वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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Aug 22, 2016

ये वृक्ष गाज़ा पट्टी हैं, जहाँ पक्षी हैं शरणार्थी...



जैव-विवधिता के इन अति संवेदनशील जगहों के प्रति कितने संवेदनशील हैं वन्य-जीव प्रेमी ?
इन्दौर रेलवे स्टेशन के बाहर पेड़ो पर सुबह और शाम चीलों तथा सुग्गों( तोता) का विशाल जमघट लगा होता है। इन्हे देखकर आप शायद किसी शरणार्थी शिविर के बारे में सोच सकते है। एक पेड़ पर इनकी संख्या,,घनत्व के लिहाज से गाजा पट्टी से तुलना करने पर विवश करता है।
मानवीय हलचल वाले क्षेत्र में इतनी संख्या में इन्हे देखना,,, आश्चर्य में डाल देता है। हो सकता है ज्यादातर पक्षी प्रेमी अंग्रेजो ने इस बात का ख्याल नही रखा होगा की,,आज जहाँ पटरी बिछाने जा रहे हैं,,,वो इनके इलाके हैं ।ये स्टेशन बनने तथा अन्य विकास से भविष्य में अपने ही इलाके में शरणार्थी बन सकते हैं।
ये सिर्फ पेड़ नही है,,,बल्कि एक शरणार्थी शिविर है,,,अगर गलती से कभी कट गए,,तो हम सोच नही सकते कितना दु:खद परिणाम,,इन परिंदो के साथ होगा। अवास विनाश( Habitat loss) का कितना व्यापक प्रभाव इन परिंदो के वंश पर पड़ेगा,,,हम कतई सोच नही सकते। विकास के नाम पर इन पेड़ो के कटाई के बाद विस्थापन का कितना मार इन पक्षियों को झेलना पड़ेगा,,,कल्पना करना मुश्किल है।
जंगल में ऊँचे पेड़ो पर अनेकों शिकारी पक्षी का नजर आना आम बात है। फाल्गुन में पलाश( टेशु/ ढाक) के पेड़ पर छोटे पक्षियों का मजमा आम बात है,,,इसी तरह सीमर के पेड़ पर फूल आने के बाद वह हर वर्ग के परिंदो के लिए क्लब बन जाता है। परन्तु स्टेशन के चिल्लम- पौं से दुर यह सामान्य लगता है।
ब्रज( मथुरा- आगरा एंव आस-पास) में भी इतने मोर किसी एक पेड़ या घर पर नजर नही आते हैं,,,जबकि वहाँ मोर घरेलू पक्षी के जैसा है। कौआ,,मैना से ज्यादा मोर नजर आता है।
इन पेड़ो का महत्व तो आखिरी उम्मीद,,,आवास के जैसा हो चला है। इन्हे तो अब विरासत वृक्ष ( Heritage tree) घोषित कर देना चाहिए,,इनके महत्व के कारण ।
अरावली में थोड़ा सा भी उत्खन्न होता है,,,कहीं कुदाल- फावड़ा चलता है तो दिल्ली- NCR के हरित सिपाही( पर्यावरण प्रेमी) तन जाते हैं,,, अखबारों में खबरें आने लगती है । हरित न्यायालय का डंडा भूमाफिया,,,ठेकेदारों,,,, निर्माणकर्ताओं पर चलने लगता है। जबकि वहाँ पक्षियों से भी छोटे जीवों ,,,कीटों,,,चूहों,,, तितलियों,,तथा अन्य सरीसृपों एंव झाड़ियों का वास्ता होता है। एक तरह के कार्बन सिंक एंव जैवविविधता हावी होता है।
इंदौर रेलवे प्रशासन को रेलवे के हरित अभियान के तहत या अपने दरियादिली के नाते इन वृक्षों के समीप ही,,उसी प्रजाती के नए वृक्ष लगा दें,,,ताकि भविष्य में इनकी बढती संख्या के बोझ को उठा सके। स्टेशन पर हरियाली भी बढेगा,,, मुसाफिरों के लिए भी भीषण गर्मी में आश्रय होगा,,, वैश्विक तापन के निवारण में भी एक छोटा कदम होगा।



