वन्य जीवन एवं पर्यावरण

International Journal of Environment & Agriculture ISSN 2395 5791

Breaking

ये जंगल तो हमारे मायका हैं

बीती सदी में बापू ने कहा था

"किसी राष्ट्र की महानता और नैतिक प्रगति को इस बात से मापा जाता है कि वह अपने यहां जानवरों से किस तरह का सलूक करता है"- मोहनदास करमचन्द गाँधी

Jun 4, 2010

क्या हम उनके लिए रास्ते छोड़ रहे हैं?


गजानन गणपति का स्वरूप, भारत में पूज्य माने जाने वाले 'गजराज' को अपने अस्तित्व के लिए आजकल एक नई लड़ाई लड़नी पड़ रही है। कभी भारत हाथियों का स्वर्ग हुआ करता था, लेकिन शिकार, घटते जंगल और आहार में कमी के कारण इनकी संख्या लगातार कम होती जा रही है। हर साल बड़ी तादाद में हाथी दाँत की तस्करी होती है और कई हाथियों को मार दिया जाता है। वन्य पशुओं के आने-जाने के रास्ते पर बढ़ते अतिक्रमण के चलते मनुष्य और पशुओं की मुठभेड़ बढ़ी है। इसका नतीजा अकसर वन्यजीवों के लिए ही नुकसानदायक होता है। पिछले कुछ सालों से भारत सरकार को पूर्वोत्तर के पड़ोसी देशों एवं लोगों से अपील करनी पड़ रही है क‍ि उनके गाँवों-खेतों में गलती से घुस आए हाथियों की हत्या न की जाए। प्रजनन, मौसम की मार से बचने व खाने की तलाश में वन्य जीव हर साल एक निश्चित अवधि या मौसम में एक इलाके से दूसरे इलाके की ओर जाते हैं। इस प्रक्रिया को आव्रजन कहा जाता है। ये हाथी हर साल थाईलैंड से भूटान की तराई में जाते हैं, जिसके बीच पूर्वोत्तर भारत का हिस्सा पड़ता है। हर साल यह हाथी रास्ते में आने वाले कई गाँव उजाड़कर कई लोगों को मार देते हैं और कई लोग इन मुठभेड़ों में घायल भी हो जाते हैं।टकराव के 'रास्ते' : समस्या यह है कि जंगल में बने हाथियों के प्राचीन रास्तों पर लोगों ने आबादी वाले गाँव बसा लिए हैं, जिस वजह से हाथी भारत वापस जाने के लिए अपना रास्ता नहीं ढूँढ़ पा रहे हैं और इसलिए हिंसक हो रहे हैं। ये हाथी थाईलैंड से भूटान की ओर जाते हैं और भारत का पूर्वोत्तर हिस्सा उनके रास्ते में पड़ता है।मगर अधिकारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में हाथियों की संख्या बढ़ी है। इसी वजह से हाथी अलग-अलग रास्तों से जंगलों में घुसने की कोशिश करते हैं। यह समस्या सिर्फ बांग्लादेश, थाईलैंड या भूटान की ही नहीं, बल्कि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की भी है। सिर्फ असम में ही पिछले 15 वर्षों में हाथियों ने 600 से अधिक लोगों की जान ली है। पूर्वोत्तर भारत में जंगली हाथी अच्छी-खासी संख्या में पाए जाते हैं और अकेले असम में इनकी संख्या 5000 से अधिक बताई जाती है, लेकिन जैसे-जैसे असम में लोगों की आबादी बढ़ती गई, लोगों ने ऐसे इलाकों में पाँव पसारने शुरू कर दिए, जो हाथियों के आने-जाने के रास्ते थे। नतीजतन हाथी रास्ते में आने वाले गाँवों में तबाही मचा देते हैं, जिसका भुगतान उन्हें अपनी जान देकर करना पड़ता है। हाथियों के उपद्रव से भड़के लोग इन्हें अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानते हैं और कभी गुड़ में जहर रखकर तो कभी शिकारियों को बुलाकर हाथियों की जान ले लेते हैं।हाथी एक सामाजिक प्राणी है और झुंड बनाकर रहता है। यह प्राणी काफी संवेदनशील होता है। जानवरों में हाथी की याददाश्त काफी तेज मानी जाती है, यहाँ तक कि अपने झुंड़ के किसी सदस्य के मारे जाने पर अकसर हाथी गुस्से में आकर तबाही मचा देते हैं। ताजे अध्ययनों में सैटेलाइट से मिली तस्वीरें बताती हैं कि असम में 1996 से 2006 के बीच जंगल की लगभग चार लाख हेक्टेयर जमीन पर गाँव वालों ने अतिक्रमण कर आबादी बसा खेती-बाड़ी कर दी है। पर हर समस्या की तरह इस समस्या का भी हल है। अब जरूरत है ऐसे उपायों की जिनसे हाथियों की इन गाँव वालों से मुठभेड़ को टाला जा सके। हाथियों के अकसर आबादी वाले इलाके में घुसने से जानमाल का बड़ा नुकसान भी होता है, पर इस घुसपैठ का कारण ढूँढ़ने के लिए पहले ये सोचना होगा कि हाथी हमारे इलाकों में घुस आए हैं या फिर हम ही उनके इलाके में घुस गए हैं। 'कुंकी' करेंगे काबू : पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए 'कुंकी' नाम से जाने जाने वाले पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है। असम और पश्चिम बंगाल के बहुत से इलाकों में अकसर उग्र हाथियों के झुंड खेतों, गाँवों और लोगों पर हमला कर भारी तबाही मचाते हैं।
