डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 06, June 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Mar 20, 2012

..उनके घरौंदे ही खतरे में हैं !

खतरे में हैं गौरेया की मौसी बया
- घटता जा रहा है सबसे सुंदर घोसला बनाने वाला पक्षी
- प्रणयकाल में हर बार नया घोसला बनाती है बया
- रोशनी के लिए घोसले में चिपकाते हैं जुगनूं


हरिओम त्रिवेदी
पुवायां। सबसे सुंदर घोसला बनाने वाली और गौरेया की मौसी के नाम से मशहूर बया का अस्तित्व संकट में है। शिकार, पेड़ और झाडिय़ां घटने के अलावा अन्य कारणों से यह पक्षी अब घटता ही जा रहा है। गांवों के आसपास झुरमुट में लगे दिखने वाले घोसले भी अब कम ही दिखाई देते हैं।
बया अनोखा तूंबीनुमा घोसला बनाने के लिए विख्यात है।   घोसला लौकीनुमा हवा में लटकता होता है। यह पुआल और मोटे पत्तों वाली घास के असंख्य तिनकों से खपच्चियां चीर कर बनाया जाता है। डेढ़ से दो फुट तब लंबे घोसले में जाने के लिए एक लंबी नली सी होती है जिसमें केवल बया ही प्रवेश कर सकती है। ऐसा अंडों और बच्चों की सुरक्षा को ध्यान में रखकर किया जाता है। घोसले में गीली मिट्टी से पलास्तर भी किया जाता है। बया गीली मिट्टी में जुगनू चिपका देती है। यह रात में चमकते हैं जिससे घोसले में रोशनी होती रहती है। आधुनिक विश्वकर्मा के नाम से मशहूर यह पक्षी अपने आशियाने को एक बार ही उपयोग करता है। बया अपने घोसले में दूसरी मादाओं को भी अंडे देने और सेने के लिए आमंत्रित करती है। यह खूबी दूसरे किसी पक्षी में नहीं है।



०००
अधूरे आसियानों का राज
बरसात की शुरूआत होते ही बया का प्रणयकाल शुरू हो जाता है। प्रजनन काल के अलावा नर और मादा में कोई खास फर्क देखने को नहीं मिलता है। दोनो मादा गौरेया जैसे दिखते हैं। इनकी चोंच मोटी और पूंछ छोटी होती है। यह गौरेया की तरह ही चिट-चिट जैसे बोलते हैं। प्रणय काल में भूरे रंग के इस पक्षी का रंग इस दौरान गहरा पीला और पंख चमकीले हो जाते हैं। प्रजनन काल में नर सुखद आवाज निकालता है जिससे मादा बया उसकी ओर आकर्षित हो सके। बया एक मौसम में कई मादाओं से जोड़े बनाता है। इसी दौरान आशियाना बनाने का सिलसिला शुरू होता है। इसकी जिम्मेदारी नर पक्षी की होती है। आधा घोसला बनने पर मादा उसकी निरीक्षण करती है और पसंद नहीं आने पर रहने से इंकार कर देती है। नर फिर से दूसरा घोसला बनाना शुरू कर देता है। यही कारण है कि तमाम घोसले अधूरे लटके देखे जा सकते हैं। बेहतरीन घोसला बनाने की कारीगरी के कारण इसे टेलर पक्षी भी कहा जाता है।



०००००
करने होगें प्रयास
गौरेया के साथ ही बया को भी बचाने के प्रयास करने की जरूरत है। इसके लिए सरकंडों, झाडिय़ों, पेड़ों की कटाई-छटाई, शिकार आदि पर रोंक लगानी होगी। नहीं तो यह खूबसूरत पक्षी विलुप्त होते देर नहीं लगेगी।

(हरिओम त्रिवेदी  अमर उजाला पुवायां शाहजहांपुर के तहसील प्रभारी हैं। निवास रायटोला खुटार जनपद शाहजहांपुर में निवास  इनसे मोबाइल नंबर . 09935986765 एवं ई.मेल hariomreporter1@gmail.com  के जरिए सम्पर्क कर सकते हैं)

2 comments:

kartut said...

hariom ji aap ne baya ke bare me chetaya hai....achcha hai goriya ke sath hi baya ko leker bhi abhiyan chalane jarurat ....vivek sainger

kartut said...

hariom ji aap ne baya ke bare me chetaya hai....achcha hai goriya ke sath hi baya ko leker bhi abhiyan chalane jarurat ....vivek sainger

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