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International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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Apr 20, 2011

ढाक के तीन पात: बस कहावत ही जिन्दा रह जायेगी !


पलाश: © कृष्ण कुमार मिश्र
पलाश के फ़ूल !
(Butea monosperma)


(और भी है नाम- टेसू, झूला, ढाक-Bastard Teak, Parrot Tree


कुदरत के करिश्मों की फ़ेहरिस्त में एक खूबसूरत पुष्प जो खिलता है तो मानों आग सी लगी हो..हाँ मैं बात कर रहा हूं ढाक के तीन पात की यह कहावत उत्तर भारत के ग्रामीण अंचल में खूब प्रचलित है, ढाक, टेसू, झूला और पलाश यह एक ही वृक्ष के नाम है, जिसके मोटे व क्लोरोफ़िल से लबालब भरे हुए गहरे हरे पत्ते एक छतरीनुमा शक्ल में ढलते है और वृक्ष एक शीतल छतरी में तब्दील हो जाया करते है, किन्तु जब वक्त आता है पुष्प खिलने का यानि किसी भी जीव का सबसे बेहतरीन वक्त..जब वह अपनी प्रजाति के वजूद को मुस्तकिल करता है इस ग्रह पर यानी प्रजनन की वह प्रक्रिया जो फ़ूल खिलाती है...तब यह वृक्ष पूर्ण नग्न हो जाता है सारे मोटे व चैड़े पत्ते धराशाही हो जाते है बचती है सिर्फ़ सूखी सी दिखने वाली ऊबड़-खाबड़ काली-काली टहनियां और इन पर खिलते है लाल-लाल पुष्पों के अन-गिनत गुच्छे....इन बद-रंग टहनियों में खिले ये लाल सुर्ख रसीले पुष्प एक अलग ही आभा लिए होते है..यह है प्रकृति की सजीव पेन्टिंग जिसमें इस कला के सभी बेहतरीन तरीके खुद-बुद इस्तेमाल होते है, या यूँ कह ले की आलरेडी प्रोग्राम्ड होते है!


तो यह मजमून था पलाश (Butea monosperma) का जिसका नाम ब्यूटिया मोनोस्पर्मा है, यह Fabaceae परिवार का सदस्य है। ब्यूटिया नाम ग्रेट ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री  (26 May 1762 – 8 April 1763) John Stuart, 3rd Earl of Bute के नाम पर पड़ा ब्यूट स्कॉटलैंड का छोटा द्वीप है, जॉन स्टूआर्ट नेचुरलिस्ट भी थे और अवकाश प्राप्ति के बाद उन्होंने अपना जीवन वनस्पति विज्ञान को समर्पित कर दिया, इनके नाम पर एक जीनस का नाम रखा गया जिसे Stuartia कहते है, इसके अन्तर्गत Theaceae कुल के पुष्प वाले पौधे आते है, यह कुल  की वनस्पति एशिया में पायी जाती है।


पलाश भारतीय उप-महाद्वीप एंव दक्षिण-पूर्व एशिया में पाया जाता है। जिसमें विभिन्न देश शामिल है- वियतनाम, थाईलैंड, क्म्बोडिया, मलेशिया, लाओस, नेपाल, म्यांमार, बांग्लादेश, भारत, श्रीलंका, पाकिस्तान में पलाश मौजूद है। यह प्रजाति इस भू-भाग की देशी प्रजाति है। 


धीमी रफ़्तार से वृद्धि करने वाला यह वृक्ष १५ मीटर तक लम्बाई में बढ़ सकता है, इसकी लकड़ी पानी के भीतर खराब नही होती, इसलिए इसका इस्तेमाल कुएं बनाने में उसकी नीवं में रखी जाने वाली नेवार (गोलाकार लकड़ी की नींव) में किया जाता रहा, यह वृक्ष प्राकृतिक रूप से लाख का बेहतरीन उत्पादक है, क्योंकि लाख का कीड़ा अपना जीवन चक्र इस वृक्ष पर पूरा करता है। चारकोल का निर्माण भी पलाश के वृक्ष से होता है, होली के त्योहार में पलाश यानी टेसू के पुष्पॊ से ही प्राकृतिक लाल रंग प्राप्त किया जाता था।


