International Journal of Environment & Agriculture
ISSN 2395 5791
"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

Apr 20, 2016

बरजत मारे जीव, तहां मर जाइये



पर्यावरण प्रेमी बिश्नोई समाज
                                                                                              
सन 1730 में खेजड़ली गावं में अमृता देवी पेड़ो कि रक्षा के लिए अपने 363 साथियों के साथ खेजड़ी पेड़ो से लिपट कर शहीद हो गयी थी. हाल ही में गुरु आज्ञा के मुताबिक ही 'बरजत मारे जीव, तहां मर जाइये' यानि यदि कोई व्यक्ति मना करने के उपरान्त भी जीव हत्या का कार्य करता है तो वहाँ जीवो कि रक्षा के लिए अपने प्राणो का भी उत्सर्ग करना पड़े तो कर देना चाहिए कि पालना करते हुए सालासर निवासी युवा शैतानसिंह विश्नोई ने हिरण शिकारियों से लोहा लेते हुए अपने प्राणो कि बली दे दी. इसी कड़ी में बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान पर इसी अंचल में चिंकारा के शिकार का केस कई सालो से कोर्ट में चल रहा है. कई और लोगो कि तरह मुझे भी इस केस कि गम्भीरता का अंदाज़ा नही था. मुझे लगता था जब इस संसार में हज़ारो पशु - पक्षियों कि हत्याएं हो रही है और करोडो कि संख्या में लोग माँसाहार का सेवन कर रहे है. ऐसे में एक हिरण का शिकार पर इतना बवाल क्यूँ? इन खबरों ने मुझमे बिश्नोई समाज कि मानसिकता को समझने और इन लोगो के जीवन को जानने  की उत्सुकता पैदा की.

मैंने जोधपुर पहुंचकर खेजड़ली गावं जाने का मन बनाया.यह गावं जोधपुर से करीब २० किलोमीटर दूर है. यहाँ ही अमृता देवी और 363 लोगो का शहीद स्मारक और जाम्भाजी का एक पुराना मंदिर है. इस मंदिर की देखभाल करने वाले स्वामी शंकरदास जी ने बिश्नोई समाज के बारे में जो जानकारी दी वो वाकई रोचक थी. मुझे अंधविश्वासों से दूर पर्यावरण प्रेमी यह समाज बहुत पसंद आया. यहाँ किसी की जन्मपत्री नही बनाई जाती. विवाह के लिए भी जन्मपत्रियां का मिलान या मुहरत नही निकाले जाते. किसी तरह की मूर्ति पूजा और आडम्बरो से दूर है यह लोग. हिन्दू होने के बावजूद यह समाज मरने पर व्यक्ति के शव को जलाने के बजाए घरो के खेतो में ही गाड़ देते है. उनका मानना है इस तरह लकड़ियों की बर्बादी नही करते और पांच तत्व का शरीर ज़मीन में गाड़ने से खाद बन जाता है. यहाँ पर भी इस समाज ने खुद को पंडित पुरोहितो और कई तरह के रीती रिवाजो से बचा लिया है.

बिश्नोई समाज एक ही गुरु संत जम्भेश्वर भगवान को मानने वाले लोग है. जाम्भाजी जन्मजात योगी थे. सिद्ध पुरुष थे. माता- पिता के देहांत के बाद घर तथा सम्पति का परित्याग  कर दिया और समराथल पर आ गए. यही रहते हुए ३४ वर्ष की आयु में बिश्नोई सम्प्रदाय की स्थापना की. आपने भक्तो को जो उपदेश दिए उन्हें ' सबदवाणी ' के रूप में जाना गया. जिसे इनके भक्त अत्यंत पवित्र ही नही, स्वतः प्रमाण और अंतिम प्रमाण भी मानते है. इसी सब्दवाणी को अक्षर अक्षर ग्रहण करने वाले बिश्नोई लोग अपने बच्चे के जन्म के 30 वें दिन हवन करके सबदवाणी सुना देते है उसके बाद वो बच्चा बिश्नोई बन जाता है और जाम्भाजी का अनुयायी भी. उन दिनों राजस्थान में भीषण आकाल पड़ते थे. ऐसी विकट परिस्थितिओं में जाम्भाजी ने राजस्थानवासिओं को पर्यावरण रक्षा और जीव रक्षा के संस्कार दिए. बिश्नोई समाज के उन्तीस सिद्धांतों में उक्त बातो को प्राथमिकता दी गयी.