आज जहाँ ये पेड़ है वहाँ न पटरी है,,न रेलवे भवन,,,बल्कि आस- पास छोटी गाड़ियाँ,,अाटो खड़े नजर आते हैं,,, इसलिए किसी विकास परियोजना को भी बाधित नही कर सकता है।
अब समय इंदौर के निवासियों के लिए है की वो इन नन्हें जीवों के लिए क्या कर सकते है। वर्षो से देखते होगें,,गुजर जाते होगें,, कुछ समय के लिए रोमांच, फिर अपनी राह। पक्षियों का कोई नागरिक समाज( Civil society) और दवाब समूह( Pressure Group) नही हो सकता जो पक्षीहित याचिका( जनहित याचिका) दायर करे या अदालत में अर्ज दाखिल करे,,और,,रेल प्रशासन को इस तरह संवेदनशील कर सके।
बिना आपके साकारात्मक दखल के बेहतर परिणाम का उम्मीद संभव नही है। पक्षियों के पास दाव पर लगाने के लिए कुछ भी नही है,,,सिवाय बेदखली है। इसी इंदौर रेलवे स्टेशन पर मध्य- प्रदेश शासन वन विभाग द्वार प्लेटफार्म न०-1पर मुसाफिरों से अपील किया गया है कि " वन प्राणियों की सुरक्षा करें और इनाम पाए" वहाँ गुप्त सूचना देने और उसके नाम की गोपनीयता तक का बात कहा गया है।
पेड़ जरूर नागरिक क्षेत्र( Civil area) में है,,,पर पक्षियों का क्या उड़कर जंगल के तरफ भी जा सकते हैं,,,वापस उसी पेड़ पर आशियाना। अगर यह पेड़ वन में होता और इनके जीवन को खतरा होता,,,,कोई माँस ,,चमड़ा या अन्य उद्देश्य के लिए पकड़ता तो क्या वन विभाग के अधिकारी नही कार्यवाई करते।
सलमान खान पर जिन चिंकारा के शिकार का आरोप है,,वो भी वन में नही बल्कि मानवीय रिहायशी क्षेत्र में रहते हैं। पर वे उन कानून में आते हैं,,जिनमें दंड का प्रावधान है।
वन जीव अधिनियम- 1972 के प्रावधान में भी,,तोता का उल्लेख है ,,चील तो बाहर होगा नही। शायद बहुत से लोग इस बात से अंजान होगें की भारत में तोता को भी घर में पाल नही सकते हैं,,पिंजरे में डाल नही सकते हैं,,,यह भी कानूनन अपराध है।
निश्चित रूप से यह क्षेत्राधिकार के अतिक्रमण का मामला लग सकता है । राज्य सरकार( वन विभाग) ,, केन्द्र सरकार( रेल मंत्रालय) के समन्वय और पर्यावरण प्रेमी के स्नेहक की भूमिका से शीघ्रता से इनके भविष्य को सुरक्षित किया जा सकता है।
ऐसा दृश्य मालवा में सिर्फ इंदौर का ही नही है,,बल्कि उज्जैन तथा कई अन्य जगहों, पर भी है। वास्तव में देश के कई रेलवे स्टेशनों पर हम इन स्थितिओं से दो चार होते हैं।
यह केवल संयोग है की,,,सारे फोटो इन्दौर रेलवे स्टेशन से जुड़े है। खाली दिमाग शैतान का होता है,,,अब मानना मुश्किल हो रहा है,,, क्योंकि सारे फोटो खाली समय में लिया गया है,,,रेल के इंतजार में ।
अब अगर इन पर हम कोई पहल न करें तो। जब जब पेड़ कटेगें,, स्टेशन के पास बैठे पक्षी यही गाते नजर आ सकते हैं।

परदेशिओं से न अँखियां मिलना,,,,परदेशिओं को है एक दिन जाना।
सच ही कहा है पंक्षी इनको ,,रात को ठहरे तो उड़ जाए दिन को

आज यहाँ तो कल वहाँ है ठिकाना ।

प्यार से अपने ये नही होते,,,ये पत्थर है,,ये नही रोते।

इनके लिए न आँसू बहाना।


गौतम कुमार सिंह "ललित विजय" ( लेखक दक्षिण एशिया के मसायल के शोधार्थी है, भूगोल, रसायन व् पत्रकारिता जैसे विषयों से गहरा नाता, वन्य जीवन का अध्ययन व् यायावरी  इनके प्रमुख शौक हैं, फिलवक्त भारतीय सिविल सर्विसेज की तैयारी, दिल्ली में निवास, इनसे gautam_chemistry@rediffmail.com पर संपर्क कर सकते हैं 

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