पलाश का खिलना और होली का रंग-


खीरी जनपद में कई वर्षों के अध्ययन में मैने पाया कि यह वृक्ष मार्च के प्रथम सप्ताह में पुष्पित होता है, और अप्रैल के प्रथम सप्ताह तक फ़ूल खिलने की प्रक्रिया चलती है, जनपद के कई भू-भागों में १०-१५ दिन के अन्तर में पुष्पन होता, फ़ूल खिलने की पक्रिया वृक्ष की आयु व वातावरण एंव आनुवशिंक कारणों से प्रभावित होती है। होली का त्योहार भी इसी माह की किसी तारीख में पड़ता है, पलाश के प्राकृतिक रंग और उनके खिलने का वक्त और होली के रंग की यह तुकबन्दी हमारे पूर्वजों ने खूब की।


रविन्द्र नाथ टैगोर को पलाश अति-प्रिय थे, और उन्होंने शान्तिनिकेतन में पलाश के वृक्षों का सरंक्षण किया। उनकी कविताओं में भी इस पुष्प का वर्णन मिलता है।


प्लासी का युद्ध तो आप सभी को मालूम होगा, हाँ यह जगह बंगाल के नादिया जनपद में भागीरथी नदी के किनारे एक छोटे से गाँव का नाम है, जो बंगाली में पोलाश (टेसू) के ही  नाम पर इस गांव का नाम पलाशी (प्लासी) पड़ा।


समुदायों के जीवन यापन का जरिया था पलाश-
उत्तर भारत के गंगा-गोमती के मैदानी क्षेत्रों में पलाश के जंगलों की बहुतायात थी, शाखू के जंगलों से आच्छादित खीरी जनपद में गावों के मध्य परती भूमियों पर मीलों पलाश के जंगल हुआ करते थे। कालान्तर में प्राकृतिक जंगलों के विनाश के बाद सागौन आदि के प्लान्टेशन ने पलाश को जंगलों से बाहर खदेड़ दिया, और ग्रामीणों ने खेती के लिए जमीनों का इस्तेमाल करने के लिए इसे गांवो से बाहर कर दिया, नतीजतन अब कही-कही सड़कों के किनारे या बची हुई परती भूमियों पर यह वृक्ष दिखाई दे जाते है, यह हाल सिर्फ़ तराई के खीरी जनपद का ही नही बल्कि पूरे अवध क्षेत्र के अलावा उत्तर भारत में लोगों ने इस खूबसूरत पुष्प वाले वृक्ष का सफ़ाया कर डाला है। याद रहे यह वृक्ष पूरे के पूरे समुदायों के जीवन यापन का जरिया भी हुआ करता था, इसके पत्तों से समारोहों में भोजन के लिए प्लेटे तैयार की जाती थी, वृक्ष से चमड़े का कार्य करने वाले टेनिन और रंगीन लाख जैसी बहुमूल्य वस्तु के निकालने का कार्य, चारकोल उत्पादन में   
कार्यरत लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हुई।  


धार्मिक रीति-रिवाजों में पलाश-


यज्ञ्योपवीत से लेकर विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना में प्रयुक्त होता है पलाश, जनेऊ संस्कार में पलाश की तीन-पत्तो सहित टहनी को हाथ में लेकर यह संस्कार वेद-मन्त्रों द्वारा पूरा किया जाता है। स्वामी जगन्नाथ की अप्रैल के महीने में होने वाली पूजा में पलाश के पुष्पों की अनिवार्यता है, साथ ही शिव-पूजा में भी पलाश के पुष्पों की महिमा वर्णित है धार्मिक पुस्तकों और व्याख्यानों में।


