वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 26, 2019

तराई के जंगलों में उगते हैं धरती के सितारे

क़भी कहेंगे लोग यहां कहीं उगते थे धरती के सितारे....

इसे बैरोमीटर मशरूम और हाइग्रोमीटर मशरूम भी कहते हैं।
क्योंकि ये पता लगाता है वातावरण में नमी की स्थित..

एक स्वादिष्ट मशरूम जिसे उत्तर भारत के खीरी जनपद में कटरुआ के नाम से जाना जाता है।

जंगल धरती पर मौजूद जीवों की सभी बुनियादी ज़रूरत पूरी करते है, उनकी सौगातों की बात करना बड़ा मुश्किल है क्योंकि उस सूची पत्र का आकार ही अनन्त होगा, इन्ही सौगातों के सिलसिले में आज हम बात करेंगे साखू के जंगलों में मौजूद एक फंगस की जिसे हिंदी में कवक कहते है, वैसे मानव सभ्यता में फंगस बहुत सी बीमारियों के लिए ज़ियादा जानी जाती है लेकिन आज हम इसके बेमिसाल स्वाद और पौष्टिक तत्वों की बात करेंगे, दुनिया भर की सभ्यताओं में तमाम किस्मों की रंग-बिरंगी फंगस खूबसूरत बनावट वाली, उग आती है जंगलों में, घास के मैदानों में, झुरमुटों में और खेतों में भी, सवाल यह है कि कौन फंगस खाने के लायक है और कौन नही, बड़ी अजीब बात है कि अधिकतर रंग बिरंगी खूबसूरत आकार की ललचाने वाली फंगस जहरीली होती है, शायद यह प्राजाति को यह गुण स्वयं को बचाने के लिए बना है, जानवर तो प्रकृत्ति प्रदत्त अपनि इंस्टिंक्ट यानी वृत्तियों के कारण पहचान जाते है बुरा और अच्छा पर इंसान इस मुआमले में फिसड्डी है उसके दिमाग में घण्टो महीनों सालों और सदियों का अलगारिदम फेल हो जाता है यहां बनस्पति जंगली जीवों की इंस्टिंक्ट के आगे, खैर बताता चलू पता नही कितनी सभ्यताओं में पता नही कितने लोग शहीद हुए सिर्फ यह जानने के लिए की कौन सी वनस्पति खाने के काबिल है और कौन नाकाबिल, कुछ ने बहादुरी में यह काम किया और दे गए मानवता को सौगात और कुछ ने अनजाने में अपना जीवन खो दिया, पर मानवता को यह ज्ञान दोनो से ही मिला, की अब उनकी पीढियां क्या खाएगी और क्या नही जो नुकसान कर सकता है या मौत का कारण भी बन सकता है।
क्रिश्चियान हेंड्रिक परसून कवक विज्ञानी।
फ़ोटो साभार: विकिपीडिया

हम बात करेंगे उन फंगस की जिन्हें मशरूम कहते हैं यानी जिनमें फ्रूटिंग बॉडी हो जिनमें स्पोर्स मौजूद हों, कुलमिलाकर मांसल फंगस,  फ़ंजाई यानी कवक के वर्गीकरण के विज्ञान का एक बहुत बड़ा डिवीजन हैं बेसिडियोमाइकोटा जिसमें अस्कोमाइकोटा सन्नहित होकर डाईकार्या नामक सबडिवीजन बनाते हैं जिनके अंतर्गत उच्च फ़ंजाई रखी गई है जैसे अर्थ  स्टार, पफबॉल, स्टिंकहॉर्न, रस्ट, ईस्ट आदि, अब इन खूबसूरत, मांसल व रंगबिरंगी दिखने वाली फ़ंजाई यानी मशरूम में कौन खाने लायक है कौन नही इसका निर्धारण सदियों से मानव सभ्यता में लोगों के अनुभव जिनमें, खासतौर से जन-जातियों को अधिक योगदान रहा, क्योंकि उनका जंगल से नाता अप्रतिम है, मज़े की बात यह है बुद्धिमान आदम जात की बुद्धि जहरीले मशरूम व खाने वाले मशरूम की पहचान में धोका खा जाती है, वही जानवर पक्षी कीड़े आदि प्रकृति प्रदत्त वृत्ति यानी इंस्टिंक्ट ज़रिए ही भांप जाते है कि कौन सा मशरूम इस्तेमाल किया जा सकता है भोजन के रूम में कौन नही, और हां इंसान ने भी इन्ही जीवों से ही सीखा की कौन मशरूम उपयोगी है और कौन जीवन के लिए ख़तरा, देखिए प्रकृति का खेल, इन रंग बिरंगे मशरूमों को जो जितना खूबसूरत आकर्षित करने वाला वह उतना अधिक जहरीला, कहते भी है अक्सर खूबसूरत चीजें खतरनाक होती है! 
दरअसल जो खाने लायक मशरूम है उनमें फ्रूटिंग बॉडी जिसे फलित शरीर कह ले, वह उसकी प्रजनन की अवस्था है उसमें स्पोर्स बनते हैं और परिपक्व होने पर वह हवा के जरिए इधर उधर फैल जाते है, फ्रूटिंग बॉडी में माइसीलियम चारो तरफ फैली रहती है जिसकी शाखाएं जिन्हें हाइफी भी कहते है वह एक जालनुमा  सरंचना बनाती हैं।

