वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

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"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jul 22, 2010

आसमानी बादशाहों का नष्ट होता वंश!

अम्बर के बादशाहों की बादशाहियत खतरे में
हम बात कर रहे हैं, गिद्धों की जो आसमान के फ़लक
पर ऊँची उड़ाने भरते हैं, ये प्रकृति के बेहतरीन सफ़ाईकर्मी है, ये जहाँ मौजूद होते हैं, वहाँ के पारिस्थितिकी तंत्र को स्वच्छ व स्वस्थ रखने में हमारी मदद करते हैं! मुख्यत: जब मानव आबादी में जब कोई मवेशी मरता हैं, तो ये उसके सड़े-गले माँस को जिसमें असख्य घातक बैक्टीरिया व वाइरस होते हैं, को अपना भोजन बनाकर अपनी मजबूत पाचन प्रणाली द्वारा उसे हज़म कर देते हैं, नतीजतन रैबीज, मुँह व पैर पकने वाली बीमारियों पर नियन्त्रण बरकरार रहता हैं।
इस तरह गिद्ध हजारों सालों से मानवता के सेवा करते आयें हैं,  इतना ही नही इनका धार्मिक व पौराणिक महत्व हैं। रामायण में जटायू नाम के गिद्ध ने ही सीता के वियोग में वन में भटक रहे राम को लंका का मार्ग बता कर सीता की खोज में मदद की। पारसी धर्म के किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर मृत शरीर को टॉवर ऑफ़ साइलेन्स पर रखा जाता हैं, जहाँ ये गिद्ध उस मृत शरीर को नष्ट करते हैं। यह सिलसिला सदियों से चला आ रहा हैं। गिद्ध मानवता की सेवा सदियों से करते आये हैं, बावजूद इसके मनुष्य की गतिविधियां ही इस प्रजाति के अस्तित्व को समाप्त कर रही हैं!
कभी भारतीय उप-महाद्वीप में सामन्य तौर पर पाये जाने वाले गिद्ध अब विलुप्त होने के कगार पर पहुँच गये हैं,
भारत में मौजूद गिद्धों की तीन प्रजातियों ( लॉन्ग बिल्ड वल्चर, स्लेन्डर बिल्ड वल्चर व व्हाइट रम्पड वल्चर) की सख्या में अत्यधिक गिरावट बीसवीं सदी के आखिरी दशक में हुई, तकरीबन 99 प्रतिशत! लेकिन व्हाइट रंप्ड वल्चर में आशर्यजनक स्तर में 99.9% तक गिरावट दर्ज की गयी।
अभी कुछ वर्षों पूर्व ज्ञात हुआ कि गिद्धों के पतन का मुख्य कारण मवेशियों के लिए दर्द निवारक दवा के तौर पर इस्तेमाल में लाई जाने वाली "डाइक्लोफ़िनेक" है! इस औषधि के अवशेष जानवर के शरीर में इकठ्ठा होते रहते हैं, यदि किसी बीमार जानवर को जिसे डाइक्लोफ़ेनेक दी गयी हो गिद्ध 72 घण्टें से पहले खा लेते हैं, तो उनके शरीर के महत्वपूर्ण अंगों में यूरिक एसिड इकठ्ठा होने लगता है और अंतत: गुर्दे खराब हो जाने से उनकी मृत्यु हो जाती हैं।
अब भारत में कुछ ही राज्य है जहाँ गिद्ध बचे हुए है, गुजरात उनमें से एक है। मैं पिछले चार वर्षों से गिद्धों के सरंक्षण व सवंर्धन में अहमदाबाद व आस-पास के इलाकों में काम कर रहा हूँ। अहमदाबाद में अभी तक कुछ हरे-भरे क्षेत्र बचे हुए हैं, जहाँ व्हाइट रंप्ड वल्चर प्रजनन करते हैं। अहमदाबाद शहर में 150 व्हाइट रंप्ड वल्चर और पूरे जनपद में तकरीबन 250 व्हाइट रंप्ड वल्चर मौजूद हैं। हमने डाइक्लोफ़ेनेक दवा के दुष्प्रभाव के अतरिक्त गिद्धों पर पड़ने वाले बुरे प्रभावों में विशाल व पुराने वृक्षों की अन्धाधुन्ध कटाई, गिद्धों के चूजों को      पानी की कमी व भोजन न मिल पाने के कारण मृत्यु, और पतंगबाजी के दौरान तेज धार वाले धागों में फ़स कर घायल होकर होने वाली मौते, आदि स्थितियों का भी अध्ययन किया, जो गिद्धों की विलुप्ति में जिम्मेदार हैं।
हम प्रत्येक वर्ष मार्च-मई में लगभग 20 डी-हाइड्रेटेड चूजों को बचाने का प्रयास करते हैं, जो अपने घोसलों से गिर जाते हैं, इनमे से लगभग 70 फ़ीसदी चूजों मौत हो जाती हैं। प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को मनाया जाने वाला काइट फ़ेस्टिवल परिन्दों के लिए मौत का सबब बनता हैं, केवल अहमदाबाद शहर में 3000-4000 पक्षी रेस्क्यू किए जाते हैं, जिसमें तमाम पक्षियों की मौत हो जाती है, और जो बचते हैं वो हमेशा के लिए अपंग हो जाते हैं। गिद्ध भी इस क्रूरता को भुगतते हैं, अन्य पक्षियों की तरह! प्रत्येक वर्ष पतंगबाजी के इस त्यौहार पर 15-20 गिद्ध पतंगों की शीशा चढ़ी धारदार डोर से कट-कट कर जमीन पर गिरते हैं, इनमें से आधे से ज्यादा की मौत हो जाती हैं।
 हाँलाकि ये सब बता कर मैं दुखी हो रहा हूँ, फ़िर भी संतोष जनक बात यह हैं कि अभी भी हम 50-60 की संख्या में गिद्धों को किसी मृत जानवर के शरीर पर व आस-पास बैठे देख पा रहे है, जबकि गिद्धों को इतनी संख्या में देखपाना अब असमान्य बात हो चुकी हैं।
   वेटेनरी साइन्स के विकास के साथ-साथ मवेशियों की मृत्यु दर की रफ़्तार भी धीमी हुई हैं, साथ ही खुली जगहों की कमी की वजह से लोग अपने मवेशियों को जमीन में दफ़न करने लगे हैं, जिसका नतीजा ये हुआ कि गिद्धों को समुचित भोजन नही मिल पाता। शुक्र है कि गुजरात में जैन धर्म के लोगों द्वारा पन्ज्रपोल चलाये जा रहे हैं, जहाँ आवारा व बूढ़े बीमार पशुओं को रखा जाता हैं। जैन धर्म को मानने वाले लोग प्रन्जपोल को अनुदान राशियां देते हैं ताकि इन पशुओं को चारा व इनका इलाज कराया जा सके। प्रन्जपोल की विशाल जमीनो पर ही इन पशुओं के मरने की बाद रख दिया जाता है, ताकि गिद्ध इनके मृत शरीर से अपन भूख मिटा सकें।  जैन धर्म की अहिंसक शिक्षा व जीवों के प्रति उदारता व प्रेम की परंपरा हमारी धरती से विलुप्त हो रही जीवों की प्रजातियों को बचानें में अहम भूमिका निभा सकती हैं।(अनुवाद: दुधवालाइव डेस्क)


