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Sep 23, 2019

बिच्छू बूटी का रोम से अल्मोड़ा तक का सफर


एक मुलाक़ात बिच्छू बूटी से अल्मोड़ा कुमायूँ में....

कितनी भी कवायदें कर ले पर कहते हैं मूल मूल होता है, और पलई पलई.. कुछ ऐसा ही है रिलाइंस का जियों इतनी सरकारी सहूलियतों के बावजूद भी आज भी भारत के दूर दराज़ इलाकों में हमारा बीएसएनएल ही काम आता है, अल्मोड़ा जनपद के इलाकों में जब जियो बैठ गया तो सिंग्नल  की तलाश में हम एक कस्बे से थोड़ा ऊपर पैदल चलकर इस आस में निकले की शायद सिंग्नल मिल जाए, सिंग्नल तो नही मिला पर आदतन फूल पत्तियों को छूने की हमारी तासीर ने बिच्छु बूटी से हमे जरूर मिला दिया और उसका असर हमारे हाथ मे कई घण्टों तक रहा, उस पीड़ा ने इस वनस्पति से जान पहचान करने की उत्कंठा और बढ़ा दी।
अंततः जो परिचय हुआ वह आप सबसे भी साझा कर रहा हूँ, यह वनस्पति वैज्ञानिकों की भाषा में Urtica dioica के नाम से जानी जाती है, इसे कॉमन नेटल या स्टिंगिंग नेटल भी कहते हैं अंग्रेजी में, क्योंकि इसके रोएंदार कांटों के स्पर्श से बिच्छू के डंक की तरह दर्दशव त्वचा में सूजन आती है। यह मूलतः योरोप की प्राजाति है जो औपनिवेशिक दौर में भारत तक चली आई और बसेरा बना लिया हमारे पहाड़ में, क्योंकि यह छायादार नम व उपजाऊं जमीन में उगती है इसकारण इसे पहाड़ों के निचले हिस्से खोइब पसन्द आए और अब इसने अपना भारतीयकरण कर लिया, कहते है 16वीं सदी में रोम के लोगों ने इसे योरोप में विस्तार दिया, और फिर यह वहां से अमरीका एशिया और अफ्रीका तक अपनी जड़ें जमा ले गई, यह बीजों से और अपनी राइजोम वाली जड़ों से खुद को विस्तारित करने की कूबत रखती है सो इसने बड़ी आसानी से अपनी जड़ें धरती के विभिन्न भूभागों में फैला ली, एक और मार्के की बात जहां इंसानी जमात गन्दगियाँ छोड़ता है वहां की जमीन यह खूब पसंद करती है जाहिर है गंदगी में फास्फेट और नाइट्रोजन जैसे तत्वों की अधिकता होती है, अल्मोड़ा के जिस कस्बे के बाहर इस बिच्छू बूटी ने मुझे डंक मारा वह जगह भी कूड़ा फेकने की जगह थी जहां यह वनस्पति खूब तादाद में लहलहा रही थी।

इस बूटी की पत्तियों व तने पर  खोखले रोएंदार कांटों की बहुत ज्यादा संख्या होती है जब भी कोई जीव इनके सम्पर्क में हॉट है तो इन रोयों से फार्मिक एसिड निकल कर उस जीव की त्वचा में प्रवेश कर जाता है वह हिस्टामाइन की तरह मनुष्य/जीव के नर्वस सिस्टम को प्रभावित करता है नतीजतन सूजन व दर्द का एहसास तारी होता है, परन्तु इन बुराइयों के अलावा इस बिच्छू बूटी में विटामिन ए, सी, मैग्नीशियम, कैल्शियम की अत्यधिक मात्रा होती है, और इसी वजह से इस बूटी के शैशवकाल में इसे काटकर उबालकर इसका सूप व सब्जी बनाने का चलन अमरीका और योरोप में बहुत पुराना है, इसमें फूल आ जाने पर इस बूटी में एक ऐसा तत्व उतपन्न होता है जो किडनी व मूत्रतंत्र को बुरी तरह प्रभावित करता है इसलिए इस वनस्पति का इस्तेमाल पुष्पन अवस्था मे नही करना चाहिए।

खैर धरती सभी की है वनस्पति हो जीव यह धरती उसे हर जगह स्वीकार कर ही लेती है, न जाने कब यह वनस्पति योरोप से आकर common nettle से कण्डाली या बिच्छू बूटी बन गई हमारे पहाड़ में और बना ली रिहाइश यहां की धरती पर यह विचारना भी अपने आप में रोचक है।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन
खीरी
भारत वर्ष

1 comment:

  1. उत्तराखण्ड में प्रचुर मात्रा में मिलती है बिच्छू बूटी । स्थानीय लोग इसकी भाजी बनाकर खाते हैं । जोड़ों के दर्द के लिए इसे खाना मुफ़ीद माना जाता है । बस... तोड़ते और पकाते समय सावधानी की आवश्यकता होती है । एक बार इसकी पत्तियाँ पानी में उबल जाने के बाद गिर हाथ से छुई जा सकती हैं । भाजी स्वादिष्ट बनती है इसकी ।

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