कटरुआ

फंगस के इस समूह जिसे हम मशरूम कहते है उनकी बहुत सी प्रजातियां खाने योग्य होती है तो बहुत सी विषाक्त, भारत के संदर्भ में हम बात करें तो उत्तराखण्ड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड में साल यानी शाखू के जंगलों में कई मशरूम की प्रजातियां मौजूद है, जिन्हें वनवासी यानी ट्राइब्स इस्तेमाल करती आई हैं सदियों से, उनके पारम्परिक अनुभवों के चलते भोज्य मशरूम की पहचान में वह निपुण हैं और वह यह भी जानते हैं कि किस मशरूम में कौन कौन से औषधीय गुण हैं।
इन शाखू के वनों में बारिश की शुरुवात में एक मशरूम उगता है धरती में जो भारत ही नही नेपाल तिब्बत आदि देशों में लोकप्रिय है जनमानस में, उसे उत्तर भारत मे कटरुआ और सेंट्रल इंडिया में सेहुला, पुट पुट आदि नामों से जानते हैं, उगता इस लिए, क्योंकि शाखू की जड़ों से इस मशरूम के गहरे रिश्ते हैं, यह भुरभुरी बलुई मिट्टी में धरती में दरारें डालते हुए बाहर निकल आते हैं, और चटक जाते है सितारों की तरह, इसलिए इन्हें अर्थ स्टार भी कहते हैं, यानी धरती के सितारे, शाखू के पेड़ों से जो राब्ता है इनका उसकी बात भी कर ली जाए, दरअसल  उसका कारण है माइकोराइजा यानी इन धरती के सितारों वाली मशरूम के माइसीलियम यानी पतले सफेद तंतु शाखू की जड़ों से सम्बद्ध हो जाते हैं, और यह शाखू के वृक्षों को जमीन से मिनरल जिनमे खासतौर से फॉस्फोरस पहुँचाते रहते हैं, और बदले में यह शाखू के वृक्ष से कार्बोहाइड्रेट लेते रहते हैं जो वह वृक्ष प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया की तहत बनाते हैं, तो यह रिश्ता सहजीविता का है इन दोनों प्रजातियों में, वर्गीकरण की फेहरिस्त में शाखू भी वनस्पति है और फंगस मशरूम भी पर दोनो के विकास में जमीन आसमान का फासला है, पर दोनो के मध्य यह सामंजस्य जीवन संघर्ष में खुद के अस्तित्व को बरक़रार रखने में अद्भुत है।

