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International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 30, 2019

कुमायूं के एक किसान ने ईज़ाद कर दी पहाड़ी फलों की तमाम नस्लें





* नैनीताल जनपद के रामगढ़ के गणेश पांडे ने पहाड़ी फलों व सब्जियों की नई नस्लें की ईज़ाद

* पहाड़ के कृषि क्षेत्र में ऐसे किसान बन सकते है आदर्श

* पहाड़ से पलायन को रोकने में गणेश पांडे जैसे अन्वेषी किसान की तकनीकें कर सकती है मदद


पहाड़ में रोजगार को लेकर पलायन की कहानियां अक्सर सुनने को मिलती हैं, कभी पानी का न होना तो कभी बंदर, सुअर आदि जंगली जानवरों से खेती को नुकसान होना आदि बहुत सी समस्यायें सुनने व देखने को मिलती हैं।

इन्हीं समस्याओं के बीच लगभग छियासी साल के श्री गणेश दत्त पांडे जी के द्वारा विभिन्न प्रजातियों के फलों का ये बगीचा तब तैयार किया गया जब लोग सेवानिवृत्ति के बाद आराम की ज़िंदगी गुजारना चाहते हैं। फौज से सेवानिवृत्ति उपरांत उत्तर प्रदेश राज्य सरकार की स्कूटर इंडिया लिमिटेड कंपनी में कार्य करने के बाद पैंसठ वर्ष की अवस्था में लखनऊ से वर्ष 1998 में श्री गणेश दत्त पांडे जी अपने गांव बस गांव, पो० ऑ०- सिमराड़, विकासखण्ड- रामगढ़, जिला नैनीताल वापस लौट आये।

वर्ष 2000 में अपनी डेढ़ एकड़ जमीन में प्रारम्भ में आस-पास की नर्सरियों से फलों की पौधें खरीद कर रोपित की। इसके बाद धीरे-धीरे इन्हीं पौधों से कटिंग व ग्राफ्टिंग के ज़रिये नई पौध तैयार की। वर्तमान में इनके बगीचे में आड़ू की कई प्रजातियां हैं जिनमें रैड जून, पैरा व असाड़ी (पहाड़ी प्रजाति) प्रमुख हैं।

इसी प्रकार सेब की लाल बाईस- L-22, फैनी, डैलीसस, व आमरी आदि प्रजातियां हैं तो वहीं खुबानी की बादामी व गोला, पुलम की सैंटा रोजा व सरसोमा, नाशपाती की जाखनैल, चुसनी, बबूगोसा व काश्मीरी नाशपाती व दाड़िम- अनार आदि अन्य फल भी उपलब्ध हैं।
इस डेढ़ एकड़ के बगीचे में फलों के साथ ही मौसमी सब्जियाँ व दालें आदि भी उगाई जाती हैं।
फलों को दिल्ली व हल्द्वानी की मंडियों में भेजा जाता है व स्थानीय बाजार में भी विपणन किया जाता है।
श्री गणेश दत्त पांडे जी के सुपुत्र श्री राजेश पांडे जी से वार्ता करने पर उन्होंने बताया कि इन सब कार्यों से चार-पांच परिवारों का भी साथ में वर्ष भर रोजगार चल रहा है व सीमित साधनों के कारण डेढ़ से दो लाख तक की शुद्ध आय फलों से व तीस से चालीस हजार तक की शुद्ध आय सब्जियों व दालों से प्राप्त हो जाती है। 
कटिंग व ग्राफ्टिंग से तैयार पौध जरुरतमंद लोगों को कम कीमत पर विक्रय कर इनसे भी आय प्राप्त की जा रही है।

फल प्रसंस्करण की तकनीकी जानकारी न होने के कारण केवल अपने उपयोग हेतु ही प्रसंस्करण कार्य कर जैम, जैली, चटनी आदि बनाई जाती है।


उनके द्वारा कहा गया कि यदि प्रशिक्षण व तकनीकी मार्गदर्शन आदि अन्य सहायता दी जाये तो फल प्रसंस्करण इकाई की स्थापना कर मूल्य संवर्धन के जरिये अधिक आय प्राप्त की जा सकती है।
वर्तमान में खैरना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र से दूरी के चलते ज्यादा सम्पर्क नहीं हो पाता तथा उद्यान विभाग से भी बहुत ज्यादा सहायता नहीं मिल पाती। वर्ष में कभी एक दो बार दवाईयां आदि उद्यान विभाग के द्वारा उपलब्ध करवाई जाती हैं।
श्री गणेश दत्त पांडे जी का इन उन्नीस सालों में स्वयं के द्वारा कार्य करने का जो जमीनी अनुभव है, उसे देखकर उन्हें फलोद्यान विशेषज्ञ की उपमा दी जा सकती है क्योंकि कई ऐसी प्रजातियां हैं जो उन्होंने स्वयं प्रयोग कर तैयार की हुई हैं।

इस उम्र में उनकी चुस्ती, फुर्ती देखकर बेरोजगार युवाओं को प्रेरणा लेनी चाहिये।
यहाँ और अधिक जानकारी के लिए भ्रमण किया जा सकता है व अन्य परियोजनाओं से भी ग्रामीणों को शिक्षण-भ्रमण हेतु लाया जा सकता है।
ऐसे मेहनती लोगों की वजह से ही कई समस्याओं के होते हुए भी पहाड़ अभी ज़िंदा हैं।
मुख्य उद्यान अधिकारी महोदया भावना जोशी जी, यदि विभाग द्वारा फल प्रसंस्करण इकाई की स्थापना हेतु तकनीकी मार्गदर्शन उपलब्ध करवा दिया जाये तो क्षेत्र के अन्य किसानों के लिए भी सहायता उपलब्ध हो सकती है व मूल्य संवर्धन होने से अधिक आय भी प्राप्त हो सकती है, साथ ही फलों को जल्दी खराब होने से भी बचाया जा सकता है।
आदरणीय जिलाधिकारी महोदय नैनीताल सविन बंसल सर से भी अनुरोध है कि ऐसे प्रगतिशील कृषकों को चिन्हित कर सम्मान व अन्य आवश्यक सहायता दी जानी चाहिये जिससे आने वाली युवा पीढ़ी को भी प्रेरणा मिले व पहाड़ की विकट परिस्थितियों में स्वरोजगार कर वे अन्य लोगों के रोजगार की भी व्यवस्था कर पाने में सक्षम हो सकें।

इन सब गतिविधियों को देख यही बात मन में आती है कि-
 "कौन कहता है कि आसमान में सुराख़ नहीं हो सकता,
 एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों...!!!"


ज्योत्सना खत्री : लेखिका देहरादून में रहती है, सामाजिक व वन्य जीवन के क्षेत्र में इनका दो दशक से अधिक का अनुभव है, अल्मोड़ा टिहरी व पौढ़ी के वनों व जन-समुदायों के मध्य राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के साथ कार्यानुभव, अल्मोड़ा में अभी हालिया ही वन विभाग के साथ जायका प्रोजेक्ट में कार्यरत रही, लेखन विशेषकर कविताएं, यायावरी, वन क्षेत्रों व दूर-दराज़ के इलाकों में रह रही कम्युनिटीज में कार्य करने की अभिरुचियाँ। इनसे khatrijyotsana7@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।

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