पूर्वोत्तर भारत के राज्य असम में जंगली हाथियों के नियंत्रण के लिए 'कुंकी' नाम से जाने जाने वाले पालतू हाथियों की मदद ली जा रही है
विशेषज्ञों ने उग्र हाथियों को पालतू हाथियों के जरिये घेरकर उन्हें रास्ते पर लाने की कोशिश की है। इसके नतीजे भी सार्थक निकले हैं। सबसे अधिक प्रभावित इलाकों में इस रणनीति को अपनाया गया, वहाँ हाथियों की हिंसा से मरने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रुप से कमी हुई है। इस परियोजना के अधिकारी जंगली हाथियों के झुंड की गतिविधियों पर नजर रखते हैं और उनको पालतू हाथियों से घेरकर गाँव से दूर रखते हैं। इस योजना को वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड से भी मदद हासिल है। हाथियों को भगाने के क्रूर पारम्परिक तरीकों जैसे करंट लगाना, फन्दे कसना और बम फोड़ना आदि से यह रणनीति काफी कारगर सिद्ध हुई है और वन्यजीव प्रेमी भी इस पहल से उत्साहित हैं।हाथियों का सुरक्षित कॉरिडोर : हाथियों की बढ़ती समस्या के बाद भारत में अब कोशिश की जा रही हैं कि दो जंगलों के बीच एक कॉरिडोर (गलियारा) विकसित कर उसका संरक्षण किया जा सके। सुरक्षित रास्ता देने के लिए हाथियों के कॉरिडोर पर तैयार की गई रिपोर्ट पर लगभग सभी बड़े विशेषज्ञों की राय ली गई थी तथा उम्मीद है कि इससे हाथियों को जंगलों में ही रोकना संभव होगा और उनके आबादी वाले इलाकों में घुसने की घटनाओं में कमी आएगी। भारत में ऐसे 88 गलियारों की पहचान की गई है और उन पर कुछ स्वयंसेवी संस्थाएँ सरकार के साथ मिलकर काम भी कर रही हैं, पर भारत में वन्यजीवों के रहवास के लिए किए जा रहे सभी प्रयासों में एक समस्या मुँह बाए खड़ी रहती है, वह है बढ़ती जनसंख्या की। लगातार बढ़ती जनसंख्या और जंगल पर बढ़ते दबाव ने पिछले कुछ दशकों में हाथियों की समस्या को बढ़ाया है। इसके लिए देखना होगा कि हाथी दो जंगलों के बीच जिन इलाकों का उपयोग ऐतिहासिक रूप से करते रहे हैं, वहाँ कितने गाँव हैं, आबादी का कितना घनत्व है इत्याद‍ि। दरअसल यही वो इलाके हैं जिन्हें विशेषज्ञ कॉरिडोर कहते हैं और इनके बंद हो जाने के कारण हाथियों ने मानव रहवासी क्षेत्रों में घुसपैठ कर मुसीबतें बढ़ा दी हैं। देश के विभिन्न राज्यों में स्थित इन गलियारों को अब हाथियों के आवागमन के लिए संरक्षित करने की कोशिश की जा रही है। इस योजना से वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंटरनेशनल फंड फॉर एनिमल वेलफेयर, यूएस विश एंड वेलफेयर सर्विस और एशियन नेचर कंजर्वेशन फाउंडेशन जुड़े हैं। इसके अलावा गलियारों के संरक्षणों के लिए केंद्र और राज्य सरकार की भी सहायता ली जा रही है। अब उम्मीद यही है कि इन गलियारों को 'राजकीय गलियारा' घोषित कर दिया जाए और लोगों को जानकारी दी जाए कि इन इलाकों में विकास कार्य नहीं किए जा सकते। अब ऐसे इलाकों में लोगों को सिर्फ हाथियों से बचना ही नहीं है, हाथियों को बचाना भी जरूरी है। यह जागरूकता प्राकृतिक संतुलन कायम करने के लिए सबसे जरूरी है। 
 देवेन्द्र प्रकाश मिश्र (लेखक वन्य-जीव मामलों के जानकार हैं, पिछले एक दशक से पत्रकारिता में सक्रिय, पलिया से ब्लैक टाइगर अखबार निकाल रहे हैं, इनसे dpmishra7@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं))

