डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 20, 2010

दिल्ली बर्ड ग्रुप के सदस्यों ने किया हिन्दी पर भयानक हमला!

Photo by: Krishna Kumar Mishra
दिल्ली बर्ड ग्रुप के कुछ सदस्यों ने हिन्दी पर हमला बोला: ज्ञान पर किसी भाषा विशेष का अधिकार नही होता, बशर्ते हम अपनी भाषा में बेहतर चीजें लिखे और इसी का उदाहरण है दुधवा लाइव, इस आनलाइन हिन्दी पत्रिका का मकसद ही है कि अपने लोगों को अपनी भाषा में वन्य-जीवन की जानकारी उपलब्ध करायें ताकि सरंक्षण में मदद मिल सके। हमने वही किया साथ ही दुनिया की अन्य भाषाओं से ज्ञानवर्धक सामग्री का अनुवाद कर हिन्दी में प्रकाशित किया, भाषा यहां मुद्दा नही है, मुद्दा है, अपनी बात को अपनी भाषा में अपने लोगों तक पहुंचाने का, और हां यदि कोई जिज्ञासु हमारी बात को सुनना और जानना चाहता हैं तो वह हमारे सन्दर्भों को अपनी भाषा में अनुवादित कर सकता हैं, जैसा कि हम लोग हमेशा से करते आयें हैं!  हमने वह विषय चुना जिस पर किसी हिन्दी के बुर्जुआ तबके ने कभी कुछ लिखने-पढ़ने की कोशिश नही की, और अग्रेज़ी में इस विषय पर जबरदस्त काम हुआ, जैसा के इस भाषा में हमेशा होता आया है, किसी भी विषय की खिड़की खोल लीजिए "अग्रेजी के घर" में आप को अथाह भण्डार मिलेगा। लेकिन अंग्रेजी की इस संपन्नता में बहुत ही जन-बल ने काम किया और करता आ रहा है। यही कारण है कि वन और वन्य-जीवों पर भी इसी भाषा का एकाधिकार हो गया, लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि किसी और भाषा में उस विषय पर कार्य ही नही किया जाय। यहां मैं उपरोक्त सन्दर्भ में कुछ अपने हिन्दुस्तानी महानुभाओं और विदेशियों की मनोदशा का जिक्र करने जा रहा हूं।

हिन्दी पर हमला करने वाले विदेशी,
मैटियास नारलंड, स्वीडेन 
14, फ़रवरी, 2010
lappkrabben@gmail.com

इन्होंने कुछ स्वीडिश में लिखकर भेजा, फ़िर कहा कि आप इसे नही समझ सकते। मैं आप को अंग्रेजी मे लिखने की सलाह देता हूं, यदि आप को पक्षियों की चिन्ता है। हो सकता है आप ये न जानते हो कि दिल्ली बर्ड विदेशी सदस्य भी रखता है। और उन लोगों का क्या जो भारत में रहते हैं, किन्तु हिन्दी नही जानते, पर सदस्य है दिल्ली बर्ड ग्रुप के।
इन्ही का अनुशरण करते हुए हमारे हिन्दुस्तानी भाई ने एक पत्र भेजा।
अर्जुन ए०आर०
arjunrammohan@rediffmail.com
15, फ़रवरी 2010

आप ने लिखा, प्रिय मिश्र जी, यह खुशी की बात है, कि इंटरनेट पर पक्षियों से संबधित संसाधनों की गुणवत्ता मौजूद है, जैसे आप ने अपनी सामग्री भेजी, किन्तु यह अच्छा होगा कि आप इस बात का खयाल रखे कि इस ग्रुप के सभी सदस्य हिन्दी नही समझ सकते। उदाहरण के लिए यद्यपि मैं थोड़ी हिन्दी बोल सकता हूं, किन्तु पढ़ नही सकता। और यह ग्रुप विदेशी सदस्य भी रखता है, इस लिए ऐसा प्रतीत होता है कि यह जगह उस बात के लिए ठीक नही है जिसे सब समझ नह सकते।

