वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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Feb 28, 2011

क्या आप रैबीज का खतरनाक वायरस पहनना चाहोगे !

 एक महिला वैज्ञानिक जो बनाती है खतरनाक जीवाणुओं और विषाणुओं के आकार के जेवर
सू्क्ष्म-जीवों की रचनाओं की तरह निर्मित कर्ण-फ़ूल, और गले के हार
 जानलेवा वायरस पर बने आभूषण
एक महिला जो बनाती है आभूषण न दिखाई देने वाले जीवों के आकार-प्रकार पर, जो रत्नों, महंगी धातुओं, पर उकेरती है, वे रचनायें जिन्हे प्रकृति ने करोड़ों वर्ष के दौरान निर्मित किया, यह एक तरह का विकास है, मानव सभ्यता में...जो प्रवाहित हो रहा है हमारी पीढियों में...प्रकृति बोध की यह सुन्दर कहानी सुनिए.....

विज्ञान में सुन्दरता खोजने वाली यह महिला वैज्ञानिक ने ऐसे शानदार आभूषणों का निर्माण किया जो अदभुत हैं, चांदी के बने हुए ये जेवर सूक्ष्मदर्शी द्वारा उन जीवाणुओं, और विषाणुओं की शक्ल व सूरत पर आधारित हैं, जो धरती पर मनुष्य के जीवन को तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं। 

विज्ञान-तकनीकी विषयों को चाहने वाले शौकीन लोग इन आभूषणों को खूब पसन्द कर रहे हैं। आर्कटिडा द्वारा बनाया गया रैबीज वायरस वाला कर्णफ़ूल व लटकन विशुद्ध आक्सडाइज्ड चाँदी का बना हुआ है, गाढ़े रक्त के रंग वाला यह रैबीज वायरस गले व कानों की सुन्दरता को बढ़ाता है। ये पेन्डेन्ट १६ इंच की चांदी की चेन से संबद्ध होता है, पेन्डेन्ट का आकार २ इंच हैं।


आर्क्टिडा केवल सूक्ष्म जीवों की जटिल व अदभुत सरंचनाओं को धातुओं व रत्नों द्वारा ही रूप नही देती है, बल्कि
प्रकृति की उन तमाम चीजों को जेवर की शक्ल दे रही है, जो उन्हे आकर्षित करती है, फ़ूल, पत्तिया, लतायें, पत्थरो व वृक्षों पर अपने आप उभर आई आकृतियों को रत्न-जड़ित आभूषण का रूप देकर मानव के प्रकृति प्रेम को उभारने और उसे सम्मोहित कर देने वाली सुन्दरता का निर्माण करती है। 

अदभुत है उनकी यह रचनात्मकता, मनुष्य को सदैव प्रकृति के दृष्यों ने आकर्षित किया, मानव ने प्रकृति की घटनाओं से सीखा, उनकी नकल की, जैसे कभी कर्ण्फ़ूल के रूप में किसी सुन्दर पुष्प को धारण करना, गले व सिर पर सुन्दर लता, या पुष्प को गूथ कर माला बनाकर पहनना...

ऐसा हम प्रकृति से आकर्षित होकर बरबस ऐसा करते आये, धातुओं, रत्नों आदि की खोज के पश्चात हमने अपनी उन इच्छाओं को यानि प्रकृति के उन जीवन्त चित्रों, पुष्प आदि को धातुओं व रत्नों के के माध्यम से रूप देना प्रारम्भ किया, यह एक जैव-विकास की प्रक्रिया कीतरह हमारे ज्ञान के विकास का दौर था जो पीढी दर पीढ प्रवाहित होता आ रहा है, आज हमने ऐसे यन्त्रों का विकास किया जो सूक्ष्म जीवों को देखने में 


हमारी मदद करते है, नतीजतन उन सूक्ष्म आकृतियों को आर्क्टिडा जैसे व्यक्तियों को वैसे ही आकर्षित कर डाला जैसे आज से हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे किसी पूर्वज को किस सुन्दर पु्ष्प को बालों, या कान में पहनने के लिए आकर्षित किया होगा।

 
 
 अलेसिया आर्कटिडा Alecia Arctida  (एक गृहणी, माँ, वैज्ञानिक (मालीक्युलर बायोलाजिस्ट), और खाली समय में एक शिल्पकार है, प्रकृति की सुन्दर रचनाओं को कीमती धातुओं, समुन्द्री मूंगों, रत्नों आदि के माध्यम से आभूषणों की शक्ल देती हैं, साथ ही फ़ोटोग्राफ़ी में अभिरूचि, रचनात्मकता से सरोबार एक महिला जो सदैव कुछ नया कर गुजरने की चाह में रहती हैं। स्टॉकहोम स्वीडन में निवास, इनका ब्लाग देखे। इनकी आनलाइन दुकान से खरीददारी करने के लिए यहां Etsy Shop क्लिक करे)
Photo courtesy: http://arctida.blogspot.com/




कृष्ण कुमार मिश्र (लखीमपुर खीरी में निवास, प्रकृति की पाठशाला से कुछ कुछ निकालकर दुधवा लाइव पर अवतरित करते रहना, फ़ोटोग्राफ़ी, बर्ड वाचिंग, और भ्रमण पंसदीदा शौक है, इनसे krishna.manhan@gmail.com पर सम्पर्क कर सकते हैं )

4 comments:

  1. लाजवाब लेख। ये विषय कुछ अभिनव सा है। दुधवा लाईव नया-2 प्रयोग कर रहा है। मेरी शुभकामनाएं।

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  2. Great works!Love all of them!

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