3 comments:

  1. मनुष्‍य केवल अपनी सत्ता स्‍थापित करने में लगा है इसलिए उसने सारे ही जंगलों में भी अपने पैर पसार लिए हैं। लेकिन जनता को जागरूक करने का कार्य सरकारों और तत्‍सम्‍बंधी विशेषज्ञों का होता है जो अक्‍सर खामोशी धारण किए रहते हैं और आम जनता केवल अपने मुनाफे तक ही सीमित रहती है। आपने बहुत ही अच्‍छा विषय उठाया है कि एकतरफ हम गणपति का आह्वान करते हैं और दूसरी तरफ हा‍थियों का वध करने में नहीं चूकते हैं। बधाई आलेख के लिए।

    ReplyDelete
  2. आईये जाने ..... मन ही मंदिर है !

    आचार्य जी

    ReplyDelete
  3. प्रकृति में संतुलन बनाये रखने के लिए कोरिडर वाला प्रयास सराहनीय है.

    ReplyDelete

आप के विचार!

जर्मनी द्वारा अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार "द बॉब्स" से सम्मानित पत्रिका "दुधवा लाइव"

मुद्दा

क्या खत्म हो जायेगा भारतीय बाघ
कृष्ण कुमार मिश्र* धरती पर बाघों के उत्थान व पतन की करूण कथा:

दुधवा में गैडों का जीवन नहीं रहा सुरक्षित
देवेन्द्र प्रकाश मिश्र* पूर्वजों की धरती पर से एक सदी पूर्व विलुप्त हो चुके एक सींग वाले भारतीय गैंडा

हस्तियां

पदम भूषण बिली अर्जन सिंह
दुधवा लाइव डेस्क* नव-वर्ष के पहले दिन बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभाने वाले महा-पुरूष पदमभूषण बिली अर्जन सिंह

एक ब्राजीलियन महिला की यादों में टाइगरमैन बिली अर्जन सिंह
टाइगरमैन पदमभूषण स्व० बिली अर्जन सिंह और मैरी मुलर की बातचीत पर आधारित इंटरव्यू:

Post Top Ad

Your Ad Spot