इन्ही का अनुशरण करते हुए एक भारतीय महिला जिनका नाम एलिज़ाबेथ थॉमस है! ने पत्र लिखा:
एलिज़ाबेथ थॉमस
lizacherian@yahoo.com
16, फ़रवरी 2010
मैं सोचती हूँ, कि यह अनुचित होगा कि यह पत्रिका अग्रेंजी कि जगह किसी और भाषा में हो, यदि कोई हिन्दी स्पीकर हिन्दी में विचारों का आदान-प्रदान करना चाहता है, तो वह नया ग्रुप शुरू कर सकता है।
मैं एक भारतीय हूं, किन्तु मैं निश्चित रूप से यह वन्य-जीवन पर आधारित पत्रिका को नही पढना चाहती।


सबसे इतर मैं उनकी बात करता हूं, जिन्होंने हिन्दी में शुरू किए गये इस न्यूज़लेटर की सराहना की।

एथनो-आर्निथोलोजी याहू ग्रुप ने  प्रकृति से संबधित इस प्रयास की सराहना की। सबसे पहले ग्लोबल आउल प्रोजेक्ट के निदेशक डेविड एच० जॉनसन ने दुधवा लाइव पर प्रकाशित लेख "जहाँ होती है, पक्षियों की पूजा" लेख को महत्व देते हुए, तमाम लोगों को सूचित किया, जिसमें बॉब गॉसफ़ोर्ड का मेल मिला.......

उन्होंने कहा कि प्रोजेक्ट आउल के निदेशक डेविड एच० जॉनसन द्वारा संज्ञान में लाया गया लेख "जहाँ होती है, पक्षियों की पूजा" जिसे वाइल्ड लाइफ़ बायोलाजिस्ट एवं नेचर फ़ोटोग्राफ़र कृष्ण कुमार मिश्र ने लिखा, के अंग्रेजी अनुवाद में हम असफ़ल रहे। इसलिए मैं दोबारा सभी को सूचित कर रहा हूं कि यदि इस महत्व-पूर्ण लेख का अनुवाद हिन्दी से अंग्रेजी में किसी व्यक्ति द्वारा किया जा सके, यह यकीनन आकर्षक जानकारी है, जिसका अंग्रेजी में अनुवाद हो सके।
दूसरा पत्र:
बॉब गॉसफ़ोर्ड
bgosford@gmail.com
17,फ़रवरी 2010
प्रिय कृष्ण
क्या कोई तरीका है, जिससे इस शानदार सामग्री का अंग्रेजी अनुवाद किया जा सके, मैं एथिनो-आर्निथोलोज़ी रिसर्च व स्टडी ग्रुप चलाता हूं, यदि आप मुझे इसे छापने की इज़ाजत दें तो, मैं चाहूंगा कि आप के लेख को हिन्दी/अंग्रेजी में हम अपने सदस्यों के लिए अपनी बेवसाइट पर प्रदर्शित करे, कई भारतीय एथनो-आर्निथोलोज़िस्ट इस वर्ष मई में, विक्टोरिया, ब्रिटिश कोलंबिया, कनाडा में एथनो-बायलोजी के सत्र में हिस्सा लेगे, मुझे भारतीय पक्षी विज्ञान और वहाँ के लोगों की पक्षियों के प्रति लगाव को जानने समझने में काफ़ी रुचि है।

बॉब गॉसफ़ोर्ड
१९ फ़रवरी २०१०
मुझे सलाह दे, कि मैं आप के लेख को एथिनो-आर्निथोलोज़ी रिसर्च व स्टडी ग्रुप पर दोबारा प्रकाशित करना चाहता हूं,
मोहम्मद दिलावर
dilawarmohammed@gmail.com
18, फ़रवरी 2010
मैं आप की बेवसाइट पर गया और मुझे यह पंसद आयी, मैं बहुत ही प्रभावित हूं, आप के इस प्रयास से, जिसमे आप ने हिन्दी को प्रथम भाषा के रूप में इस्तेमाल किया है। वन्य-जीवन के क्षेत्र में यह प्रयास यकीनन लोगों में सरंक्षण का महत्व बतलाने में मददगार होगा।
मैं इस बात से और भी प्रभावित हूं कि  आप द्वारा चुने गये विषय उच्च गुणवत्ता को समाहित किये हुए हैं। हम अपनी बेवसाइट पर एक संक्षिप्त  लेख दुधवा लाइव पर लिखकर इसका लिंक देंगे, और इसे सभी पक्षी वैज्ञानिकों के समूहों को भेजेंगे।
यदि मैं आप की कोई मदद कर सकूं, तो कृपया अवश्य सूचित करे। यह मेरी खुशनसीबी होगी।

