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International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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Sep 27, 2019

रैंस - एक बेहतरीन पहाड़ी दाल

रैंस की दाल में मिश्रित लोम्बिया की दाल
रैंस का चैंस....
पहाड़ की बेहतरीन प्रोटींन वाली दालों को बचा लीजिए, वे गुज़र रही हैं...

आज आप को पहाड़ी दालों में से एक खूबसूरत ठंडी तासीर वाली दाल से परिचित कराते हैं, यह है रैंस, रियांस या गुगारु की दाल, यह अल्मोड़ा पिथौरागढ़ जनपदों में होती आई है, आज भी कुछ स्थानीय किसानों के घरों में यह दाल मौजूद है, लेकिन यह अब विलुप्त प्राय ही है, गहत जैसी दालों का भी यही हाल है, पहाड़ से पलायन, जंगलों व जल स्रोतों का क्षरण और जंगली जीवों का खेतों की तरफ मजबूरन रुख करना अब पहाड़ की दालों व अन्य प्रकार के देशी बीजों वाली फसलों की खेती नदारद ही हो रही है, सब्जियों फलों पर जरूर सरकारी कवायदें व रियायतें है और उत्तराखण्ड की जलवायु भी सो किसान थोड़ी थोड़ी खेती में ज्यों त्यों बागवानी व सब्जियों में आमदनी का जरिया तलाश रहे हैं।

बात हो रही थी दालों की यह द्विबीजपत्री वनस्पतियां है गेंहू धान आदि एक बीजपत्री अनाजों से पहले धरती पर आई, दालों की फसल वक्त भी अधिक लेती है एकबीजपत्री अनाजों की तुलना में, किन्तु धरती पर वानस्पतिक प्रोटीन का बेहतरीन स्रोत है ये दालें, याद रहे जीवन प्रोटीन से ही उत्पन्न हुआ, गेहूं चावल आदि अन्नों से कार्बोहाइड्रेट प्राप्त कर शर्करा के विघटन से जीवन को त्वरित ऊर्जा तो मिल सकती है, किन्तु बिना प्रोटीन के एमिनो एसिड्स के डीएनए का निर्माण नही यानी जीवन का मूल है प्रोटीन जो इन दालों के रूप में प्रकृति ने हमें दिया, और हम है कि जीवों को मारकर प्रोटीन खोज रहे हैं, या डिब्बाबन्द प्रोटीन पाउडर या फिर क्षणिक ऊर्जा के लिए शर्करायुक्त पेय पर अधिक आमादा हैं, बदलती जीवन शैली में लोग प्रकृति की विविधिता को भूल गए, उन्हें नही पता रहा कि प्रोटीन भी अलाहिदा अलाहिदा है, कौन सी प्रोटीन हमारे पाचनतंत्र के लिए मुफ़ीद है कौन नही, आपको बताता चलू की सांप के जहर भी प्रोटीन से बना है जो पचता नही, ऐसी बहुत सी प्रोटीन है जो मानव शरीर के मुताबिक नही, जानवरों के दूध की प्रोटीन भी मानव शरीर के लिए बहुत अच्छी नही, कई मनुष्य तो इसे पचाने की भी क्षमता नही रखते, किसी भी जीव का दूध उसके बच्चे के लिए होता है यानी उसी की जाति के लिए, पर आदमी है कि समझना ही नही चाहता स्वाद और कुछ लाभ के लिए, दूरगामी नुकसानों को नज़रन्दाज करता हुआ यह हमारा मानव समाज प्रकृति में बिखरी हुई हजारों दालों की किस्मों को भूल गया, नतीजा यह है कि उसके जिस्म में बेहतर प्रोटीन की किल्लत और हड्डी गठिया डायबिटीज ह्रदयरोग त्वचारोग और न जाने कितनी दुश्वारियां सामने खड़ी है और आप दवा की गोलियों में इलाज खोज रहे बाज़ाए इन सुंदर गोल गोल दानों के जो आपके शरीर को पुष्ट रख सकते हैं।

रैंस की दाल कर वाबत ये ब्यौरा ज़रूरी ए हो गया था सो कह डाला, रैंस अब नही मिलती आसानी से और इस तरह की तमाम और दालें भी विलुप्ति के कगार पर हैं जिन्हें सरंक्षित किया जाना चाहिए, कमसे कम स्थानीय नाम के साथ इनका वैज्ञानिक परिचय भी हमें मालूम होना चाहिए, पर रैंस की दाल का इस नाम से कोई वानस्पतिक परिचय इंटरनेट पर मौजूद नही, जेनरा और स्पेशीज क्या है और वैराइटी कौन सी हैं, सालिम अली पक्षी विज्ञान के पितामह ने पूरे भारतीय सबकॉन्टिनेंट में स्थानीय नामों के साथ पक्षियों का वैज्ञानिक विवरण दिया, इस तरह दालें व अनाजों आदि का वर्नाकुलर नामों के साथ उनकी वैज्ञानिक पहचान का दस्तावेजीकरण हों, और स्थानीय स्तर और स्कूलों में स्थानीय वनस्पतियों को ही पढ़ाना चाहिए, गैलापगास, मेडागास्कर और अमरीका की वनस्पतियों के बाज़ाए.....

रैंस की दाल औषधीय गुणों से युक्त तासीर में ठंडी, और इसकी बहुत सी रेसिपी है पहाड़ में, इसका चैंस भी बनता है, पराठे भी, बडे भी, रैंस आलू और रैंस का चैंस भी, झुलेके, रैंस का चीला और खिचड़ी भी।

तो अगर इतने से व्यंजन इस दाल के खाने है तो पहाड़ से गायब मत होने दीजिए रैंस, वहां के किसानों को प्रोत्साहन दीजिए और मदद भी इन बेहतरीन दालों के बाज़ार तैयार करे बाज़ाए बर्गर पिज्जा और चाउमीन के, तभी आप जीवन देने वाली इन बेहतरीन प्रोटीनों से स्वस्थ्य और दुरुस्त रह सकेंगे।

कृष्ण कुमार मिश्र
मैनहन-खीरी
भारत वर्ष 

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