वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Sep 30, 2019

ये पिंडारा केवल वृक्ष नही हमारी संस्कृति का हिस्सा है


एक भूली बिसरी वनस्पति

क़भी गांवों में सब्जियों में ख़ूब होते थे इस्तेमाल इसके फ़ल

चरवाहों में लोकप्रिय था यह पेड़ जिसकी छांव और जिसके फ़ल आज भी उनकी यादों से विस्मृत नही होते

औषधीय गुणों से परिपूर्ण यह पेंदारा अब विलुप्ति की राह पर

आज मन हुआ अपने गांव घर की वह बात कहूँ जो कभी गांव की वह जमात में लोकप्रिय रही जिसे चरवाहे कहते हैं, और तब घर का कोई न कोई व्यक्ति पालतू पशुओं को नदी के किनारों तालाब के झाबर और अन्य चरागाहों में मवेशियों को चराने जाता था यह उसका नित्य का निर्धारित कार्य था, अब विकास ने झाबर यानी नम भूमियों वाले तालाबों के पास के घास के मैदान, नदियों के किनारे की भूमियों और चरागाहों को निगल लिया, आदमी आमादा है जमीन के हर हिस्से पर काबिज़ होने के लिए, सदियों से उसकी यह चेष्टा रही, किन्तु धर्म नियम समाज की परंपरा, ईश्वर का खौफ़ उसे ऐसा करने से रोकता था, विकास की तासीर कुछ ऐसी बनी इंसान बुजुर्गों के बनाए कायदों को नज़रन्दाज कर गया, और बस इस धरती को अपनी लालसा और लिप्सा में लपेटने को आतुर है, नतीजतन जिन जीवों की जिनमें तितलियां पक्षी जंगली जानवर सब तरह के खूबसूरत व धरती के वाक़ई पुराने बाशिन्दे अब हाशिए पर आ गए या यूं कहें कि विलुप्ति की कगार पर। इन्ही हालातों पर एक पेड़ का किस्सा कहने का मन हुआ, सुनिएगा....


ये कहानी है पिंडारा या पिण्डारे की जिसे पिंदारे भी कहते हैं, स्थानीय छोटी नदियों के किनारे उगने वाले इस पेड़ के बहुत किस्से हैं जो 50 बरस पुरानी पीढ़ी आज भी सुनाते हुए नही थकती, क़भी जानवरों को चराने ले जाने वाले लोग इसी झाड़ीनुमा हरे भरे पेड़ की चौड़ी पत्तियों की छांव में सुस्ताते थे, और इसकी पत्तियां फल और फूल का स्वयं तथा अपने पशुओं के लिए भोजन के रूप में इस्तेमाल किया करते थे, अब नई पीढ़ी यह नाम भी नही जानती की आखिर ये पिण्डारे क्या बला हैं।

गौर तलब है कि नदियों व तालाबों के किनारे उगने वाले ये पिण्डारे जलीय इकोसिस्टम का एक हिस्सा थे बहुत से जीव इसकी छांव में पनपते थे, मानव समाज भी इसके औषधीय गुणों से वाकिफ़ हो चुका था, और इसके पौष्टिक फलों से भी।


अब इसके नाम करण पर चर्चा हो जाए, पिण्डारे कोंकणी भाषा का शब्द है जो गोवा, केरल महाराष्ट्र के समुंद्री तटीय क्षेत्रों की भाषा है, इसकी लिपि भी अलाहिदा है, संस्कृत और पाली से मिलती जुलती है, इंडो आर्यन व इंडो ईरानियन भाषाई शाखा के अंतर्गत इसे स्थान मिला है, स्कंद पुराण में ज़िक्र है एक बार भगवान परशुराम ने नाराज़ होकर समुंदर में तीर चलाया उसके प्रभाव से समंदर की धरती का एक कोना बाहर आकर अलग हो गया यानी कोंकण और उसी क्षेत्र की भाषा कोंकणी हुई।

तो कोकड़ी का यह पिंडारा शब्द उत्तर भारत तक कैसे पहुंचा और इस वृक्ष के साथ जुड़ा यह शोध का विषय है, वैसे इस जीनस की वनस्पतियां नियोट्रापिकल यानी अफ्रीका से अलग हुए  गोंडवाना क्षेत्र यानी दक्षिण अमरीका में खूब मिलती है, वैसे यह भारतीय उपमहाद्वीप की वनस्पति है जो बांग्लादेश, श्रीलंका व भारत मे पाई जाती है, इंडो चाइना क्षेत्र वियतनाम व इंडोनेशिया में भी आपका ये पिंडारा मिल जाएगा।

इसके औषधीय गुणों की बात की जाए तो यह डायरिया, अल्सर, व ह्रदय रोगों में लाभकारी है, इसमें बहुत ही अधिक तादाद में कार्बोहाइड्रेट मौजूद होता है, इसकी फलों व फूलों की सब्जियां पकौड़ियां आदि व्यजन भारतीय परम्परा में प्रचलित रहे, इसकी सब्जी बनाते वक्त आपकी कड़ाही हरे रंग से भर जाएगी।

भारतीय जन मानस में आधी सदी पहले पिण्डारे महुआ तेंदू  पलाश आदि के जंगल गांवों के आस पास एक बफर जोन बनाते थे अब तो आम की ऊंचे दरख्तों वाली बागें भी ख़त्म हो गई....
इस पिण्डारे कि खासियत एक और है इसकी जड़ों से पौधे निकलते है उन्हें काट कर आप रोप सकते हैं, इसकी डालियों को भी अगर आप जमीन दे दें तो यह वृक्ष में तब्दील हो जाएगा।


इसके फूल को डिवाइन जैस्मिन यानी रूहानी चमेली कहते है सफेद रंग का खूबसूरत फूल इसकी डालियों पर बहुत ख़ूब लगता है, इसका वैज्ञानिक नाम  Tamilnadia uliginosa है, यह Rubiaceae कुल से ताल्लुक रखता है। जमीनों की विविधिता खत्म हो रही है, विकास बेसाख़्ता अपनी राक्षसी रफ्तार में बढ़ रहा है, बचा सकते यह खूबसूरत वनसोतियाँ तो बचा ले बाज़ाए, विदेशी झाड़ झंखाड़ गमलों में रोपने के, तो ये हमारे पुरखों के किस्से और हमारे इतिहास का यह गवाह जो सदियों से हमारे समाज के साथ रहा दोनों बच जाएंगे, अपने मूल को भुलाना अपने मूल्यों के खोने की तरह होता है।
यह पिण्डारे नही हमारे अतीत के गवाह भी है और मुनासिब व मुफ़ीद भी हमारी धरती की जैव विविधिता की ख़ातिर...

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन - खीरी
भारत वर्ष



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