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International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

Nov 1, 2016

हम ठहरे लक्ष्‍मीपति की छाती पर श्रीवत्‍सचिह्न देने वाले महर्षि भृगु की संतान

कृषि और कृष्‍ण की प्रकृति एक है...

तो राजलक्ष्‍मी को अगर सौ बार गरज है‍ कि अपने आने का संदेश उसे इन वधिरों तक, इन अंधों तक भी पहुँचाना है और वे अगर यह समझती हैं कि बिना इन तक संदेश पहुँचे उनके आने का कोई महत्‍व नहीं है, तो मैं कहता हूँ कि उन्‍हें उसी रूप में आना होगा, जो इनकी कल्‍पना में सरलता से उतर सके। ये डॉलर-क्षेत्र नहीं जानते, ये पौंड-पावना से सरोकार नहीं रखते, इन्‍हें मुद्रास्फीति का अर्थ नहीं मालूम, पर इतना समझते हैं कि कागदों का अंबार राजलक्ष्‍मी का शयन-कक्ष नहीं बना सकता। इनकी लक्ष्‍मी गेहूँ-जौ के नवांकुरों पर ओस के रूप में उतरती है, इनकी लक्ष्‍मी धान की बालियों के सुनहले झुमकों में झूमती है और इनकी लक्ष्‍मी गऊ के गोबर में लोट-पोट करती है उस लक्ष्‍मी के लिए वन-महोत्‍सव से अधिक कृषि-महोत्‍सव की आवश्‍कता है, कृषि महत्‍सव से अधिक कृषि-प्रयत्‍न की तथा कृषि-प्रोत्साहन की आवश्यकता है।
जब तक इन देहातियों की लक्ष्‍मी नहीं आती, तब तक हमको भी इस लक्ष्‍मी से कुछ लेना-देना नहीं है। हमारे ऊपर वैसे ही अकृपा बनी रहती हैं, हम ठहरे लक्ष्‍मीपति की छाती पर श्रीवत्‍सचिह्न देने वाले महर्षि भृगु की संतान, समुद्रपायी अगस्‍त्‍य के वंशज और लक्ष्‍मी के धरती के निवास बेल की डाली छिनगाने वाले परम शैव, हम लक्ष्‍मी की सपत्‍नी के सगे पुत्र, हमें उनसे दुलार की, पुचकार की आशा नहीं, आकांक्षा नहीं। पर विमाता होते हुए भी माता तो हैं ही वे, कौशल्‍या से कैकेयी का पद बड़ा हुआ, तो थोड़ी देर के लिए इनका पद भी सरस्‍वती से बड़ा मान ही लेता हूँ, सो भी आज के दिन तो इनका महत्‍व है ही, ये भले ही उस महत्‍व को न समझें। इसलिए मैं अपना कर्तव्‍य समझता हूँ कि मैं अपनी इस विमाता को चेताऊँ कि जिनके चरणों की वे दासी हैं, उनकी सबसे बड़ी मर्यादा है, निष्किंचनता। सुनिए उन्‍हीं के मुख से और लक्ष्‍मी को ही संबोधित करके कही गई इस मर्यादा को… "निष्किचना वयं शश्र्वन्निष्किंचनजनप्रिया तस्‍मात्‍प्रायेण न ह्याढ्या मां भजन्ति सुमध्‍यमे" (हम सदा से ही अकिंचन हैं और अकिंचन जन ही हमें प्रिय हैं, इसलिए धनी लोग प्राय: हमें नहीं भजते)।
निष्किंचन को चाहे आप 'हैव-नाट' कहिए चाहे खेतिहर किसान, परंतु कृषि और कृष्‍ण की प्रकृति एक है, प्रत्‍ययमात्र भिन्‍न है भगवान और कर्म से भारत के भगवान कृषिमय हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। इसलिए उनकी राजलक्ष्‍मी को उनका अनुगमन करना आवश्‍यक ही नहीं परमावश्‍यक है।
आज जो दिया टिमटिमा रहा है वह उसी लक्ष्‍मी की स्‍मृति में, उसी लक्ष्‍मी की प्रतीक्षा में और उसी लक्ष्‍मी की अतृप्‍य लालसा में। इस दिए की लहक में सरसों के वसंती परिधान की आभा है, कोल्‍हू की स्थिर चरमर ध्‍वनि की मंद लहरी है, कपास के फूलों की विहँस है, चिकनी मिट्टी की सोंधी उसाँस है,कुम्‍हार के चक्‍के का लुभावना विभ्रम है और कुम्‍हार के नन्‍हें-नन्‍हें शिशुओं की नन्‍हीं हथेलियों की गढ़न। इसमें मानव-श्रम का सौंदर्य है उसके शोषण की विरूपता नहीं। इसी में घट-घट व्‍यापी परब्रह्म की पराज्‍योति है, तथा स्‍वार्थ और परमार्थ की स्‍व और पर की, पार्थिव और अपार्थिव की, ताप और शीत की, नश्‍वर और अनश्‍वर की, नाश और अमरता की मिलन-भूमि एवं उनकी परम अद्वैत-सिद्धि है। भारतीय दर्शन जीवन का आभरण नहीं है, वह तो उसका प्राण है, आदि-स्रोत है और है अनंत महासागर, मानो इसी सत्‍य को जगाने के लिए ही दिया टिमटिमा रहा है।

(विद्यानिवास मिश्र के निबन्ध संग्रह से साभार- जहां दीया टिमटिमा रहा है का एक अंश)

दीपोत्सव की तमाम शुभकामनाएं
दुधवा लाइव डेस्क।

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