया सरंक्षण के लिए एक आंदोलन की रूपरेखा तैयार कर ली है,  प्रसिद्ध कथाकार डा० देवेन्द्र जिन्होंने न जाने कितनी बार गौरैया का जिक्र अपनी रचनाओं में किया है, अब इस खूबसूरत चिड़िया के वजूद की लड़ाई लड़ने की तैयारी में हैं, तो महिला संगठन सौजन्या की प्रमुख डा० उमा कटियार अपनी लिखी हुई रचनाओं का जिक्र करती हैं, और गौरैया को दोबारा अपने घरों का एक महत्व-पूर्ण हिस्सा बनाने के लिए महिलाओं की भागीदारी सुनश्चित कर ली है। कुल मुलाकर अब पक्षी सरंक्षण विज्ञान की डिग्रिया हासिल किए हुए उन लोगों की गिरफ़्त से बाहर निकलता प्रतीत हो रहा है, जो बड़े उपकरणों के साथ सिर्फ़ डाक्यूमेन्टेशन, फ़ोटोग्राफ़ी व बर्ड वाचिंग जैसे खेल आयोजित करते है, जिनमे सिर्फ़ इन्हे मनोरंजन प्राप्त होता है, और पक्षी विद का रुतबा ,पर पक्षियों का कुछ भी भला नही होता!
दुधवा लाइव के माध्यम से समाज  के सभी वर्गों को यह आमंत्रण हैं, कि वह २० मार्च को गौरैया दिवस में अपनी सहभागिता अवश्य दर्ज करायें, और इस दिवस को अन्य तमाम दिवसों की तरह न मनाकर एक शपथ व संकल्प दिवस के रूप में मनाये, ताकि हम जीवन भर इस संकल्प के साथ जीवों के सरंक्षण में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करते रहें।
शायद ये मुहिम वन्य जीवों की सुरक्षा को असलियत में प्रभावी बना सके ,और यह पुनीत कार्य, वन्य-जीव सरंक्षण विधा के खिलाड़ियों के चंगुल से निकलकर समाज की मुख्य धारा में आ सके, क्योंकि बिना जन-मानस की सहभागिता के कोई भी कार्य संभव नही हैं, चाहे वह आज़ादी का संघर्ष हो, या हरित क्रान्ति या फ़िर धरती को बचाने की मुहिम ...................

कृष्ण कुमार मिश्र ( लेखक वन्य-जीवन के अध्ययन व सरंक्षण में प्रयासरत हैं, लखीमपुर खीरी में रहते हैं, इनसे dudhwajungles@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

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