वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Dec 30, 2011

रो्टी- एक कथा


रोटी..............


    छोटे-छोटे बच्चों की उस बहुत बडी सी खुशी का कोई ठिकाना नहीं है कि जब पूरे मुहल्ले की वफादार और चहेती “हीरोइन” ने उस सर्द शाम में प्यारे-प्यारे पांच पिल्लों को जन्म दिया है। हैरान न हों “हीरोइन” उसके प्यार का नाम है ! जिसे वो बखुबी जानती है। वाकई ! वो है हीरोइन ही। एकदम साफ सुथरी, प्यारी और शाकाहारी। पूरे मुहल्ले की तवज्जो उस पर मेहरबान है, जिस घर जाती, पुचकायी जाती, खिलाई जाती, पिलाई जाती है।

    आज वो माँ बनी, अपने नन्हें मुन्नों को चाट रही है। उसकी पूंछ आज बेहिसाब खुशी से गद्गद् एक जगह टिक ही नहीं पा रही है। बच्चों का तांता लगा है उसे अजवाइन की चाय पिलाने के लिए वो उसके बच्चों के नाम दे रहे और झगड रहे हैं यह कहकर कि “नहीं वो काले वाला मेरा है, मैं पहले आया था, मैंने उसे पहले देखा”।

20 दिसम्बर, 1999

    “हीरोइन” बहुत खुश है, उसके बच्चे बडे हो रहे हैं, उनकी आँखे खुलनी शुरू हो गई हैं। वो उन्हें अपने मुंह में दबोच कर धूंप सेंकने के लिए लेकर जाती है। बडे ताज्जुब की बात है कि उसके जिस जबडे से गांव के बडे-बडे समजातीय सूरमा खौप खाते थे, उन्हीं में जकडे वो नन्हें गोलू-मोलू चीं तक नही कर रहे।

2 फरवरी, 2000

    अब छिटकु-पिटकू के पेट के साथ-साथ भूख भी बढने लगी है। वो मां की गंद पाते ही, क्यारें, नालें, गलियां और सडके कूद फांदकर उसके पीछे दौडते हैं। सडको पर सरपट दौडती बैल बग्गी, साईकिलें और ट्रेक्टर उन्हें देख रूक जाते हैं। नालों में गले तक धंसने के बावजूद जब वो पूरे जोर लगाकर बाहर निकलते हैं और पूरे शरीर को झटककर फिर पूरे जोश से दौडते हैं, बडे ही हसीन लगते हैं। मां जैसे ही उनके हाथ लगती है, आत्म समर्पण कर देती है, पर वो जान गई है कि उनकी बढती उम्र के साथ ही साथ स्तनों में दूध भी कम पड रहा है।

14 अप्रैल, 2000

    “हीरोइन” बहुत खुश है, मैं जानता हूँ, पर फिर भी वो अपने नाम की रोटी बच्चों को खाने देगी। वो सिर्फ उन्हें दुलारती रहेगी, चुमकारती रहेगी, दूसरो की बूरी नजरों से बचाने के लिए उनकी अंगरक्षक बन जायेगी, और उन्हें लम्बी उम्र की दुआएं देती-देती ही सो जायेगी, मैं जानता हूँ।

29 अक्टूबर, 2000

    “हीरोइन” निश्चित है, अब उसके बच्चे बडे हो चुके हैं। उन्हें अपने-अपने मेहरबान मिल गये हैं, वो जानती है कि खुद तो कहीं भी पेट भर लेगी, उसको प्यार करने वालो की कोई कमी नहीं है, जरूरत तो उसके बच्चो को है। लेकिन यह सोच उस वक्त गलत फहमी में बदल गई जब उसी के पुराने मालिकों ने घर से उसे यह कहकर खदेड दिया कि अभी-अभी तो इसके बच्चों को रोटी दी थी, अभी कहीं से ये भी आ धमकी। वो वहाँ से बाहर निकली और वापस मुडकर सिर्फ एक बार अपनी नम आंखों से अपनी मालकिन को देखा और वहां से चली गयी। इस वक्त वो मन्दिर के आंगन में अपने अगले पैरों पर मुंह टिकाये एकाएक किसी गहरे चिन्तन में डूबी सी नजर आ रही है। उसकी आंखों में आंसू भी आएंगे यह मै नहीं जानता था।

09 मई, 2001

    “हीरोइन” गलियों में जब किसी अपने के पास से गुजरती है तो बाद में अफसोस भरी नजरों से वापस मुडकर देखती जरूर है कि क्या किसी ने मुझे देखा, या कोई टिप्पणी की ! पर नहीं हीरोइन अब वैसा नही हो रहा है, ये इन्सान हैं जो अपनो तक से बहुत जल्दी बोर हो जाते हैं, तुम्हारी नटखटी शरारतें अब उनका ध्यान आकर्षण नही करती बल्कि उल्टा उन्हें उससे परेशानी महसूस होने लगी है।

10 जून, 2001

    “हीरोइन” कईं दिनों से भूखी है, मैं घर पर ही हूँ, उसे रोटियां खिला रहा हूँ, वो रोटियां उठाकर खुले आंगन की तरफ जा रही है, मुझे उसे अपने सामने खाना खाते देख खुशी होती, पर वो शायद ऐसा नही चाहती इसीलिए जा रही है। तो ठीक है, मैं भी अपना होमवर्क कर रहा था। मैं जा रहा हूँ। लेकिन अगले ही पल उसकी करूण पुकार मुझे सुनाई दे रही है। मैं दौडकर बाहर आया हूँ और देख रहा हूँ कि उसी के तीन बेटे उसको घायल कर उसकी रोटियां छिन कर ले जा रहे हैं।

