वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Nov 3, 2019

कुमायूँ का एबट माउंट जहां भूत-प्रेतों की कहानियां फ़िज़ाओं में हिलोरे मारती है!

जॉन हेरॉल्ड एबट का बनवाया हुआ चर्च

चंपावत के एबट माउंट का परालौकिक रहस्य
भुतहा बंग्ला और डरावने चर्च की कहानियां..!
डाक्टर डेथ यानि डाक्टर मोरिस के खतरनाक प्रयोगों की दास्तां।

हिमालय की तराई से चलकर जब आप टनकपुर से शिवालिक पहाड़ियों पर चढ़ना शुरू ए करेंगे तो चंपावत से कुछ दूरी पर एक कस्बा है जिसे लोहाघाट कहते हैं और यहीं से एक सीधी चढ़ाई एबट माउंट की तरफ जाती है, पतली व टूटी हुई मेटल्ड रॉड, जिसके चारों तरफ बांज के पेड़ है, उन नम पेड़ों की डालियों पर रोएंदार हरी मास ग्रास उगी दिखेगी, जैसे ही आप एबट माउंट पर पहुंचेंगे मेटल्ड रोड खत्म हो जाती है और शुरू हो जाती हैं गड्ढे युक्त पगडंडिया उन्ही से गुजरते हुए आप भुतहा चर्च और ईसाई कब्रिस्तान से होते हुए, एम सी डेविड की कोठी तक पहुंचेंगे जो मोनाल रिजॉर्ट के नाम से संचालित हैं, इसी कोठी से टूटा हुआ गलियारा देवदारु से घिरे डाक्टर मोरिस के बंग्ले की तरफ जाता है, हजारों एकड़ में फैले घास के मैदान, बांज, बुरांस, चिनार और देवदारु के वृक्षों के मध्य यह बंगलो स्थित है, योरोपियन शैली में बने इस बंगले में ही वह कुख्यात अस्पताल चलता था जिसे डाक्टर मोरिस ने खोला, कहते हैं, की मौत के डाक्टर के नाम से कुख्यात मोरिस सबसे पहले मुक्ति कोठी में अस्पताल चलाता था, फिर मरीजों की तादाद बढ़ने पर उसने जॉन एबट से वह बंगला 1940 के आस-पास 36 हजार रुपए में खरीदा, और उस बड़े बंगले में शुरू किए अपने प्रयोग जो मौत और ज़िंदगी के बीच की उस पतली लकीर को खोजने के लिए थे कि आदमी की मौत के वक्त उसके दिमाग की स्थित क्या होती है, स्थानीय लोगों का कहना है कि मुक्ति कोठी में उसने बहुत से मरीजों पर यह प्रयोग किए वहां के पड़ोस की जमीनों में अभी भी खुदाई करने पर नर कंकाल निकलते हैं, हालांकि एबट के बंग्ले की खूबसूरती और वह बरतानिया अस्पताल अद्भुत सुंदरता लिए हुए है आज भी, जहां बाद में मोरिस ने अपना अस्पताल बनाया।
एम सी डेविड की कोठी से झांकती हुई तस्वीर!

डाक्टर मोरिस का अस्पताल "एबी बंग्लो"

आख़िर कौन थे मिस्टर एबट

जॉन हेरॉल्ड एबट उन्नीसवीं सदी की शुरुवात में पिथौरागढ़ की इन सुंदर वादियों में आए, मुख्यतः वह यूनाइटेड प्रोविंसेज के झांसी के रहने वाले थे, झांसी में वह एक ख्यातिप्राप्त व्यापारी व पॉलिटिशियन थे, उनका पूरा नाम जॉन हेरॉल्ड अर्नाल्ड एबट था, इनका जन्म 10 जनवरी 1863 को स्कॉटलैंड के एडिनबर्ग में हुआ पिथौरागढ़ की इस पहाड़ी से उन्हें अपनी किस यात्रा के दौरान प्रेम हुआ होगा यह बताना तो मुश्किल है पर 1920 के आस पास उन्होंने यह जमीन खरीदकर यहां अपने सपनों की दुनिया बसाना शुरू ए कर दिया था, यह पहाड़ी चोटी देवदारु व बांज के वृक्षों से घिरी है, सर्दियों में यहां की जमीन बर्फ की मोटी चादर ओढ़ लेती है, इस चोटी से पंचाचूली, त्रिशूल पर्वत स्पष्ट नज़र आते है, कहते हैं एबट ने यहां 13 कोठियां बनवाई, और अपनी पत्नी की याद में सन 1942 में एक चर्च का भी निर्माण कराया, जो अब बन्द है वहां कोई भी प्रार्थना करने नही आता, इसे अब भुतहा चर्च के नाम से जाना जाता है।

