डायचे वेले जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

International Journal of Environment & Agriculture, Vol.7, no 04, April 2017, ISSN 2395-5791

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 2, 2016

गंगा मैली है और वो महज़ व्यापार कर रहे हैं...

Image Courtesy-  http://www.gangaaction.org/


ये तो गंगा के व्यापारी निकले 

उन्होने कहा - ''मैं आया नहीं हूं, मां गंगा ने बुलाया है।'' लोगों ने समझा कि वह गंगा की सेवा करेंगे। बनारसी बाबू लोगों ने उन्हे बनारस का घाट दे दिया; शेष ने देश का राज-पाट दे दिया। उन्होने ’नमामि गंगे’ कहा; जल मंत्रालय के साथ ’गंगा पुनर्जीवन’ शब्द जोङा; एक गेरुआ वस्त्र धारिणी को गंगा की मंत्री बनाया। पांच साल के लिए 20 हजार करोङ रुपये का बजट तय किया। अनिवासी भारतीयों से आह्वान किया। नमामि गंगे कोष बनाया। राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन की स्थापना की। राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया। बनारस के अस्सी घाट पर उन्होने स्वयं श्रमदान किया। गंगा ने समझा कि यह उसके प्रति भारतीय संस्कृति की पोषक पार्टी के प्रतिनिधि और देश के प्रधानमंत्री की आस्था है। वह अभिभूत हो गई कि चलो अब उसके भी अच्छे दिन आयेंगे; उसके भी गले में लगे फांसी के फंदे हटेंगे; उसे उसका नैसर्गिक प्रवाह हासिल होगा; खुलकर बहने की आज़ादी मिलेगी; मल से मलीन होने से जान छूटेगी। 

पहला झटका: नदी विकास

जल मंत्रालय के साथ ’नदी विकास’ शब्द भी जोङा गया। नदी विशेषज्ञों को पहला झटका लगा। भला कहीं कोई नदी का भी विकास कर सकता है ? किंतु मां गंगा ने इसे भी एक संतान का अति उत्साह ही माना। लेकिन शीघ्र ही इस नदी विकास की पोल खुलने लगी। ’जल मंथन’ और ’गंगा मंथन’ कार्यक्रमों में नदी जोङ परियोजना को तेज करने और इस पर राज्यों की सहमति बनाने की कोशिश ज्यादा हुई, गंगा की अविरलता-निर्मलता पर कम। गंगा अफसोस करने लगी। उसे अब समझ में आया कि नदी विकास का मतलब, तथाकथित विकास के लिए नदी का ह्यस होता है। जिसे गंगा सेवक समझा था, वह तो गंगा का व्यापारी निकला। एक बार फिर छले जाने से मां गंगा दुखी है। 

घटना चक्र देखिए: पिछले डेढ़ दशक के सक्रिय गंगा आंदोलनों, सामने आये अध्ययनों और जांच समितियों की  समितियों की रिपोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अविरलता सुनिश्चित किए बगैर गंगा की निर्मलता सुनिश्चित करना संभव नहीं है। इसी बिना पर मैने यह बात बार-बार दोहराई है कि गंगा निर्मलता को धन से ज्यादा धुन की जरूरत है; अविरलता सुनिश्चित करने की धुन। किंतु क्या 'नमामि गंगे' के कर्णधारों ने यह धुन सुनी। नही, उन्होने गंगा के नाम पर बजट बढ़ाने और व्यवसाय बनाने की चिंता की। 