जब बात कटरुआ की हो ही रही है तो इस स्वादिष्ट मशरूम के अतीत की भी बात कर ली जाए, प्रकृति का इतिहास तो बहुत विस्तृत ही नही अनन्त हैं, किन्तु सभ्यताओं में मनुष्यों का जो अध्ययन है उसका ज़िक्र ज़रूरी हो जाता है, योरोप, अमरीका, व ऑस्ट्रेलिया में जब इस कटरुआ मशरूम का अध्ययन हुआ, तो दुनिया के सर्वश्रेष्ठ विख्यात मायकोलॉजिस्ट यानी कवक विज्ञानी जिन्होंने क्रिश्चियन हेंड्रिक परसून ने सत्रहवीं सदी में महान टेक्सानामिस्ट कार्ल लीनियस के वर्गीकरण को और समृद्ध किया, और उन्होंने ही इस कटरुआ फंगस को जीनसजिआस्ट्रुम के अंतर्गत रखा, जियो यानी धरती अस्ट्रम माने स्टार या सितारा क्योंकि परिपक्व होने पर इन छोटी छोटी गोलियों नुमा सरंचना यानी फ्रूटिंग बॉडी का बाहरी आवरण कुछ इस तरह फटता है जैसे पुष्प खिला हो और इसके आवरण के फटे हुए नुकेले आकार के दलनुमा आकृति हूबहू सितारों की तरह लगती है, लेकिन बहुत बाद में यह साबित हुआ कि यह वास्तविक अर्थ स्टार फंगस नही है क्योंकि इसके स्पोर्स का आकार व अन्य जेनेटिक व भौतिक लक्षण वास्तविक अर्थ स्टार से अलाहिदा है, ट्रू अर्थ स्टार फंगस को जिआस्ट्रुम जीनस के अंतर्गत रखा गया है, किन्तु बाद में एक अमरीकन वनस्पति शास्त्री व वर्गीकरण विज्ञानी एंड्रयू पी मॉर्गन ने अठारवीं सदी में कटरुआ को जिआस्ट्रुम से निकालकर एक नए जीनस एस्ट्रीयस में रखा किन्तु वैश्विक स्तर पर उनके इस शोध को नकारा गया, कुछ बड़े वैज्ञानिकों ने एंड्रयू के विचार को बक़वास तक करार दिया, किन्तु बीसवीं सदी में वैज्ञानिकों ने एंड्रयू पी मॉर्गन के इस वर्गीकरण को उचित ठहराया और अब ये हमारा कटरुआ बेसिडोमाइकोटा डिवीजन के अंतर्गत एस्कोमाइकोटा सहित सब डिवीजन डाईकार्या के अंतर्गत जीनस एस्ट्रीयस और जाति हाइग्रोमेट्रिकस के रूप में जाना जाता है, सन 2000 ईसवी के आसपास इसकी दो प्राजाति एशिया में अलाहिदा तौर पर पहचानी गई, जिन्हें एस्ट्रीयस एशियाटिक्स व एस्ट्रीयस ओडोरेट्स के तौर पर नामकरण किया गया यह थाईलैंड चाइना व भारत के भूभागों में पहचाना गया। 
यहां एक बात गौर तलब है कि हमारे उत्तर प्रदेश के व मध्य प्रदेश के इलाक़े में जो कटरुआ प्राजाति के मशरूम है वह वास्तविक तौर ओर एस्ट्रीयस हाइग्रोमेट्रिकस की ही नस्लें हैं और इस प्राजाति को हाइग्रोमेट्रिकस इस लिए कहा गया कि इस प्राजाति में वहां के वातावरण व धरती में जल की अधिकता व कमी का पता लागाने की ख़ूबी होती है, बिल्कुल हाइग्रोमीटर व बैरोमीटर की तरह, आद्रता ज्यादा हुई तो यह अर्थ स्टार पुष्प की तरह ख़िल जाएंगे, और आद्रता अगर कम हुई तो ये बन्द हो जाएंगे, धरती में या वहां के वातावरण में जल की उपस्थित को नापने का एकदम सटीक यंत्र जैसा है यह मशरूम।

कटरुआ मशरूम के पालीसैक्राइड्स यानी शर्कराओं में कुछ ऐसे एंटीट्यूमर व इम्युनिटी को बढ़ाने वाले गुण पाए गए जिनका वैज्ञानिकों ने प्रयोगशालाओं में चूहों पर सफल परीक्षण किया। साथ ही इनमें एंटीइंफ्लेमेटरी तत्व एथनॉल के एक्सट्रेक्ट में डाइक्लोफेनेक जैसी दर्द निवारक दवाओं से अधिक असरदार पाया गया। एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर ये कटरुआ रक्त स्राव रोकने, जले कटे में इस्तेमाल होता आया है चाइना व भारत के विभिन्न समुदायों में, बैगा व थारू जनजातियों में कटरुआ की फ्रूटिंग बॉडी के भीतर जो गेल्बा ( बाहरी आवरण एक्सोपेरीडियम के भीतर का भाग जिसमे स्पोर्स भरे होते है) में स्पोर्स भरे रहते है जैसे अंडे के मध्य में ज़र्दी, उनका इस्तेमाल सरसों के तेल में मिलाकर जले हुए घावों को ठीक करने में करते आए हैं। 
शाखू के जंगल