एबट ने एक विधवा से शादी की जिसके पांच बच्चे थे और उन बच्चों को अपना नाम दिया, उस लेडी का नाम था कैथरीन..कैथरीन डेवलिन रॉकफोर्ट, एबट ने कैथरीन को 29 अप्रैल 1908 में अपनी शरीक ए हयात बनाया, और उसी के बाद ये दोनों निकल पड़े, चम्पावत- पिथौरागढ़ की इस पहाड़ी पर अपने सपनों की दुनिया बसाने, जिसे दुनिया आज एबट माउंट के नाम से जानती है, एक हॉन्टेड टूरिस्ट डेस्टिनेशन...

एबट माउंट अपने बेटों के लिए छोटे विमानों को उड़ाने के लिए एक हवाई पट्टी बनाना चाहते थे एबट माउंट पर, पर किन्ही कारणों से वह नही बन पाई अब वह जगह प्ले ग्राउंड के नाम से जानी जाती है, एम सी डेविड की कोठी के केयर टेकर कल्याण सिंह की माने तो इस प्ले ग्राउंड के पास एक मंदिर निकला खुदाई में, उसके बाद वहां रह रहे अंग्रेजों के साथ अनहोनी होना शुरू हुई, किसी का बच्चा नही रहा तो किसी की पत्नी, और इस वजह से उस हवाई पट्टी का काम रोक दिया गया।

एबट माउंट से हिमालय का एक दृश्य

एबट की पत्नी कैथरीन की सन 1942 में मृत्यु हुई, तो एबट ने कैथरीन की याद में एक खूबसूरत चर्च बनाया, जो अब हॉन्टेड चर्च के तौर पर कुख्यात है, किन्तु एबट उसके बाद तीन वर्षों तक ही जीवित रहा, एबट की मृत्यु 82 वर्ष की उम्र में 28 जून 1945 को रामगढ़ कुमायूँ में हुई, रामगढ़ से चम्पावत के एबट माउंट के कब्रिस्तान तक एबट के मृत शरीर को लाकर दफ़नाना, अवश्य ही एबट की अंतिम इच्छा होगी, क्योंकि उस वक्त उन दुरूह पहाड़ी राहों से इतनी दूर तक मृत शरीर को लाना बहुत ही कठिन रहा होगा, किन्तु जॉन एबट का यह एबट माउंट उसका अपना सपना था जिसे उसने गुलज़ार किया था, वह मौत के बाद यही ज़मीदोज़ होना चाहता होगा...अंतिम इच्छा अपनी जमीन में हमेशा के लिए सो जाने की...

एबट माउंट पर मिशनरियों ने आकर अस्पताल व चर्च में दवा और प्रार्थनाओं का कार्य भी शुरू किया, कुमायूँ के गज़ेटियर के मुताबिक 1871 में लोहाघाट में एपिस्कोपल मेथोडिस्ट चर्च द्वारा अस्पताल का निर्माण हुआ, बाद में सन 1875 में एक स्कूल खोला गया, मिशनरीज एबट माउंट के बसने से पहले से यहां काम कर रही थी, और एबट फैमिली के उजड़ने के बाद भी मिशनरीज ने यहां काम किया, एम डी स्टोन, एम सी डेविड जैसे लोगों ने इस स्थान को आबाद रखा मिस्टर एबट के बाद।

