वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Feb 27, 2014

बाघ तेंदुआ और आदमी दरिंदा कौन?

कहीं ऐसा न हो की जंगल से निकले इन जानवरों को  दुर्दान्तता से क़त्ल कर दे आदमी।
खमरिया-खीरी। रमेश मिश्र

खीरी में तराई बेल्ट से पश्चिम में मेरठ और पीलीभीत तक बाघ और तेंदुए का आतंक फैला हुआ है। ऐसे ही आतंक का माहौल धौरहरा में भी साल 2007 और 2008 में बना था। जब जंगल से निकल कर धौरहरा इलाके में आए बाघ और तेंदुए के आतंक के चलते किसानों/मजदूरों ने खेत जाना बंद कर दिया था और स्कूलों में छुट्टी हो गई थी। तब आधी अधूरी तैयारियों के साथ वहशी जानवर को काबू करने के लिए आई वन विभाग टीम देखती रह गई थी और आदमखोर बन चुके इस जंगली जानवर ने पांच इंसानी जिंदगियों समेत दर्जन भर से ज्यादा मवेशियों की जिंदगी खत्म कर दी थी। उस दौरान धौरहरा में तेंदुए ने एक दर्जन से ज्यादा लोगों को जख्मी भी किया था। वन विभाग के विशेषज्ञ मौके पर मिलने वाले पगमार्क देख कर पहले इलाके में बाघ की मौजूदगी का दावा कर रहे थे। मगर उनके दावों की पोल तब खुली जब ईसानगर के बेलाहार में पूरे दिन प्रशासन को हलकान करने के वाले तेंदुए को गांव वालों ने एक ग्रामीण के घर में मारकर जला दिया था।
27 दिसम्बर 2007 से आठ मई 2008 तक धौरहरा इलाके में आतंक फैलाने वाले जंगली जानवर को काबू करने में वन विभाग और वन्य जंतु विशेषज्ञ जिस तरह नाकाम हो रहे थे। उससे उनकी कार्य प्रणाली पर सवालिया निशान उठने लगे थे। यह लोगों के आक्रोश का ही नतीजा था कि ग्रमीणों ने खमरिया कस्बे के पास बहा नाले पर वन विभाग के लागों को घेर लिया था और नौबत मारा मारी तक आ गई थी। उस समय कुछ स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से मामला वक्ती तौर पर शांत हो गया था। मगर इसका असर बेलाहार में तेंदुए की घेराबंदी के दौरान सामने आ गया। जब एक खास इशारे पर मारपीट हो गई थी। इस मामले में वन क्षेत्राधिकारी धौरहरा समेत इलाके के कई मोअज्जिज़ लोगों पर मुकदमा भी दर्ज हुआ था। बाद में जब ग्रामीणों ने तेंदुए को मार गिराने के बाद जला डाला तब वन विभाग और पुलिस का परा बंदोबस्त धरा रह गया था। तेंदुए को मार कर जलाने के मामले में वन विभाग ने करीब 100 लोगों पर मुकदमा दर्ज कराया था।

फैक्ट फाइल

* 27 दिसम्बर 2007 धौरहरा में पहली बार तेंदुए की सरसवा गांव में आमद दर्ज की गई। जहां तेंदुए ने राजेंद्र की गाय को मार डाला। इसके बाद करीब एक महीने तक तेंदुए की कोई हलचल सामने नहीं आई। वन विभाग ने तेंदुए के जंगल वापस लौट जाने का दावा किया।

* 27/28 जनवरी 2008 को तेंदुए ने ईसानगर के सेमरहना गांव में 12 वर्षीय केशव को अपना शिकार बनाया। छात्र केशव की मौत के बाद वन विभाग ने जहां तहां पिंजड़े लगवा कर तेंदुए को पकड़ने का प्रयास किया। मगर तेंदुआ पिंजड़ों के नजदीक नहीं फटका।

* 01 अप्रैल 2008 को तेंदुए ने बैचरी गांव में उपेंद्र (14) को जख्मी कर दिया। इसके बाद हरकत में आए वन विभाग ने दुधवा नेशनल पार्क से दो हांथी मंगवा कर तेंदुए को ट्रैंकुलाइज़ करने का अभियान शुरू किया। इसके लिए लखनऊ चिड़िया घर के डा.उत्कर्ष शुक्ला को विशेष तौर पर बुलाया गया था। 

* 23/24 अप्रैल की शाम चौंरा गांव के पास तेंदुए ने राजापुर दुलही गांव की रहने वाली रामदेवी (30) को उस वक्त मार डाला। जब उसका रिश्तेदार उसे मायके से विदा करवा कर ससुराल छोड़ने जा रहा था। उस वक्त रामदेवी की गोद में एक साल का बच्चा भी था। जिसे उसके साथी रिश्तेदार ने तेंदुए से भिड़कर किसी तरह बचा लिया था।

* 25 अप्रैल को वन विभाग ने ऑपरेशन लैपर्ड शुरू किया। डीएफओ खीरी नार्थ केके सिंह,डीएफओ कर्तनिया घाट रमेश चंद्र,रेंजर धौरहरा रेंजर संत कुमार तिवारी,लखनऊ चिड़िया घर के डा.उत्कर्ष शुक्ला और वन्य जंतु विशेषज्ञ डा.वीपी सिंह व केके मिश्रा के साथ वन विभाग की टीम एक सप्ताह तक चौंरा और उसके आस पास डेरा डाले रही। मगर तेंदुए की झलक तक नहीं मिली।