एक बिश्नोई नौजवान ने बड़े विश्वास के साथ कहा की जाम्भाजी के 29 सूत्र मान लेने से सारा जीवन सुधर जाता है और हमे किसी तीर्थस्थल पर भटकने की जरुरत नही है. मुझे लगा की कितनी आसानी से इस युवक ने आध्यात्मिक शिक्षण का निचोड़ सुना दिया है. जहाँ इस बात को समझने में कई वर्ष लग जाते है की बाहरी आडम्बर और क्रिया कांडो से नही परन्तु आत्म विवेचन और आत्म अनुशासन से ही व्यक्ति अपने जीवन में आत्मज्ञान को उपलब्ध हो सकता है. यह ज्ञान यहाँ के लोगो को घुटी में मिला है. कई लोगो का मानना है 20+9 सूत्रों का पालन करने से इस समाज का नाम बिश्नोई पड़ा. यह नियम इस प्रकार है.

 1-तीस दिन तक सूतक रखना.
 2-पांच दिन रजस्वला स्त्री को ग्रह कार्यों से अलग रखना.
 3-प्रातः काल स्नान करना.
4- शील, संतोष व शुद्दि रखना.
 5- द्धिकाल संध्या करना.
 6- सायं को आरती करना.
 7- प्रात काल हवन करना.
8- पानी, दूध ईंधन को छान - बीन कर प्रयोग में लाना.
 9- वाणी सोच समझ कर शुद्ध बोले.
10-क्षमा <सहनशील> रखे.
11-दया < नम्रता> से रहें.
 12-चोरी नही करना.
13- निन्दा नही करना.
14- झूठ नही बोलना.
15- वाद- विवाद नही करना.
16- अमावस्या का व्रत रखना.
17- विष्णु का भजन करना.
18- जीवो पर दया करना.
19- हरे वृक्ष नही काटना.
20-काम, क्रोध, लोभ, मोह एवं अंहकार आदि अजरों को वश में करना.
21-अपने हाथ से रसोई बनाना.
22-घाट अमर रखना.
23-बैल को बधिया न करना.
24-अमल < अफीम > न खाना.
25-तम्बाकू खाना- पीना नही.
26-भांग नही खाना.
27-मधपान नही करना.
28- मांस नही खाना.
29-नीले वस्त्र नही पहनना.

उपरोक्त नियम वर्तमान में बिश्नोई समाज ने यह इसी क्रम में प्रचलित है और सर्वमान्य है.

गुरु जम्भेश्वर जी ने आध्यात्मिक विकास के लिए सामाजिक आधार तैयार किया जिसमे उस समय के जीवन के सभी उच्चतम मूल्यों को स्थापित किया गया. उन्होंने मानवता के विकास को परम माना. डॉ. किशना राम बिश्नोई जी की पुस्तक "गुरु जम्भेश्वर: विविध आयाम" के अनुसार गुरु जम्भेश्वर का समत्वभाव गीता के कर्मयोग के सिद्धांत पर आधारित है. जिसमे मनुष्य को निष्काम भाव से निरंतर कर्मशील बनने की प्रेरणा दी गयी है.

खेजड़ली गावं से 9 किलोमीटर दूर गुढ़ा बिश्नोई गावं है. यहाँ छोटी सी झील होने की वजह से यह हिरणो का मनपसंद स्थान है. हिरणो के झुंड यहाँ बिना डर के अठखेलियां करते और विचरते देखें जा सकते है. इन हिरणो की रक्षा करना यहाँ के निवासियों का प्रथम कर्तव्य है. बिश्नोई महिलाएं शिशु हिरणो को अपना दूध पिलाने में भी नही हिचकिचाती, यह मासूम जानवर इनके घरो में या बच्चो के पालनो में भी सो सकते है. आज के समय जब कभी कभी ही किसी पर्यावरण प्रेमी से मिलना होता है तो ऐसे में पूरे पर्यावरण प्रेमी समाज से साक्षात्कार होने का यह मौका मेरे लिए अदभुत था.

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इरा सिंह (लेखिका भारत की राजपूताना माटी से ताल्लुक रखती हैं, उदयपुर-राजस्थान में निवास, पर्यावरण, भारतीय योग व् आध्यात्मिक विषयों पर आधारित लेखन, महान दार्शनिक ओशो के  दर्शन से प्रभावित एवं उनके विचारों के सार तत्व को अपने लेखन के जरिए जग-जाहिर कर रही हैं, इनसे irahere1@yahoo.co.in पर संपर्क कर सकते हैं.) 





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