डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 05, May 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 14, 2010

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड

ग्रेट इंडियन बस्टर्ड: फ़ोटो साभार: डा० प्रमोद पाटिल
 कृष्ण कुमार मिश्र* अंग्रेजों से हमारे लोगों ने तमाम तरह की विद्यायें सीख लीं, पर उनका अमल में लाना नही सीख पायें। फ़िर चाहे शाखू के बनों का रिजनरेशन हो या  जंगलों के  संरक्षण का मसला (भले वे विदेशी इन्हे अपने आर्थिक फ़ायदे के लिए संरक्षित करते हों} जैसे इण्डोंलाजी, हिस्ट्री, .......ओर्निथोलोजी....जिसमें कुछ सीखने/करने से पहले उन महानुभावों को पढ़ा जाता है जिन्हों ने उस विषय पर कार्य किया हों, उसके उपरान्त अन्य कागजी कवायदें, फ़िर शोध आदि होकर पुस्तकालयों आदि में पहुंच जाता है, किन्तु अफ़सोस ये कि, जो शोध का आबजेक्ट होता है उसकी व्यथा-दशा में लेश-मात्र परिवर्तन नही होता है, कुछ को डिग्रियां मिलती है, कुछ को शोहरत और तमाम लोगों को अर्थ लाभ भी, पर वह जीव या वस्तु निरंतर क्षरित होती रहती है! क्या भारतीयों ने अपने पूर्व आकाओं से यही सीखा है! बिना नतीजों की कवायदें! ६० वर्षों में सिर्फ़ खालिश डाक्यूमेंटेशन !
इसकी ताज़ा उदाहरण हैं, वन्य-जीवों पर बनाये तमाम प्रोजेक्ट, जिन्होंने जानवरों की तो कोई तरक्की नही की आदमियों की जरूर हो गयी। बस्टर्ड एक उदाहरण मात्र है।........
एक खूबसूरत पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड  (Ardeotis nigriceps) जो कभी भारतीय उप-महाद्वीप में सामान्यत: उत्तर में मध्य पंजाब से लेकर दक्षिण में मध्य कर्नाटक तक, और पश्चिम में उड़ीसा से लेकर पूर्वी पाकिस्तान तक पाया जाता था। किन्तु कथित विकास व प्राकृतिक संसाधनों के बेतहाशा विनाश से इस पक्षी के आवास नष्ट हो गये, ज्यादातर जगहे कृषि-भूमि में तब्दील कर दी गयी और धान की खेती की वजह से सूखी जमीने, नम-भूमियों में परिवर्तित हो गयी, नतीजा बस्टर्ड अपना वजूद खोता गया, और अब यह भारत के कुछ ही प्रदेशों में बचा है, यहां भी उत्तर प्रदेश (?), हरियाणा, पंजाब, उड़ीसा और तमिलनाडु में इसे लगभग विलुप्त माना जा रहा है। राजस्थान के थार, आन्ध्रप्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश(?)में इसकी मौजूदगी है।


ये पक्षी सूखी व मरुभूमि के घास के मैंदानों में अपने आवास बनाते है, लम्बी टांगों व गर्दन वाले भूरे व सफ़ेद रंग का पक्षी आस्ट्रिच से मिलता-जुलता है, ये जमीन पर रहने वाला पक्षी है। मादा बस्टर्ड एक वर्ष में  प्राय: एक अण्डा देती है, इन्क्यूवेशन पीरियड लगभग २७-२८ दिनों का होता है, बच्चों को पालन मे नर पक्षी कोई सहयोग नही करते। बच्चे एक वर्ष तक माँ पर ही निर्भर रहते हैं।

बस्टर्ड के अंधाधुन्द शिकार, हैविटेट का खात्मा और मानव आबादी का निरंतर इनके आवासों में दखल ने इन्हे विलुप्ति के कगार पर पहुंचा दिया, नतीजतन सन 2009 ईस्वी में बर्ड-लाइफ़ इंटरनेशनल के द्वारा किये गये सर्वेक्षण व मूंल्याकन  में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को आई०यू०सी०एन०(IUCN) की लाल किताब यानी रेड-डाटा बुक में खतरे में पड़ी प्रजाति के अन्तर्गत शामिल गया है।
तमाम प्रोजेक्ट और सरंक्षण रननीतियों के बावजूद नतीजे निराशाजनक हैं। प्रकृति की इस कृति को बचाने में जब तक आम आदमी आगे नही आयेगा, तब तक किसी बेहतरी की उम्मीद करना मुश्किल होगा। सरकारों को भी इन चिड़ियों के आवासों यानी ग्रासलैंड के आस-पास सड़क या किसी अन्य तरह के विकास कार्य से बचना चाहिये। मानव बस्तियों और खेती के लिए इन मैंदानों का आंवटन न किया जाय और अतिक्रमण को हटाया जाय। नही तो सिर्फ़ अध्ययन या फ़ोटोग्राफ़ी और सेमिनारों में बड़ी-बड़ी योजनायें बनाना बेमानी होगा। क्योंकि अभी तक यानी आजादी के इन ६०-६२ वर्षों में जितने भी प्रोजेक्ट बने और लागू किये गये उनके परिणाम सिफ़ड़ ही है! फ़िर किस तरह का कन्जर्वेशन ये संस्थायें व सरकारे कर रही है, जो बे-नतीजां है?
वैसे कमोंवेश धरती पर हमारे सभी सहजीवियों का यही हाल है।

कृष्ण कुमार मिश्र  (लेखक: वन्य-जीवों के अध्ययन व  सरंक्षण के लिए  प्रयासरत है, जनपद खीरी में रहते हैं।)

3 comments:

सी आर मेनन said...

प्रोजेक्ट टाइगर के पहले बाघों का नम्बर ज्यादा था, अब कम हो गया।
रूल्स गवर्न्मेन्ट बनायें तो फ़ालो भी करे, लेकिन ऐसा नही होता।
सब कुछ हाच-पाच है

DR PRAMOD PATIL said...

though tiger has declined but it is clear that forest habitat got protection which was otherwise impossible to happen. so due to project Bustard grassland habitat will be protected and not only bustards but all other grassland fauna and flora will get last chance to flourish.
so their is immense NEED TO START PROJECT BUSTARD.

Aditya Roy said...

i had visited lala sanctuary in dec 2009. i was able to sight houbbara (Mcqueen's) bustard but was not able to see GIB. this year due to unexpectedly heavy rainfall there has been a sharp decline in the indian spiny tailed lizzards in that area. may be they have died due to heavy rain. they are the main food for GIB in that area. So according to local forest guard they have hardly sighted GIB after the decline i spiny tailed lizzards. it os possible that they have locally migrated to some other place where food is available.

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