दूसरा झटका: दिखावटी काम, बेबस गंगा मंत्री 

उन्होने गंगा मंत्री उमा भारती जी को शोध, अध्ययन, जन-जागरूकता, गंगा किनारे औषधि विकास, गंगा ग्राम विकास, ई निगरानी विकास, घाट विकास, मल शोधन संयंत्र विकास, गंगा कार्यबल विकास और गंगा किनारे के गांवों में शौचालय विकास का झुनझुना थमा दिया। बजाती रहिए; लोगों को भरमाती रहिए। 'नमामि गंगे के पीछे छिपे असल व्यापारिक एजेण्डे की पूर्ति के लिए  परिवहन, पर्यावरण और ऊर्जा मंत्रियों को लगा दिया। गंगा की मूल धाराओं पर बांध परियोजनाओं को लेकर उमा भारती जी ने पर्यावरण मंत्री को एक चिट्ठी भेजकर रस्म अदायगी भी कर दी कि देखो मैने तो अपना विरोध दर्ज करा दिया था। अब वे नहीं सुनते, तो मैं क्या करूं ? 

कभी वह कहती हैं कि गंगा के लिए कानून बनाने के लिए राज्यों से बात करंेगी। कभी कहती हैं कि सुनिश्चित करेंगी कि अवजल चाहे शोधित हो, चाहे अशोधित वह नदियों में नहीं जाये। किंतु उनकी बात बयानों से आगे बढ़ नहीं रही। उमा भारती जी की बेबसी देखिए कि उनके मंत्रालय के ’राष्ट्रीय भूजल प्रबंधन बेहतरी कार्यक्रम’ का प्रारूप भी विश्व बैंक बना रहा है। शायद यह बेबसी ही है, जो उनके दिल पर बैठ गई है। ईश्वर, उमाजी को स्वस्थ रखे।

तीसरा झटका: अविरलता पर चुप्पी

गौर कीजिए कि उत्तराखण्ड में गंगा की अविरलता बाधित करने के लिए एक नहीं, 60 परियोजनायें हैं। याद कीजिए, मनमोहन सरकार में उत्तराखण्ड में बांधों को लेकर कितनी तकरार हुई थी; कितने अनशन, कितने आंदोलन। स्वयं केन्द्र की पहल पर गठित रवि चोपङा कमेटी रिपोर्ट ने यह माना भी था कि 2013 में हुई उत्तराखण्ड त्रासदी और उसके दुष्प्रभावों को बढ़ाने में जल विद्युत परियोजनाओं के तहत् बने बांधों और सुरंगों की नकारात्मक भूमिका थी। मोदी सरकार ने तय किया कि बांधों को लेकर चर्चा करना ही बंद कर दो। ’नमामि गंगे’ के बीते दो सालों में बांधो को लेकर चुप्पी ऐसी छाई जैसे चर्चा करने वालों को भी बता दिया गया कि वे भी चर्चा न करें। आखिर कोई तो वजह होगी कि बांधों को लेकर सक्रिय रही गंगा महासभा, उत्तराखण्ड नदी बचाओ, स्वामी सानंद, जलपुरुष राजेन्द्र सिंह, ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य... सभी ने चर्चा बंद कर दी है। खैर, आगे देखिए।

चौथा झटका: मंजूरी मंत्री में तब्दील हुए पर्यावरण मंत्री

पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवहन मंत्री को काम दिया कि पर्यावरण का चाहे जो हो, परियोजनाओं को पर्यावरण मंजूरी देने में देर न होने पाये। प्रकाश जावेङकर जी ने यही किया भी। जैसे वह पर्यावरण संरक्षण मंत्री ने होकर पर्यावरण मंजूरी मंत्री हों। 

गौर कीजिए पर्यावरण को नुकसान पहुंचाये बगैर विकास जारी रखने के लिए दुनिया के 170 देशों ने 1992 के रियो पृथ्वी सम्मेलन में एक औजार पेश किया था - ''

प्रत्येक  परियोजना के पर्यावरण प्रभाव का आकलन जरूरी हो।''भारत  ने भी इसे स्वीकारा। अब भारत सरकार का पर्यावरण, वन एवम् जलवायु परिवर्तन मंत्रालय वर्ष 2006 की पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना के दस्तावेज में बदलाव करने जा रहा है। मंत्रालय द्वारा हाल ही में जारी बदलाव के प्रारूप में पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना का उल्लंघन करने वाली परियोजनाओं को छूट दी जा रही है कि पर्यावरण अनुपूरक योजना के साथ काम जारी रख सकेंगी । सेंटर फाॅर पाॅलिसी रिसर्च की अध्ययनकर्ताओं ने इसे पर्यावरण प्रभाव आकलन अधिसूचना की हत्या करने की ओर उठा कदम करार दिया है।