आदित्य रॉय (लेखक मानव आनुवंशिकी के छात्र हैं, अहमदाबाद गुजरात में रहते हैं, पक्षी सरंक्षण के लिए संघर्षरत इनसे आप adi007roy@gmail पर संपर्क कर सकते हैं)

3 comments:

  1. बहुत अच्‍छी जानकारी परक आलेख है .. सारे जीवजंतु आज बहुत ही दयनीय स्थिति में हैं !!

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  2. कृष्ण मिश्रJuly 22, 2010 at 3:51 PM

    एक बात समझ नही आती, "डाइक्लोफ़ेनेक" न जाने कब से मानव व मवेशियों में इस्तेमाल हो रही है, एक बेहतरीन व तुरन्त लाभ देने वाले पेन-किलर के तौर पर....साइड एफ़ेक्ट्स से भी मैं परहेज नही करता लेकिन क्या क्या यही असली किलर है गिद्धों की! क्योंकि गिद्धों की अनुपस्थित में कौए व कुत्ते डाइक्लोफ़ेनेक दिए गये मवेशी का मृत शरीर खाते हैं, कुत्तों को हम छोड़ दे तो कौए का बाडी मास गिद्ध सेव कम होता है..फ़िर वे क्यों नही मरते? कही ये दलाल वन्य जीव प्रेमियों व मल्टी नेशनल कम्पनियों के शेरू (पालतू)संस्थाओं की साजिश तो नही कि डाइक्लोफ़ेनेक की जगह किसी और कंपनी की दवा विकल्प के तौर पर लान्च करवाने की! फ़िलहाल मुझे तो हैविटेट लॉस और मवेशियों के मरने से पहले मलिच्छों द्वारा उनका स्लाटर हाउस में काटा जाना ही मुख्य कारण लगता हैं, क्योंकि ये मलिच्छ उनके मांस को खाने के लिए गिद्धों से भी ज्यादा बेताब रहते हैं! अब आप ही बताए जब मवेशी का मृत शरीर ही गिद्धों को नही मिलेगा तो वह खायेंगे क्या? हाँ एक और महत्व पूर्ण बात! मैने अपने जनपद खीरी में मृत मवेशियों की खाल निकालने वाले लोगों को जहरीले पेस्टीसाइट उनके मृत शरीरों पर छिड़कते देखा है, ताकि खाल निकालने के दौरान गिद्ध या अन्य मुर्दाखोर जानवर व पक्षी उन्हे परेशान न करे! इन घटनाओं में सैकड़ों पक्षियों को मरते देखा हैं। पता नही क्यों लोग बदलती मानव ्प्रवृत्तियों की ओर ध्यान नही देते है...शैतानी प्रवृत्तिया..जहाँ करूणा, सहिष्णता, भाईचारा, दया, प्रेम इन सब का टोटा हो रहा है और इनके बदले लालच, स्वार्थ और घृणा, हिंसा जैसे प्रवृत्तियों का प्रादुर्भाव...ये हमारी और हमारे बनाये हुए उन सब नियमों की असफ़लता हैं जिन्हें हम धर्म, संविधान, कानून और परंपरा कहते हैं, सब किताबी हो रहा है,...जल्द हम नही संभले तो मानवता की परिभाषा बदल जायेगी या बदल चुकी है..और फ़िर ये मानव गिद्धों या अन्य जीव-जन्तुओं के बदले अपनी स्व्जाति को नोच-नोच कर खायेंगे..शायद अभी भी कुछ ऐसा हो रहा हैं!.....

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  3. कृष्ण मिश्रJuly 22, 2010 at 5:09 PM

    मानवता की बात करना इस लिए जरूरी हो जाता है, कि यही प्रजाति धरती की शिर्मौर है! और इसकी हर गतिविधि धरती के सभी प्राणियों या यूँ कह ले कि धरती के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग को प्रभावित (दुष्प्रभावित) करती है।

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