* 03/04 मई की रात चौंरा इलाके से करीब 15 किलोमीटर दूर रेहुआ गांव में आदमखोर तेंदुआ 65 साल की फूल कुमारी को उस वक्त मार कर खा गया। जब वे अपने घर के बाहर सो रही थीं। इसके बाद वन विभाग की टीम लगातार तेंदुए का पीछा करती रही। मगर उसके पास पहुंचने में नाकाम रही।

* 06 मई 2008 को खमरिया कस्बे से बाहर बहने वाले बहा नाले के पास तेंदुए की लोकेशन ट्रैस की गई। वन विभाग ने पूरे लाव लश्कर के साथ घेराबंदी की। तेंदुए ने यहां भी झाड़ी से बाहर निकल कर खमरिया कस्बे के रहने वाले संतराम भार्गव व नउवन पुरवा के राम पाल को जख्मी कर दिया और गुम हो गए। यहां मौजूद हजारों लोगों की भीड़ वन विभाग का रवैया देख भड़क गई। ग्रामीणों और प्रशासन के बीच एकबारगी टकराव की नौबत आ गई थी। मगर एक स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप से किसी तरह विवाद शांत हो गया था।


* 08 मई 2008 को ईसानगर थाना क्षेत्र के ढखिनिया गांव के बाहर एक आम की बाग में छिपकर बैठे तेंदुए ने इसी गांव के राम गोेपाल मिश्रा,उमेश कुमार व हरी शंकर को बुरी तरह जख्मी कर दिया। यहां से भाग कर तेंदुआ पड़ोस के बेलाहार में छिप कर बैठ गया। जहां वन विभाग ने एक बार फिर तेंदुए की घेराबंदी की। पूरा दिन वन विभाग यहां ड्रामे बाजी करता रहा। इसी बीच एक अधिकारी के इशारे दपर बेलाहार में कुछ लोग पीट दिए गए। बाद में तेंदुए को पकड़ पाने में नाकाम हो रहे वन विभाग के लोगों के प्रति ग्रामीणों का अक्रोश बढ़ने लगा। इसी बीच तेंदुआ झाड़ियों से निकल कर गांव में घुस गया। जहां तेंदुए ने सिसैया के उमाशंकर और बेलाहार के तेजपाल को जख्मी करता हुआ रामदुलारे के घर में घुसकर बैठ गया। यह सब देख गांव वालों ने वहां मौजूद अधिकारियों को दौड़ा लिया। इधर अफसर और पुलिस वाले अपनी गाड़ियां लेकर भागे। उधर ग्रामीणों ने दुलारे के घर में छिपे तेंदुए को पीट पीट कर मौत के घट उतार दिया। आक्रोशित गांव वालों ने दुलारे के घर के पास खाली पड़े प्लाट में मिट्टी का तेल डाल कर तेंदुए को जलाकर इलाके भर में फैले आतंक को खत्म कर डाला।

* 27 दिसम्बर 2008 को ठीक एक साल बाद धौरहरा रेंज में एक बार फिर बाघ और तेंदुए की आमद दर्ज की गई। धौरहरा रेंज की मटेरा बीट में प्रताप पुर जंगल में बाघ और तेंदुए के टकराव में बाघ ने तेंदुए को मार डाा। वन विभाग ने उस वक्त कहा था कि एक मादा बाघिन अपने दो बच्चों के साथ प्रताप पुर जंगल में आ गई है। सम्भावना जताई गई थी कि बाघिन कर्तनिया जंगल से यहां पहुंची है।

* 26 दिसम्बर 2011 को एक बार फिर प्रतापुर जंगल में बाघ की मौजूदगी नोट की गई। जहां जंगल में लकड़ियां बीनने गई मैकिन (65) को बाघ ने मार डाला। हालांकि इस घटना के बाद से धौरहरा में जंगली जानवरों की मौजूदगी नहीं पाई गई है। मगर पिछले अनुभवों को याद कर लोगों के दिल आज भी दहल जाते हैं।


रमेश मिश्र (हिंदुस्तान अखबार में पत्रकारिता, एक दशक से अधिक समय से शारदा और घाघरा जैसी विशाल नदियों के मध्य क्षेत्रों में इंसान और जानवर की कहानी बड़ी ख़ूबसूरती से बयां करते रहे है, इनसे  rameshmishra.khamaria@gmail.com पर संपर्क कर सकते है )



1 comment:

  1. जानवरों के रहने के स्थान पर झाब मनुषय अपना कब्ज़ा किये जा रहें हैं , तो वे बेचारे कहाँ जाएँ.यह तो हमारे ही सोचने kii बात है कि हम उनके लिए जंगल को बने रहने दें दिन बी दिन कटते जंगल अब उन जंगली जानवरों के लिए खतरा बन गए हैं.इंसान वही तक सीमित न रह कर उनका शिकार कर उनके अस्तित्व को ही समाप्त करने पर उतारू है. ऐसे में जानवरों का क्या दोष.

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