    वो आज पहली बार घायल हुई, पहली बार वो मारे दर्द के चींखी और पहली बार वो किसी नाले में पडी असहाय महसूस कर रही है, मेरे पास सिर्फ एक ही रास्ता है कि मैं नाले में अन्दर हाथ डालकर सबसे पहले उसकी कमर को सहारा देते हुए बाहर निकालूं, पर क्या वो उस इन्सान को थोडा भी को-आॅपरेट करेगी जिसे वो आज से पहले सिर्फ पहचानती थी, जानती नही थी।

01 जौलाई, 2001

    “हीरोइन” को ठीक होता देख खुशी हो रही है, कि मेरी डाॅक्टरी रंग तो ला रही है, थोडी शक्ल-सूरत बिगड गई है, बट नाॅट बैड। वो आती है, मुझसे हाथ मिलाती है, रोटी का टुकडा हवा में उछलकर पकडती है, सीधी खडी होकर चलती है, मेरी गाय के बछडे के साथ खेलती है। मैं उसके बेटों को खदेडकर जब उसकी तरफ देखता हूँ तो वो भौहें उठाकर गौर से मुझे देख रही होती है, पर मैं मुस्कुरा उठता हूँ यह जानकर कि वो नाराज नहीं है।

    सबसे अच्छी बात है कि वो अपना बडा घर छोडकर मेरे छोटे से घर में भी खुश है और उसे कभी गन्दा भी नही करती। अरे हाँ ! अब मुझे काली बिल्ली का भी डर नही जो अक्सर मेरा दूध धरती पर गिराने के बाद पीती थी, और घर का कोई-न-कोई कौना गन्दा कर जाती थी। थैंक यू “हीरोइन”। मैं कल से कालेज जाना शुरू कर रहा हूँ, अपना ख्याल रखना।

15 जौलाई, 2001

    तुम रोज सडक क्रोस करके मन्दिर के आंगन में जाती हो, तुम्हें नही लगता के ये तुम्हारा मुझे सी-आॅफ करने का बहाना है ! तुम बडी हो मेरी साईकिल पर नही आ पाओगी और काॅलेज में कोई तुम्हें आने भी नही देगा। मैं जानता हूँ तुम समझदार हो, तुम हमारी भावनाओं को समझती हो, वरना आज तुम मेरा खोया हुआ जूता ठीक उसी वक्त कैसे खोज लाती कि जिस वक्त मैं खुद उसे ढूंढ रहा था। जिस वक्त तुम पूंछ हिलाती हुई और मुंह में दबाये मेरा जूता लाकर मेरे सामने खडी हुई, मुझे वो पल याद आ गया जब तुम अपने बच्चों को ऐसे ही उठाती थी। तुम्हे शायद नही पता पर मैं तुम्हे देखा करता था। बाॅय अपना ख्याल रखना।

16 जौलाई, 2001

    पता है भगवान पूरे काॅलेज में मेरा कोई दोस्त नही, जिससे मैं कुछ भी शेयर कर सकूं। मेरे बचपन के दोस्त शहरों में जाकर बस गये हैं। मेरा सबसे अच्छा दोस्त, मेरा भाई भी अपनी पढाई पूरी करने के लिए शहर चला गया। शायद तुम्हे अच्छा नही लगता कि मैं तुम्हारे अलावा किसी और से भी बाते करूँ। पता है भगवान। मैं “हीरोइन” को अभी खोना नही चाहता था, लेकिन आज उसी के बच्चों ने सिर्फ एक रोटी के लिए बडी लडाई में उसको इस बेरहमी से फाड डाला कि उसकी सांसें मेरे आने का इंतजार तक नही कर पायी। तुम्हे पता है भगवान। उसकी आँखे खुली थी। उसने आखरी दम तक मेरी राह तो तकी होगी। उसे पता था कि मैं उसे बचा लूँगा, लेकिन इसलिए नही कि वो जीना चाहती थी या उसने और ज्यादा जीने की प्रबल इच्छा थी ! नहीं ! बल्कि इसलिए क्योंकि शायद वो जानती थी कि मुझे उसके बाद बहुत दुःख होगा।

    तुमने धोखा दिया है उसको। वो रोज तुम्हारे आंगन में आकर बैठती थी। वो तुम्हारी मन्त्र प्रणाली भले ही नही जानती थी, पर मै जानता हूँ तुम्हारा आवाह्नन करती थी वो। तुमने ये रोटी चीज ही बहुत बुरी बनाई है, इसने अपनों को अपना ना रहने दिया। तुमने धोखा दिया है उसको।



अंकुर दत्त (लेखक मूलत: सहारनपुर जनपद उत्तर प्रदेश के निवासी है, मौजूदा वक्त में दिल्ली में निवास, वन्य जीवन एवं इतिहास में गहरी दिलचस्पी, भावनात्मक मसलों को कागज पर कलम और ब्रश से उतार लेने के हुनर में माहिर, इनसे ankurdutt@ymail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं।)




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