कौन था डाक्टर मॉरिस? जिसे लोग मौत का डाक्टर कहते हैं

सन 1940 के आस पास एक डाक्टर मोरिस एबट माउंट आया, जिसने मिस्टर एबट से उनका सबसे बड़ा बंगला 36 हजार रुपए में खरीदा, इस बंगले के चारो तरफ बड़े घास के मैदान और देवदार, बुरांश तथा बांज के पेड़ है, इस बंगले के बरामदे के आगे दो विशाल देवदार के पेड़ है जिसे मिस्टर एबट व उनकी पत्नी ने लगाए ऐसा कहना है इस बंगले के मौजूदा चौकीदार बहादुर सिंह का। बहादुर सिंह बताते हैं, की यह बंगला डाक्टर मोरिस ने खरीदा और वह यहां 18 साल रहा, इससे पहले वह एबट माउंट पर मुक्ति कोठी में अस्पताल चलाते थे, मरीजों की तादाद बढ़ी तो उन्हें मिस्टर एबट से यह बंगला खरीदा जो बहुत बड़ा है, बहादुर सिंह की जुबानी वह एक कुशल डाक्टर थे, भयानक बीमारियों से ग्रस्त मरीजों का इलाज कर उन्हें ठीक किया, सन 1957 में बहादुर सिंह को मलेरिया हुआ तो उनका भी इलाज डाक्टर मोरिस ने किया, तबसे आजतक बहादुर सिंह को मलेरिया नही हुआ, मोरिस के इस अस्पताल में नेपाल तक से मरीज आते थे, पिथौरागढ़, गंगोलीहाट और मैदानी इलाकों में बरेली तक के मरीज अपने इलाज के लिए एबट माउंट आया करते थे, ज़ाहिर है डाक्टर मोरिस एक विख्यात डाक्टर थे और उनका यह अस्पताल जहां मरीजों के ठहरने व खाने पीने का इंतजाम भी मुफ्त था, यह बात नही मालूम हो सकी कि कौन सी मिशनरी या सरकार उन्हें यह अस्पताल चलाने में आर्थिक सहायता करती थी? किन्तु डाक्टर मोरिस मरीजों का मुफ़्त इलाज करते थे, यह बात उनके द्वारा इलाज किए गए मरीज जरूर बताते हैं जो जीवित हैं और आसपास के गांवों में रहते हैं।

डाक्टर मोरिस का हॉस्पिटल

आखिर कब और कैसे एक हुनरमंद डाक्टर विख्यात से कुख्यात हो गया, ये कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। कहते हैं, की डाक्टर मोरिस एक विशेष प्रयोग कर रहे थे, यदि वह सफल होता तो मेडिकल साइंस को एक नायाब तोहफा मिल जाता कि इंसान की मौत के वक्त उसके दिमाग में क्या तब्दीली होती है। डाक्टर मोरिस ये भी बता देते थे कि कौन मरीज़ कितने दिनों में मरने वाला है, और उस मरीज़ की मौत मोरिस के बताए हुए समय पर ही होती थी, पूरे कुमायूँ में यह बात फैल चुकी थी कि डाक्टर मोरिस मौत की सही सही भविष्यवाणी करते है। जब भी किसी मरीज को वह बताते की अब वह फला रोज मर जाएगा, तो उसे वह मुक्ति कोठरी में भेज देते, और बताए गए मुकर्रर वक़्त पर वह रोगी मर जाता।
पहाड़ो की दुरूह चढ़ाई पर पहाड़ के गरीब लोग जब किसी रोगी को लाते तो मौत की तारीख़ तय हो जाने पर वह उसे वापस नही ले जा पाते या जिन मरीजों का कोई नही होता वह भी मुक्ति कोठरी में मर जाता जिसे वही पास में दफ़ना दिया जाता, गरीबी व पहाड़ी रास्ते बहुत दुश्कर होते थे पहाड़ के लोगो के लिए, फिर मरीज को अच्छा खाना और दवाओं के साथ साथ रहना भी फ्री था डाक्टर मोरिस के अस्पताल में, इस कारण भी लोग अपने मरीज़ों के प्रति बेपरवाह हो जाते थे।
एबी बंग्लो हॉस्पिटल की सड़क