पांचवां झटका: गंगा से ऊर्जा और पर्यटन 

भारत सरकार के बिजली मंत्री पीयूष गोयल ने हाल ही में कहा है कि जल विद्युत परियोजनाओं को गति देने के लिए वह जल ऊर्जा नीति लायेंगे। पर्यटन मंत्री डाॅ. महेश शर्मा जी बनारस में ई नौका पर्यटन का खेल सजायेंगे। 

बनारस के मछुआरों को इस खेल से नफा होगा कि नुकसान ? कभी जाकर किसी ने पूछा ?? 

छठा झटका: गंगा जलमार्ग परियोजना

परिवहन मंत्री नितीन गडकरी जी को गंगा से व्यापार का जिम्मा दिया गया है। वह गंगा जल मार्ग परियोजना ले आये। यहां भी विश्व बैंक ! हर सौ किलोमीटर पर एक बैराज की घोषणा कर डाली। जहाजों को चलाने के लिए 45 मीटर की चौड़ाई में गंगा को गहरी करने का भी दावा ठोक दिया। मामला अदालती हुआ, तो बैराज नहीं बनाने का हलफनामा दे दिया। 

सोचिए, 
क्या गंगा जलमार्ग परियोजना से गंगा को कुछ लाभ होगा ? 
क्या इससे गंगा अविरल या निर्मल होगी ??

नहीं, व्यापारियों को लाभ होगा। सउदी के लोग टापू बनाने के लिए भारतीय महासागर की रेत निकाल ले गये। ये जानते हैं कि गंगा की रेत अनोखी है; अनमोल! ये गंगा की बेशकीमती रेत बेचकर नोट बनायेेेंगे। जलपोत चलाकर बेरोक-टोक माल ले जायेंगे । उससे गंगा प्रदूषित होगी, तो हो। गहरीकरण करने से गंगा का पानी कम चैङाई में सिमटेगा। गंगा के पाट की चौड़ाई  घटेगी। जो ज़मीन सूखी बचेगी, ये ’रिवर फ्रंट डेवल्पमेंट’ के नाम पर उसे बेच देंगे। ऐसा करके ये पहले बिना सरकारी धन के नदी विकास करने को लेकर अपनी पीठ ठोकेंगे; फिर खरीददारों को मुनाफा कमावयेंगे। अमेरिका यूं ही गंगा विकास में  रुचि नहीं दिखा रहा है। साबरमती में यही हुआ है। 

गौर कीजिए कि भागलपुर के कहलगांव में गंगा के गहरीकरण का काम शुरु हो गया है। इस गहरीकरण ने मानव आहुति लेनी भी शुरु कर दी है। गहराई का अंदाजा न मिल पाने के कारण पिछले छह महीने में वहां के बरारी घाट पर 20 से अधिक मौते हुईं हैं। 
ऊपर गंगा बांध दी, नीचे लहरें बेचने जा रहे हैं। क्या गंगा बख्शेगी ? 
याद कीजिए, दक्षिणी चीन के हुआन में क्या हुआ ? एक बांध पानी नहीं रोक पाया। दो लाख बेघर हो गये। 

सातवां झटका: गंगाजल बिक्री को बढ़ावा

अमेज़न - आॅनलाइन खरीददारी की अग्रणी कंपनी है। वह 299 रुपये में एक लीटर गंगाजल बेच रही है। दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद जी ने डाक से घर-घर गंगाजल पहुंचाने की घोषणा कर दी है। उन्होने भी गंगाजल बेचकर कमाने वालों की राह आसान करने की योजना बना ली है। 