अपरिपक्व कटरुआ के भीतरी गोलाकार गेल्बा सफेद रंग का होता है किंतु स्पोर्स के परिपक्व होने पर वह भूरे रंग का हो जाता है, जब ये कटरुआ पूर्ण परिपक्व हो जाते है तब इनकी बाहरी भित्ति एक्सोपेरीडियम पुष्प दलों की तरह फट जाती है और भीतरी अंडाकार गेल्बा पतली झिल्ली नुमा परत जिसे इंडोपेरीडियम कहते है से ढकी रहती है जिनमें स्पोर्स भरे होते है जो समय पर हवा में परकीर्णित होकर नए फंगस मशरूम यानी माईसीलिया तैयार करते हैं जो पतले धागों यानी हाइफी के रूप में धरती व व सड़ी लकड़ियों तथा पेड़ों की जड़ों से जुड़कर सहजीवी जीवन बिताते हैं इन्ही माईसीलिया यानी फंगस प्रजनन कर फिर फ्रूटिंग बॉडी तैयार करते हैं यानी कटरुआ जिसे अंग्रेजी में अर्थस्टार कहते है, तो यह है कहानी कटरुआ की।

उत्तर प्रदेश की तराई जनपदों में साल फारेस्ट में यह खूब मिलती है जून के महीने में, प्री-मानसून बारिश में इस फंगस के माईसीलिया में फलित शरीर यानी फ्रूटिंग बॉडी निर्मित होती है, इसीलिए इसे हमारे अवध क्षेत्र में देवगर्जा भी कहते है कि बादल गरजने से धरती चिट्कती है और यह कटरुआ धरती के बाहर आने लगते है, दरअसल बारिश की शुरुवात में ही यह फ्रूटिंग बॉडी बनती है, तो जंगलों में शाखू के दरख्तों के नीचे की जमीन दरारें दे जाती है जिनमे सफेद सफेद बर्फीले रंग वाले हाइफी यानी माइसीलियम दिखाई देते हैं जो कई मीटरों तक फैले होते हैं, स्थानीय ग्रामीण चिटकी हुई धरती और माइसीलियम के सफेद धागे नुमा जाल को देख कर जान जाते हैं कि यहां अब धरती का सितारा यानी अर्थ स्टार अर्थात कटरुआ उपजने वाला है और लोहे लकड़ी के खुरपा जैसे अवज़ारों से सावधानी से वहां की दरारों से मिट्टी हटाकर अपरिपक्व फ्रूटिंग बॉडी खोद लाते हैं जिन्हें सरसों के तेल प्याज लहसुन और गरम मसालों में भूनकर खाया जाता है, शाखू के जंगलों के आस पास के स्थानीय ग्रामीण इन कटरुआ को सड़क किनारे व स्थानीय बाजारों में बेंचते भी है। एक बात और गौरतलब है कि मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ व झारखंड के इलाकों से ट्रकों भर भर कर यह मशरूम यानि कटरुआ अर्थात पुट पुटा लद कर उत्तर प्रदेश हरियाणा दिल्ली आदि प्रदेशों में आता है, पास से ये ट्रक गुज़र जाए तो सड़े मांस की बदबू आती है, फिर यह आढ़तियों को बेंचा जाता है फिर वहां से दुकानदार खरीदते हैं, सोचिए एक नाजुक सी फंगस मशरूम इन प्रक्रियाओं में चार पांच दिन बाद किस हालत में होगी, सड़ी हुई, और उसके भीतरी हिस्से का सफेद गेल्बा भूरा नही बल्कि सड़ कर काला हो चुका होता है बावजूद इसके रिटेलर्स इसे शहरों के गंदे नालों के कीचड़ में लपेटकर बेंचते है ताकि ताजे लगे, मगर एक बात और हम तराई के समृद्ध शाखू के जंगलों में यह कटरुआ यदा कदा भले कोई ग्रामीण बेंच ले, तर्कों में टनों कटरुआ दूसरे राज्यों में बिके यह बात सवाल जरुर खड़ा करती है कि मध्य भारत के नेशनल ओआर्क रिजर्व फ़ॉरेस्ट जहां सरंक्षित वन क्षेत्र व टाइगर रिजर्व है वहां व्यापारिक तौर पर यह मशरूम पुट पुट यानी कटरुआ व्यापारिक तौर पर जंगल से कैसे निकासी सम्भव है या फिर ये माना जाए जहां नक्सल इलाके वहां सरकार  से आंख बचाकर इस मशरूम का जंगल से व्यापारिक तौर पर दोहन किया जा रहा! है! यदि इनकी कीमत की बात करूं तो कटरुआ 300 रुपए प्रति किलोग्राम से लेकर 2000 रुपए प्रति किलोग्राम तक मे बिकते हैं।