मोरिस के हॉस्पिटल से हिमालय का दृश्य


लोगों का कहना है की डाक्टर मोरिस जिन रोगियों की मौत की तारीख तय करता था, उन्हें मौत की कोठरियों में भेजकर उनके दिमाग के अध्ययन के लिए खोपड़ियों को चीर कर दिमाग़ में यह पता लगाता था कि वह कौन सी हरकत है जो मौत और जिंदगी को तक़सीम करती है, वह मरीजों के तमाम अंगों को चीरता फाड़ता और उन पर तमाम तरह के प्रयोग करता था, और यही वजह थी मुक्ति कोठी कालांतर में मौत की कोठरियों के नाम से जानी जाने लगी और डाक्टर मोरिस मौत के डॉक्टर के नाम से कुख्यात हो गए।

क्या डॉक्टर मोरिस वाक़ई विदेशी जासूस थे?

एक किस्सा और पता चला डॉक्टर डेथ यानि मोरिशन का की उन्हें आज़ाद भारत की आर्मी ने गिरफ़्तार किया तकरीबन 1959 के आस पास, वजह थी वायरलेस से किसी दूसरे देश में सम्पर्क की, डॉक्टर का वह कम्युनिकेशन भारतीय सेनाओं के वायरलेस सिस्टम ने कैच कर लिया था...यह बात बताई पास के गांव के रहने वाले कल्याण सिंह ने, उनके मुताबिक एबी बंगले वाले हॉस्पिटल में लगे देवदार के वृक्ष में एंटीना लगाकर मोरिस कहीं बात कर रहे थे तभी आर्मी के वायरलेस सिस्टम ने वह सिग्नल पकड़ लिया...
लेकिन कल्याण सिंह को यह नही पता कि आर्मी ने उन्हें पकड़ने के बाद क्या किया, वह छोड़ दिए गए या बच निकले, यह रहस्य ही है, आज एबट माउंट और एबी हॉस्पिटल और यहां की मुक्ति कोठी और भुतहा चर्च को जो ख्याति दुनिया में मिली उसका पूरा श्रेय डाक्टर मोरिस को जाता है, वह एक वैज्ञानिक, डाक्टर, जासूस या फिर मौत के प्रिडेक्टर में से असल क्या था ये शोध का विषय है।

कुल मिलाकर एबट माउंट में हिंदुस्तानी व योरोपियन फूलों वाली झाड़ियों से घिरी अंग्रेजी कोठियों में वक़्त गुजारना मन को रूहानी हसास कराता है, कुमायूँ की यह चोटी बेहद खूबसूरत, और प्रवास के लिए एक बेहतरीन हिल स्टेशन है आप चाहे तो टनकपुर के रास्ते से यहां पहुंच सकते हैं या फिर काठगोदाम के, पर दोनों राहों की खूबसूरती जुदा जुदा है।
एक गीत भी गाती थी हमारी चम्पावत पिथौरागढ़ की महिलाएं डाक्टर मॉरिस के इस हॉस्पिटल की तारीफ़ में...आधा अधूरा

एबट माऊंटो अस्पतालो
दवा देती मीसी.....
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पर्याय ये है कि एबट माउंट का यह अस्पताल बहुत अच्छा है, जहां दवाई मीसी यानि मेमसाहिब लोग / सिस्टर/मिस देती हैं
यहां बहुत अच्छा डाक्टर (मोरिस) आया है, अभी कुछ रोज यहां है, फिर चला जाएगा....(रेगड़ू निवासी कल्याण सिंह जी के हवाले से)
दुधवा लाइव के यू ट्यूब चैनल पर आप एबट माउंट की और डाक्टर डेथ की पूरी कहानी देख सकते है।



कृष्ण कुमार मिश्र ग्राम-मैनहन

जनपद-खीरी












1 comment:

  1. शानदार लेख, लगता है पूरा माउन्ट एबट घूम लिया

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