औषधीय महत्व- पेट संबधी बीमारियों में उपयोगी।


..कुछ ऐसे उजड़े पक्षियों का नशेमन-


पलाश के पुराने वृक्षों में तमाम खोहें बन जाती है, जिनमें पक्षी अपने घोसले बनाते है, खासतौर से उत्तर भारत के तराई जनपदों में तोतों की कई प्रजातियों की बहुतायात थी, कारण साफ़ था कि उनका बसेरा इन पलास के जंगलों में हुआ करता था, और उनके घोसलों के लिये बेहतरीन जगह देते थे ये पलाश के बूढ़े वृक्ष। किन्तु अब जनसख्या वृद्धि के साथ साथ इन्सान के बहसीपन ने इन जंगलों को उजाड़ कर अपने खेत बना डाले ...और इसी के साथ उजड़ गये इन खूबसूरत परिन्दों के घरौन्दें। तोतों के अतिरिक्त वे सभी चिड़ियों की प्रजातियां प्रभावित हुई जिनकी वृत्ति में पेड़ की खोह(Tree hole) में घोसले बनाना शामिल है..कहते है किसी को नष्ट करना हो तो तो उसका घर ही उजाड़ दो..कुछ ऐसा ही हो रहा इस ग्रह पर जहां मानव विनाशक की भूमिका में है..जाने-अनजानें..!! आदमी की इन बेज़ा कारगुजारियों पर परिन्दों की तरफ़ से एक शेर पूरी तरह प्रासंगिक है-


जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं
देखना ये है कि अब आग किधर लगती है

ब्रिटिश-भारत के पुराने दस्तावेजों में जब पलाश के जंगलों की बहुतायात थी तब पक्षियों में तोतो की अत्यधिक तादाद का जिक्र मिलता है, साथ ही अन्य कई खतरे में पड़ी पक्षी प्रजातियों का जो आशियाना बनाती थी इन वृक्षों पर।

लखीमपुर खीरी में गदर के वक्त पलाश के जंगलों में विद्रोहियों ने अग्रेजों को कैद कर रखा था, खीरी (मोहम्मदी) जनपद के सहायक डिप्टी कमिश्नर कैप्टन पैट्रिक ओर के पत्रों में पलाश के घने जंगलों का जिक्र मिलता है। साथ ही मेरे पास अवध की बड़ी रियासत महमूदाबाद के राजा का एक चित्र मौजूद है जो सन १९५५ में उनके ईराक जाने से पहले का है, वह खीरी जनपद के मितौली-मैनहन गांव में रियाया से मिलने आये थे, हाथी पर सवार अपने मुलाजिमों और रियाया के साथ उस चित्र में चारो-तरफ़ पलाश के वृक्ष मौजूद है, किन्तु अब उस जगह पर तमाम इमारतों के सिवा कुछ नही बचा।

हैविटेट बदलने की साथ प्रजातियों में भी फ़ेरबदल हुए, नतीजतन मनुष्य के अतिरिक्त अब यहां प्रकृति की कोई अन्य सुन्दर कृति नही दिखाई देती है....यह भयानक है और चेतावनी भी.....!

एक खूबसूरत फ़ूल की कथा व्यथा...जो शनै: शनै: हमसे दूर हो रहा है।



कृष्ण कुमार मिश्र (लेखक को अपने आस-पास मौजूद प्रकृति की उन कृतियों का लेखा-जोखा तैयार करते रहने की आदत है, जो हमारे सह-जीवी है, और उनके महत्व को बतलाने की मुसलसल कोशिश करते रहने की सनक, ताकि उन्हे सरंक्षित करने का सन्देश हमारे दिलों में पैबस्त हो सके। इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं )

4 comments:

  1. पलाश पर काफ़ी जानकारी दे दी। सतपुड़ा के जंगलों में इतने खकरे(पलाश) हैं कि आपकी चेतावनी से घबड़ाहट नहीं होती।

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  2. सच इस पेड़ की संख्या लगातार कम होती जा रही है, जो चिन्ता का विषय हैं.

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  3. Vo Palas ki talas me kuchh es tarah Mashur hai ,
    Ki aaye vo Bundelkhand ke Banda jo Palas aur Sazar ke bad bhi Sugandh se dur hai.....

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  4. बहुत खूब आशीष, किसका जुमला है ये?

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