वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Oct 5, 2010

उन्हें हम बना रहे हैं नर-भक्षी !

पीलीभीत की दियूरियाँ  रेंज से करीब दो माह पूर्व भटका बाघ अब मौत के सफर पर चल निकलने को मजबूर हो गया है। क्योंकि शाहजहाँपुर वन प्रभाग के जंगलों में एक माह तक भटकते रहने के बावजूद आदमखोर घोषित किए गये इस बाघ को वाइल्ड ट्रस्ट आफ इडिंया की टीम के सदस्य भी कई मौकों पर आमना-सामना होने के बावजूद टैकुलाइज कर पाने में असमर्थ साबित हुए।

जब ये बाघ किशनपुर वन्य जीव अभ्यारण के घनें जंगल में अपना नया प्राकृतिकवास बनाने की कोशिश में था, उस रेन्ज के लोगों ने इसे वापस आने पर मजबूर कर दिया। जैसा कि मैने अपनी पहली रिपोर्ट में बताया था, कि यह आदमखोर घोषित किया गया बाघ पीलीभीत की दियूरियाँ रेन्ज वाले अपने मूल स्थान पर जाने को बेताब था तो वहाँ लगातार पटाखें दगाकर वापस जाने को मजबूर किया गया। क्या यह एक जानवर के नैसर्गिक न्याय के सिद्वान्त के अधिकार का हनन नही था?

पिछले दो माह से लगातार पीछा किए जाने के कारण गुस्साये इस बेबस बाघ ने काम्बिंग में लगी हथिनी पवनकली को हमला कर घायल कर दिया था। इसके बाद से इस बाघ ने अनजान सफर की ओर कूच कर दिया और उस रास्ते पर लगातार चलता जा रहा है, जिसका सफर का आखिरी छोर शायद मौत ही है। क्योंकि खुटार रेन्ज के जंगल से निकलकर यह बाघ दक्षिण खीरी वन प्रभाग की मोहम्मदी रेन्ज में प्रवेश कर गया, यहाँ पर इसे पकड़े जाने में दो माह से जूझ रही टीम को वहाँ के वन प्रभाग ने अपेक्षित सहयोग नही दिया बल्कि इस अपनी रेन्ज से बाहर करने में अधिक दिलचस्पी ली। क्योंकि उन्हे एक संकटग्रस्त वन्य जीव के जान से प्यारी अपनी आरामतलबी थी।

तीन माह से दर-दर भटक रहे इस बेचारे बाघ ने दिनाँक ३० सितम्बर २०१० को हरदोई जिले की शाहाबाद रेन्ज  में पनाह ले ली है, लेकिन यह पक्का है कि इसे यहाँ पर भी न तो टिकने दिया जायेगा और न ही बाघ को अनुकूल परिवेश मिल सकेगा। नतीजन हरदोई जिले का वनप्रभाग भी इस बाघ को जिला-बदर करने की पूरी कोशिश करेगा। क्योंकि अब पिछले दो माह से इस बाघ को न तो टैकुलाइज ही किया जा सका न तो अब उसके वापस आ पाने की कोई गुन्जाइश शेष बची दिख रही है। इसके इतर शासन ने आदमखोर घोशित किए गये इस बाघ को टैकुलाइज करने का आदेश तो दिया ही था, साथ ही यह ताकीद भी की गई थी कि यदि यह बाघ अपने मूल प्राकृतिकवास में वापस आने की कोशिश करता है, तो उसको निर्बाध जाने दिया जाये। लेकिन गैर जिम्मेदाराना और प्राकृतिक न्याय के फलसफे को नकारते हुए कुछ वन प्रभागों ने बाघ को बेघर कर पर मजबूर कर दिया।

अब जो इस बाघ को आदमखोर होने के कारण इसे मानव जीवन के लिए खतरा बता रहे हैं उनसे मेरा सिर्फ एक ही सवाल है कि अगर - ‘‘कोई आपके घर में अतिक्रमण करता है तो क्या आप उसको भगायेगें नही? उस अतिक्रमणकारी को रहने देगें और खुद बेघर होकर कहीं और चले जायेगें?’’ परिस्थितिवश यदि आपकी संतान अपनी आदतों से विमुख हो गयी हो और सुधरने की कोशिश करे तो क्या आप उसे सुधरने नही देगें? यदि हाँ तो प्लीज आइन्दा किसी वन्यजीव को इतना प्रताड़ित न करें कि वह हमेंशा-हमेंशा के लिए बेघर होकर मौत को गले लगा ले। जैसा कि इस बाघ के साथ हुआ और हो रहा है।

सुनील निगम (लेखक दैनिक जागरण बरेली के मैलानी में संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं, वन्य जीवन पर आधारित रिपोर्टिंग का बेहतरीन अनुभव, इनसे  suniljagaran100@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं।)

2 comments:

  1. निगम जी इस सुन्दर बाघ के पक्ष में आप की बेहतरीन वकालत के लिए धन्यवाद! यकीनन मानव जनित कारण वन्य जीवों को उनकी वृत्तियों से पथच्युत कर रहे हैं।

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  2. ओह... यह तो भूख से मर जाएगा या बेघर होकर ।

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