अब बताइये कि इस पूरे कार्यक्रम में  गंगा की अविरलता और निर्मलता कहां है ? यह तो नमामि गंगे की बजाय गंगा बिक्री का कार्यक्रम है। 

आठवां झटका : अमेरिकी संसद  में तालियों के निहितार्थ 

अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री के भाषण पर तालियों की गङगङाहट का निहितार्थ अब पता चला है कि अमेरिका अब गंगा स्वच्छता की योजना भी बनायेगा और पैसा भी लगायेगा। अब पता चला है कि उत्तर प्रदेश चुनाव के लिए एजेण्डा तय करने के लिए गंगा संगम पर हुई भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में ’नमामि गंगे’ को चुनावी लाभ की उपलब्धि को जनता तक ले जाना तो दूर, चर्चा करना भी क्यों मुनासिब नहीं समझा गया। अब समझ में आया कि उमा भारती जी ने प्रस्तावित उत्तर प्रदेश चुनाव के वर्ष के पश्चात् के वर्ष 2018 तक गंगा सफाई संबंधी बयान क्यों दिया। 

नौवां झटका : स्वच्छता यानी सिर्फ शौचालय 

अब समझ में आया कि स्वच्छता के नाम पर सबसे ज्यादा ज़ोर शौचालय पर ही क्यों हैं। भारत में शौचालय बनाने के काम को लेकर आयोजन विदेशों में क्येां हो रहे हैं; देश के भीतर दबाव बनाने के लिए अधिकारी नैतिक-अनैतिक सब तरीके क्यों अपना रहे हैं। आखिरकार गांव-गांव बंद कमरे के शौच से भी तो आगे बङा धंधा है भाई। टंकी, मोटर, सैनेटरी सामान, बिजली आपूर्ति, जलापूर्ति, पानी का बिल; सबसे बङा धंधा तो तब होगा, जब ग्रामीण शौचालय का मल संभालना मुश्किल हो जायेगा। घर-घर शौचालय के चलते भूजल प्रदूषित होगा। गांव-गांव तालाब और नदियां मल ढोने लगेंगी। उपाय के तौर पर पानी साफ करने वाली मशीने जायेंगीं। सीवेज पाइप पहुंचेंगी। मल शोधन संयंत्र लगाने जरूरी हो जायेंगे। पानी का बिल और सीवेज का चार्ज तो अपने आप पहुंच जायेंगे। 

दसवां झटका : वित्त मंत्री की अध्यक्षता में गंगा सफाई समिति

मेरे ख्याल से अब तक हमें यह भी समझ में आ जाना चाहिए कि गंगा सफाई और स्वच्छ भारत को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में समिति क्यों बनाई गई है; क्योंकि उनके लिए गगा व स्वच्छता पूर्णरूपेण एक वित्तीय एजेण्डा है, पर्यावरणीय नहीं। 

ग्यारवां झटका : सांस्कृतिक बोल, वित्तीय खेल

क्या न्यायसंगत बात है कि अपने यहां पर्यावरण विरोधी विकास माॅडल अपनाने और परिणामस्वरूप हर माह कोई न कोई तबाही झेलने वाला चीन अब महाराष्ट्र का सूखा निपटायेगा और भारत को प्रदूषण मुक्ति की तकनीक बतायेगा !! क्या यह पर्यावरण और प्राकृतिक संसाधनों के क्षेत्र में  अघोषित प्रत्यक्ष विदेशी निवेश नीति है ? गंगा मीटिंग में मोंटेक सिंह अहलुवालिया तो कहते ही रह गये '' सीवेज  इज ब्लैक गोल्ड, सीवेज इज ब्लैक गोल्ड''  ये तो  मल और गंगाजल के उनसे भी तेज व्यापारी निकले। बातें नमामि संस्कृति की और निगाहें एफ डी आई पर !!



अरुण तिवारी 
amethiarun@gmail.com

1 comments:

Samir Kumar Sinha said...

Well written

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