     यहाँ एक बात तो समझ में आती है कि विदेशी यदि कहे कि आप हिन्दी के बज़ाय अग्रेंजी में लिखे तब तो किसी हद तक ठीक है, लेकिन यहाँ यह भी सवाल खड़ा होता है, हम रूसियों, और जर्मन की तरह अपनी भाषा का इस्तेमाल क्यों न करे, जिसे पढ़ना हो वह इसका अनुवाद कर ले, जैसा कि हम सदियों से करते आये हैं। लेकिन अफ़सोस तब हुआ जब हिन्दुस्तानी ही मुझे इस बात की सलाह देने लगे कि हिन्दी में मत लिखो, और तुर्रा इस बात का कि वह हिन्दी में इस जानकारी को पढ़ना भी पसन्द नही करेगें, जबकि कुछ जागरूक विदेशी इस जानकारी को लेकर इतना उत्सुक हैं, कि इस पत्रिका के लेखों का अनुवाद करा रहें हैं।
खैर मैं दिल्ली बर्ड ग्रुप पर तब तक यह जानकारी भेजता रहूंगा, जब तक इस ग्रुप के माडरेटर जो कि भारतीय ही है, मना नही करते! क्योंकि मुझे अपनी बात अपनी भाषा में कहनी हैं और उसका दस्तावेज़ भी तैयार करना है। जिस किसी को आवश्यकता हो वह अनुवाद कर सकता है। यहाँ यह भी बता देना मैं जरूरी समझता हूं, कि मै कई वर्षों से दिल्ली बर्ड ग्रुप का सदस्य हूं, और अग्रेंजी में लिखता आया हूं, इसके अलावा अन्तर-राष्ट्रीय जर्नल्स में लेखन किया हैं, और मैं ही नही भारत के सभी वो लोग जो राष्ट्र-भाषा में लेखन कर रहे उनके अग्रेजी या अन्य विदेशी भाषाओं के ज्ञान पर दिल्ली बर्ड के सदस्यों द्वारा बिना सोचे समझे कोई मन-गढ़न्त खयाल पैदा कर लेना भी हास्यापद होगा, क्योंकि भारतीयों की आंग्ल विद्या के ज्ञान से विदेशी सदैव हतप्रभ रहे हैं।

कृष्ण कुमार मिश्र
krish_stork@hotmail.com
member delhibird group (yahoo)





5 comments:

राहुल said...

भाषा के नही ये लोग तो ज्ञान के दुश्मन लगते हैं

Anonymous said...

I think now recent wildlife material iS getting available only in English which common man can not understand.
so this PATRIKA IS ACTUALLY A GOOD INITIATIVE TAKEN by Mr. Mishra which will help common man to understand WILDLIFE ISSUES better.
I DONT WANT TO COMMENT ANYTHING ON WHETHER IT SHOULD BE POSTED ON DELHI BIRDS OR NOT BUT I KNOW THAT MANY DELHI BIRD MEMBERS CANT READ IT.
CONVERTING IT IN ENGLISH IS GOOD OPTION.

Krishna Kumar said...

well folks, its the content which matters most, not the language
and then we have translators.... any one volunteering already?

Did i hear some one saying that bird call needs translation??

Krishna Kumar

Kamlesh Adhiya. said...

I think message (knowledge) is important not the language.
http://www.girasiaticlion.blogspot.com/

Anonymous said...

कृष्ण कुमारजी, आपके इस प्रयास की जितनी भी तारीफ़ और सराहना की जाएगी वो कम ही होगी, रहा सवाल उन लोगो का जो आपको हिन्दी की जगह अंग्रेजी का इस्तेमाल करने का ज्ञान बाँट रहे है तो मै चाहता हूँ कि आप "जब वी मेट" मे करीना कपूर के तरह उनसे बड़ी विनम्रता से ये पूछे कि वो अपना ज्ञान फ्री मे बाँटते है या इसके लिए कुछ चार्ज करते है, और बिना जवाब का इंतज़ार किये उन्हें बता दे कि हमारे पास खुल्ले पैसे नहीं है.

सुबोध खंडेलवाल,indore.subodh@gmail.com

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