तराई के दुधवा टाइगर रिजर्व व पीलीभीत टाइगर रिजर्व के प्रोटेक्टेड एरिया में आवाजाही पर प्रतिबंध व वन संपदा के निष्कासन पर प्रतिबंध के चलते यह बेहतरीन प्रोटीन व मिनरल्स से युक्त यह मशरूम आदमी को तो न मुहैया हो रहा है परतुं शाखू की जंगलों में उनकी जड़ों के आस पास की धरती से उपजे इस मशरूम को इनके असली हकदार जंगली शाकाहारी जीव फिर चाहे वह वाइल्ड बोर हो या हिरन आदि की प्रजातियां जरूर खा रहे हैं यह एक सुंदर बात है। किंतु रिजर्व व कम्युनिटी फारेस्ट में वहां के आस पास के बाशिंदों को ज़रूर यह फंगस खाने को उपलब्ध रहती है उनके नैतिक या फिर चाहे कानूनी वनाधिकार के तहत, और वह जन जातियां या जंगली इलाकों के अन्य समुदाय सड़कों पर जब राहगीरों को बेंचते हैं यह कटरुआ फंगस तो इसके स्वाद से शहरी आदमी का भी परिचय हो जाता है वर्ष में एक बार एक दो महीने के लिए, क्योंकि भारी वर्षा के बाद यह जुलाई तक खाने की अवस्था मे नही रहते परिपक्व होकर अंडाकार से पुष्प नुमा सरंचना में बदल जाते हैं इनकी फ़टी हुई भित्ति जो सितारों की मानिंद आभा बिखेरती है।

एक और बात ये कटरुआ सहजीविता का संदेश देते हैं और कायिक व लैंगिक प्रजनन की क्षमता के साथ किसी भी हालात में सर्वाइबल का उदाहरण भी जिसे प्रकृति ने इन्हें बख्सा है, बस अफसोस इस बात का है कि भारत के इलाकों में इनकी वैराइटी या उप जातियों पर कोई अध्ययन नही है, अभी भी तमाम शोध पत्र में इसे एक दो सदी पुराने वैज्ञानिक नाम से जाना जाता है यानी जियास्ट्रम और स्पेसीज की जगह एसपीपी का अब्रेबीएशन लगाकर काम ख़त्म! अस्ट्रस जीनस में इसे स्वीकार किया जा चुका है ग्लोबली किन्तु यह एस्ट्रस हाइग्रोमेट्रिकस की भारतीय वैराइटीज कौन कौन है इनका डीएनए स्तर पर लैबोरेट्री परीक्षण कर नई प्रजातियों पर गौर नही किया गया।

कटरुआ के कुछ पुराने वैज्ञानिक नाम भी है जैसे लाइकोपार्डन स्टेलेट्स, जियास्ट्रम हाइग्रोमेट्रिकस, आदि।

तो फिर ये कहानी रही कटरुआ यानी पुट पुट की तो लगिए शाखू के जंगलों के सरंक्षण में और उगाईए सामुदायिक वन, और छोड़िए धरती के वे हिस्से जहां उगता है ये धरती का सितारा, तभी इसके स्वाद और पौष्टिकता से रूबरू हो सकेंगे, नही तो कृषि के नाम पर जहर के इस्तेमाल से विषैली धरती पर यह मशरूम क्या कुछ रोज बाद कुछ भी नही उगेगा, और रह जाएंगी जुबानी कहानियां कुछ लिखी हुई भी और एक सदी बाद कोई बुजुर्ग अपने परिवार गांव के बच्चे को बड़े फक्र से सिर्फ इतना ही सुना पाएगा कि हमने खाएं हैं वे धरती के सितारे उन जगहों में जहां क़भी शाखू के जंगल हुआ करते थे, और उनमें रहते थे बाघ हिरन भालू सियार लोमड़ी और हाथी, और हां बहुत सारी रंग बिरंगी चिड़िया भी!



कृष्ण कुमार मिश्र ऑफ मैनहन
संस्थापक-सम्पादक: दुधवा लाइव जर्नल
सेलुलर: 9451925997
ईमेल: krishna.manhan@gmail.com

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