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International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 3, 2019

पहाड़ आये पर्यटक तो प्लास्टिक नहीं लाये : गांधीवादी पर्यावरणविद मनराल



राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी के १५०वे जन्मदिन पर जिम कॉर्बेट क्षेत्र, रामनगर, उत्तराखंड में राज्य आंदोलनकारी, गांधीवादी, नौला फाउंडेशन के सरंक्षक पर्यावरणविद  मनोहर सिंह मनराल के आह्वान पर समस्त क्षेत्रीय जनता व् महिला शक्ति ने मिलकर सर्वप्रथम उत्तराखंड राज्य आंदोलन के शहीदों को श्रद्धांजलि देने के बाद सिंगल यूज़ प्लास्टिक मुक्त जंगल अभियान चलाया और उस एकत्रित प्लास्टिक कचरे से सुन्दर कलाकृतिया  बनायीं I ७२ वर्षीया पर्यावरणविद गांधीवादी श्री मनराल ने अपने जीवन की शुरुआत से ही स्थानीय ग्रामीणों को स्वच्छ भारत मिशन से प्राप्त होने वाले लाभों की संख्या का वर्णन किया है, जो महात्मा गांधी के स्पष्ट आह्वान का एक स्मरण है जो स्वच्छता कहते हैं स्वतंत्रता से अधिक महत्वपूर्ण है। उन्होंने हमेशा कहा कि भारत को तब तक विकसित नहीं किया जा सकता जब तक कि हम भारत के गांव का विकास नहीं करते, वहां जमीनी स्तर पर विकास होना चाहिए।







उनकी राय में और जो बहुत सही है कि भारत में विकास की प्रक्रिया ग्राम स्तर से होनी चाहिए। उन्होंने हमेशा कहा कि कृषि को कुछ सहायक व्यवसायों जैसे मधुमक्खी पालन, पशुपालन, खादी, कागज बनाने, मिट्टी के बर्तनों आदि द्वारा समर्थित किया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि महिलाओं को कृषि और सहायक उद्योगों में योगदान देना चाहिए। पूरा उत्तराखंड केवल उनका जीवन और गांधीवादी विचारधारा ही नहीं, सबसे अधिक सम्मान करते हैं जब उन्होंने एक अलग पहाड़ी राज्य उत्तराखंड के लिए 21 साल की लंबी लड़ाई में हिस्सा लिया। एक बार जब उत्तराखंड क्रांति दल का उद्देश्य पूरा हो गया और उत्तराखंड भारत का 27 वां राज्य बन गया, तो उन्होंने पार्टी छोड़ दी और अपना शेष जीवन समाज कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने स्थानीय युवाओं को पवलगढ़ सरंक्षित वन और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के लिए पवलगढ़ प्रकृति प्रहरी का गठन किया। उनका घर जहां उत्तराखंड के भविष्य का मसौदा तैयार किया गया था। आप उन्हें हमेशा समाज कल्याण कार्यो में तल्लीन या गाय या पौधों को पानी देते हुए पा सकते हैं। पॉलीथिन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के एक सप्ताह पहले पॉलीथिन से होने वाले पर्यावरणीय नुकसान पर, अनप्लास्टिक उत्तराखंड को कॉल करना एक व्यापक जन जागरूकता अभियान है। श्री मनराल के अनुसार पर्यावरण संरक्षण एक सामूहिक जिम्मेदारी है और इसलिए उत्तराखंड को पॉलिथीन मुक्त बनाने के लिए लोगों का सहयोग आवश्यक है। उत्तराखंड में आने वाले समस्त पर्यटकों से अपील करते हैं की वो जो भी सिंगल यूज़ प्लास्टिक पहाड़ लाते हैं वो अपने साथ वापस ले जाये उसको जंगल या रोडसाइड कही भी नहीं डालें I  प्लास्टिक से हमारे पहाड़ की प्राकृतिक जल स्रोतों पर गंभीर प्रभाव पड़ता हैं और प्लास्टिक जंगल में जंगली जानवर खाद्य पदार्थ समझकर प्लास्टिक निगल जाते हैं जिससे वो गंभीर बीमार हो जाते हैं

महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती वर्ष पर उन्होंने समुदाय से अपील की और कहा, “यह देखा गया है कि भारत में प्लास्टिक की खपत तेजी से बढ़ रही है, लेकिन अब समय आ गया है जब हमें निपटान प्लास्टिक के उपयोग को हतोत्साहित करना चाहिए और किराने का सामान छोड़ना चाहिए, प्लास्टिक रैप्स, डिस्पोजेबल कटलरी, कॉफी कप लिड्स, पानी की बोतलों की खरीद कम से कम करें, और इसके बजाय सेकंड हैंड आइटम खरीदें और बैग टैक्स का समर्थन करें या एकल उपयोग प्लास्टिक को कम से कम करें। ”उन्होंने यह भी कहा कि उनके पवलगढ़ परिसर के भीतर सिंगल यूज़ प्लास्टिक के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा।

पर्यावरणविद मनोहर सिंह मनराल  ने बताया हमारे वेदों  के पारम्परिक जल विज्ञानं पर आधारित परम्परागत जल सरंक्षण पद्धति व सामुदायिक भागीदारी को ज्यादा जागरूक करके पारम्परिक जल सरंक्षण पर ध्यान देना होगा I  अब समय आ चुका हैं हिमालय के लिए एक ठोस नीति बनानी होगी और पर्यटकों पर पर्यावरण शुल्क भी लगाने के साथ साथ प्लास्टिक पर पूर्णतः प्रतिबन्ध लगाना होगा तभी थोड़ा बहुत हम अपने बच्चों को  साफ़ सुधरा भविष्य  दे सकते हैं I  माइक्रोप्लास्टिक प्लास्टिक के बहुत छोटे टुकड़े हैं जो पर्यावरण को प्रदूषित करते हैं। एक माइक्रोप्लास्टिक को एक प्लास्टिक कण के रूप में परिभाषित किया गया है जो पांच मिलीमीटर से कम है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण के अनुसार, जर्मनी में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि मिट्टी, तलछट और मीठे पानी में माइक्रोप्लास्टिक्स के प्रभाव से ऐसे पारिस्थितिक तंत्र पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।  प्लास्टिक हमारे वन्य जीवन और जंगलों को प्रभावित करता है, खाद्य श्रृंखलाओं में माइक्रोप्लास्टिक्स की एकाग्रता है।  जब उच्च ताप जलवायु में, प्लास्टिक विभिन्न रसायनों जैसे अग्निरोधी, परागण, कृत्रिम रंजक और बहुत अधिक मिट्टी और प्राकृतिक जलस्रोतों में पहुंच सकता है और नुकसान पहुंचाता हैं I

नौला फाउंडेशन उत्तराखंड 

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